<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2837909860989867301</id><updated>2011-08-27T05:50:29.130-07:00</updated><title type='text'>মৃত্তিকা</title><subtitle type='html'>জাতিতাত্ত্বিক লোকায়ত জ্ঞান ও সংস্কৃতি বিষয়ক কাগজ</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://mrhittika.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2837909860989867301/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mrhittika.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>মৃত্তিকা</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03022969983760257374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>3</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2837909860989867301.post-8628209954599895845</id><published>2007-09-14T02:39:00.000-07:00</published><updated>2009-01-26T11:42:51.632-08:00</updated><title type='text'>মৃত্তিকা; বর্ষ ক্রম:০২, সংখ্যা ক্রম: ০২</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_7B_R9zaBeCg/Rupaw1cwjuI/AAAAAAAAAA8/xAykh2DVBug/s1600-h/Cover-3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5109996522233171682" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left;" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_7B_R9zaBeCg/Rupaw1cwjuI/AAAAAAAAAA8/xAykh2DVBug/s320/Cover-3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;মৃত্তিকা&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 153, 0);"&gt;জাতিতাত্ত্বিক লোকায়ত জ্ঞান ও সংস্কৃতি বিষয়ক কাগজ&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;বর্ষ ক্রম:০২, সংখ্যা ক্রম: ০২&lt;br /&gt;প্রকাশকাল: বৈশাখ ১৪১২ বঙ্গাব্দ, মে ২০০৫ খৃ.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;সম্পাদনা: জুয়েল বিন জহির,পরাগ রিছিল, দুপুর মিত্র; সহযোদ্ধা : জাহানারা খাতুন সীমা, তাসলিমা আক্তার রোমন, শারমীন শর্মী&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;নামচিত্র ও প্রচ্ছদ : পাভেল পার্থ&lt;br /&gt;অক্ষর বিন্যাস : শোভন লাল সাহা, জুয়েল বিন জহির&lt;br /&gt;বর্ষা প্রাইভেট লিমিটেড, ৮/৩ বাবুপুরা, নীলক্ষেত, ঢাকা-১২০৫ থেকে মুদ্রিত এবং ৩৪৭ শহীদ সালাম বরকত হল, জাহাঙ্গীরনগর বিশ্ববিদ্যালয় থেকে প্রকাশিত।&lt;br /&gt;বিনিময়: ২০টাকা মাত্র।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;সম্পাদকীয়&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 102, 0);"&gt;সারা দুনিয়ার জ্ঞান কাঠামো এখন খুব স্পষ্ট হয়েই দ্বিধাবিভক্ত। নিপীড়ক জ্ঞান কাঠামো আর নিপীড়িত জ্ঞান কাঠামো। পুঁজিভিত্তিক ব্যবস্থার টালবাহানায় একদিকে বেড়ে উঠছে নিপীড়ক জ্ঞান কাঠামো, অন্যদিকে ক্রমশ হারিয়ে যেতে বসেছে নিপীড়িত জ্ঞান কাঠামো। প্রাতিষ্ঠানিক এই নিপীড়ক জ্ঞান কাঠামোর ভিতর দিয়েই নির্মিত হচ্ছে আমাদের মেধা-মনন-সত্তা। সতি্যকার অর্থে আমরা বাধ্য হচ্ছি। তাই সহজেই বলে ফেলছি- লোক জ্ঞান! লোক ধর্ম! অসভ্য জাতি! অস্পৃশ্য সমাজ! প্রভৃতি। নিপীড়ক জ্ঞান কাঠামোকে কখনোই বুঝার চেষ্টা করছি না। প্রশ্ন তুলছি না নিপীড়ক জ্ঞান কাঠামোকে নিয়ে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমাদের এই সংখ্যায় সবগুলো লেখা ক্ষুদ্রজাতিসত্তার নিপীড়িত জ্ঞানেরই সরব উপস্থিতি। শুভাশিস সিনহার লেখায় এসেছে ভানুবিলের আড়াল হয়ে যাওয়া কৃষক বিদ্রোহের ইতিহাসের কথা- &lt;em&gt;এ আন্দোলনের প্রেক্ষিতেই আসাম সরকার১৯৩৫ সালে সিলেট জেলা প্রজাস্বত্ব আইল পাশ করে। যে জমি জমার উপর কৃষকদের স্বত্ব প্রতিষ্ঠিত হয়। জমির খাজনাও কেদার প্রতি আড়াই টাকার পরিবর্তে দুইটাকা সাব্যস্ত করা হয়। তৈরি হলো নতুন শাসনতন্ত্র। সংগঠিত মানুষের বিজয় সূচিত হয়েছিল ভানুবিলে। আর মুখ তুলে বলেছে ইতিহাস, অন্যায়ের বিরুদ্ধে সদর্পে রুখে দাঁড়ানোর কোনো বিকল্প নেই&lt;/em&gt; । মানখিন প্রদীপ সাংমা তুলে ধরেছেন আচিক ভাষার বর্ণমালার প্রসঙ্গ- &lt;em&gt;কিন্তু ভাষাকে লিখিত রূপ দেবার যে স্বপ্ন মান্দি জাতির বুকে দীর্ঘদিন ধরে, সেই স্বপ্ন বাস্তবায়নের প্রচেষ্টা থেমে নেই। আর এই প্রচেষ্টার অংশ হিসেবেই দীর্ঘদিনের অক্লান্ত পরিশ্রম আর চিন্তাভাবনার ফলস্বরূপ মোট ২৬ টি বর্ণের আচিক বর্ণমালা উদ্ভাবন করেছি। উদ্ভাবনকৃত বর্ণমালার নাম দিয়েছি-আচিক থোকবিরিম&lt;/em&gt; । পাভেল পার্থের লেখায় ভেসে উঠেছে নিপীড়ক সামাজিক জ্ঞান কাঠামোর বেহায়াপনা- &lt;em&gt;আগত অতিথিদের প্রতিজনকেই আলাদা থালায় মিষ্টি দিলেও ডুকলাদের দলটিকে একটা বড় তাগাড়ে মুড়ি আর গোটাকয় মিষ্টি দেয়া হয়েছে;কেবলমাত্র ডুকলাদেরকেই প্লেট ছাড়া চায়ের কাপ ধরিয়ে দেয়া হয়েছে। আসলে এটা বিয়ে বাড়ির ব্যবস্থাপনার কোন ত্রুটি বা আর্থিক টানাপোড়েনের বিষয় ছিল না। বা এমন নয় যে প্লেট সংকট হয়েছে। এ হচ্ছে নিয়ম&lt;/em&gt; । দুপুর মিত্র তুলে ধরেছেন হারিয়ে যাওয়া মান্দি, কোচ ও হাজং সমাজের অসুখ-বিসুখের দেব-দেবীদের- &lt;em&gt;কিন্তু পরিতাপের বিষয় এই যে, এই সব দেব-দেবীর নাম ও আচারাদি সংগ্রহ করতে গিয়ে দেখেছি অনেক আচার অনুষ্ঠানই হারিয়ে যেতে বসেছে। নানান জনের সাথে আলাপ করতে গিয়ে মনে হয়ছে এগুলো হারানোর পিছনে যতটা না অর্থনৈতিক ব্যবস্থা দায়ি, তারচেয়েবেশি নিজেদের ধর্মীয় বিশ্বাসকে নিজেরাই খাটো করে দেখা&lt;/em&gt; । মৃত্তিকা চাকমা দেখিয়েছেন নিপীড়িত চাকমা সমাজে একটি থিয়েটার কীভাবে যুদ্ধ করেছিল- &lt;em&gt;রাঙ্গামাটির গুটিকয়েক তথাকথিত আদিবাসী জ্ঞানীজন-গুণীজন জাক এর কর্মীদের উপর সমালোচনায় উন্মুখ। তাঁদের ধারণা নাটক মানে শুধু বাংলা ভাষায়, কী মঞ্চে কী লেখ্য রূপে!&lt;/em&gt; পরাগ রিছিল তুলে ধরেছেন মহাকাব্যের বিস্তৃতি নিয়ে আচিক সাহিত্যে রয়েছে যে খাত্তাদক্কা- &lt;em&gt;স্পষ্টভাবে অনুভব করা যায় প্রবল সাংস্কৃতিক চাপের মুখে নীচে পড়ে যাওয়া বা আড়ালে সরিয়ে রাখা এসব সাহিত্যকর্ম। সে যা হোক অসাধারণ কিংবা খুব সাধারণ-ই। কোথাও এগুলোর আলোচনা, বাঁচিয়ে রাখার মতো নূন্যতম চেষ্টা নেই!&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;প্রতিটি লেখার উপস্থিতি জেগে ওঠবার প্রেরণা যোগাবে নিশ্চিত।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;জয় হোক নিপীড়িত জ্ঞান কাঠামোর&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;সূচীপত্র&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;প্রবন্ধ : ভানুবিলের কৃষক আন্দোলন : একটি পর্যালোচনা&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;শুভাশিস সিনহা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;আচিক থোকবিরিম&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;মানখিন প্রদীপ সাংমা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:130%;" &gt;ডুকলাদের সকল ঢোল বেজে ওঠুক বর্ণদাপটের বিরুদ্ধে&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;পাভেল পার্থ&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;অসুখ-বিসুখের দেব-দেবী : মান্দি, কোচ ও হাজং সমাজের দলবদ্ধ হওয়ার প্রতীক&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;দুপুর মিত্র&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;চাকমা নাটক ও জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিল&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;মৃত্তিকা চাকমা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;খাত্তাদক্কা&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;পরাগ রিছিল&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;ভানুবিলের কৃষক আন্দোলন : একটি পর্যালোচনা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;শুভাশিস সিনহা&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;১৮৫৩ সালে লিখিত ভারতে বৃটিশ শাসনের ভবিষ্যৎ ফলাফল শীর্ষক প্রবন্ধে কার্ল মার্কস ভারতে ইংরেজ প্রভুত্বের ধরন-ধারণ, নতুনত্ব, করণীয় বিষয়ে সংক্ষেপে আলোকপাত করেছেন, সর্বহারার বিপ্লব ও বিজয়পন্থার ঐতিহাসিক সূত্রানুযায়ী সংস্কার থেকে উৎপাটনের স্তরন্যাস সূচিত করতে গিয়ে তিনি ভারতবর্ষে আগন্তুক ইংল্যাণ্ডের জন্য দ্বিবিধ কর্তব্যের কথা উল্লেখ করেছেন, একটি ধ্বংসমূলক এবং অন্যটি উজ্জীবনমূলক-পুরাতন এশীয় সমাজের ধ্বংস এবং এশীয়ায় পাশ্চাত্য সমাজের বৈষয়িক ভিত্তির প্রতিষ্ঠা।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;উপনিবেশের দীর্ঘ সময়ে পূর্ববর্তী অন্যান্য শাসকবর্গের চেয়ে অনেক জোরালোভাবে বৃটিশরা এ-কাজটাই করতে চেয়েছে এবং নিজেদের মরণগর্তও খুঁড়েছে একইসঙ্গে। ধর্ম, সংস্কৃতি ও অর্থনৈতিক উৎপাদনের বহুল বিন্যস্ত সম্পর্কের রূপ পাঠে অনভিজ্ঞ ইংরেজরা একরৈখিক চিন্তায় সামনে টেনেছে গোটা ভারতকে। শোষণের অদম্য স্পৃহায় ১৭৯৩ সালে তারা প্রবর্তন করে চিরস্থায়ী বন্দোবস্ত ব্যবস্থার। এর ফলে গ্রামাঞ্চলে জমিদার, মধ্যস্বত্বভোগী ও রায়ত - তিন শ্রেণীর সৃষ্টি হয়। ভূমি ও উৎপাদনের সাথে সম্পর্কবিহীন মধ্যস্বত্বভোগী পরগাছা শ্রেণী ও জমিদারের দ্বৈত শোষণ ইংরেজ শাসনের নিরাপত্তা বৃদ্ধির সহায়ক হলেও প্রজা-নিপীড়ন, নিষ্ঠুরতা সামন্ত জমিদারদের বিরুদ্ধে শেষ পর্যন্ত বিদ্রোহের দাবানল ছড়িয়ে দেয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;জমি বা ভূমিকে কেন্দ্র করে কৃষকসমাজের কেবল জীবনীচিন্তাই নয়, বিকশিত তার দার্শনিক সত্ত্বাও। বাংলার লোকায়ত জীবনে সেই শক্তির যৌগ বিধ্বংসী রূপে আভাসিত হয়নি ইংল্যাণ্ডের শিল্পপ্রবণ বেনিয়াদের সামনে। ফলে আঘাত এসেছে অবিশ্বাস্য গতিতে, বৈচিত্র্যে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;বিশ শতকের বিশের দশকের অন্তিমে বৃহত্তর সিলেটের অন্তর্গত মৌলভীবাজার জেলাধীন কমলগঞ্জ থানার আদমপুর ইউনিয়নের ভানুবিল পরগনায় সংঘটিত কৃষকবিদ্রোহ বৃটিশ উপনিবেশিক শক্তির সামনে ছিল এমনই এক আঘাত।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;বিদ্রোহী কৃষকরা জাতিগতভাবে ছিল মণিপুরী, মেইতেই, বিষ্ণুপ্রিয়া ও পাঙন সমপ্রদায়ে অন্তর্বিভক্ত। তাদের পূর্বভূমি ছিল ভারতের মণিপুর রাজ্য, সেটাই তাদের ওরিজিন বা উৎস। পার্শ্ববর্তী বর্মী সৈন্যদের সাথে বারবার সংঘর্ষ, শাসক রাজাদের ধর্মীয়-সাংস্কৃতিক রূপান্তরকরনের হুকুমদারি, নাগা বিদ্রোহ, প্রভৃতি রাজনৈতিক সংঘাতে পর্যুদস্ত মণিপুরীদের একাংশ মণিপুর থেকে পালিয়ে (বা বিতাড়িত হয়ে) ভারতের আসাম, ত্রিপুরায় এবং বাংলাদেশের বৃহত্তর সিলেট জেলায় এসে বসতি স্থাপন করে। উত্তরগাঁও, মাঝেরগাঁও, স্থনগাঁও, কোনাগাঁও, তেতইগাঁও-এই পাঁচটি গ্রাম নিয়ে গঠিত ভানুবিল মৌজায় সর্ববৃহৎ অভিবাসন ঘটে মণিপুরীদের। এ মৌজায় বসতি স্থাপন করে ৭৫২ টি পরিবার। জমিদার ও উপনিবেশবিরোধী কৃষকবিদ্রোহে এসকল পরিবারের প্রায় সকল নারীপুরুষই প্রত্যক্ষ ও পরোক্ষভাবে অংশ নিয়েছিল।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;প্রাণের মায়ায় জন্মভূমি ত্যাগ করে এসে অতিকষ্টে পাহাড় জঙ্গল আবাদ করে বসতি গড়ে তোলা অভিবাসী মণিপুরী জনগণ ধীরে ধীরে চিনে নিতে থাকে শত্রুর নতুন মুখ। উপনিবেশিক শাসক বৃটিশদেরকে সরাসরি নয়, তারা পেয়েছিল বৃটিশেরই পোষ্য প্রতিফলিত জমিদার শ্রেণীর অন্যতম প্রতিভূ আলী আমজাদ খাঁকে; অত্যাচারী, নির্মম শোষক হিসেবে তিনি আবির্ভূত হয়েছিলেন ভক্তিপ্রবণ, স্বাধীনচেতা, বিনম্র মণিপুরী জনগণের সামনে। মণিপুরী জনগণই মণিপুরী কৃষকসমাজ, সেসময় কৃষি ছাড়া মণিপুরীদের আর কোনো জীবিকাই ছিল না। আলী আমজাদ খাঁ ছিলেন তৎকালীন লংলার পৃথিমপাশার জমিদার। আর তার সুযোগ্য নায়েব ছিলেন রাসবিহারী দাশ। জুলুমবাজ রাসবিহারীকে নিয়ে আশরাফ হোসেন সাহিত্যরত্ন তাঁর পুঁথিকাব্যে বলেছেন, পেট মোটা রাসবিহারী চলিতে না পারে দশ বার জনে উঠাইয়া দিলা হাতীরও উপরে' । রাসবিহারী রশিদ না কেটেই প্রজাদের খাজনা আদায় করতেন। ফলে একদিন প্রজারা অবাক দেখতে পায় হিসাবের খাতায় তাদের খাজনা পরিশোধের কোনো চিহ্ন, দলিল নেই। শত শত কৃষকের উপর নোটিশ জারি করা হলো। জমিদার ও নায়েবের অত্যাচার, তার উপর পরিশোধিত খাজনা পুনর্বার পরিশোধের প্রহসন-নোটিশ, সব প্রজাদেরকে বিক্ষুব্ধ করে তোলে। অনিবার্য হয়ে ওঠে প্রতিবাদ, বিদ্রোহ আর একদাদুর মণিপুরের নতজানু মণিপুরীরা সুস্পষ্ট প্রতিপক্ষ ও অন্যায়কারীকে চিনে এবং শোষণের নির্ভেজাল রূপকে বুঝে নিয়ে এবার হয়ে ওঠে ঊর্ধ্বশির, মুষ্ঠিবদ্ধ, বিশাল সমবেত গর্জনে দীপ্রমান। ( মার্কস কি ইংরেজদের দ্বিবিধ কর্তব্যের অনুকুলপ্রতিম দিকনির্দেশ দিয়ে আদতে এমন পরিণতিই টেনে আনতে চেয়েছিলেন? )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;তখন ১৯৩০ সাল। গোটা বিশ্বেই পুঁজিবাদের অন্তক্ষয়ী বিরোধ সংঘর্ষ, সাম্রাজ্যবাদের চূড়ান্ত রূপ প্রকটিত, অন্যদিকে সমাজতান্ত্রিক সোভিয়েতের অভ্যূদয়, আশা-হতাশার দোলাচলে বিশ্বের শোষিত শ্রেণীর বিপ্লবচিন্তা কমপ্রমান, উপমহাদেশের উপর অতিকায় বৃটিশ উপনিবেশের বোঝা, রাজনৈতিক প্রকল্প-কর্মমূচী তৎপরতা একাকার হয়ে যাওয়া অসম্ভব ছিল না। তাই ভানুবিলের পঞ্চানন শর্মা, বৈকুণ্ঠনাথ শর্মা, কাসেম আলী (মুসলিম মণিপুরী/পাঙন), নবদ্বীপ সিংহ, গিরীন্দ্রমোহন সিংহ প্রমূখ মণিপুরী কৃষক নেতাদের সঙ্গে আন্দোলনে মতাদর্শে ও প্রত্যক্ষভাবে যোগ দেন তৎকালীন কমিউনিস্ট ও কংগ্রেসের অনেক নেতা। দ্বারিকা গোস্বামী, নিকুঞ্জ বিহারী গোস্বামী, পূর্ণেন্দু কিশোর সেনগুপ্ত, চারুবালা দেবী প্রমূখ নেতাকর্মীদের সক্রিয় অংশগ্রহণে প্রান্তিক ভানুবিলের বিদ্রোহ পেয়ে যায় মূলধারার রাজনৈতিক সংগ্রামের মর্যাদা ও তাৎপর্য।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ভানুবিলের কৃষক আন্দোলনে মণিপুরী নারীদের ছিল ব্যাপক অংশগ্রহণ, এমনকি নেতৃত্বেও শরিক হয়েছিল অনেক নারী। লীলাবতী শর্মা, সাবিত্রী সিংহ, শশী প্রভা দে, যোবেদা খাতুন এমন অসংখ্য বিদ্রোহিনীর সদর্প পদক্ষেপে ভাঙানোন্মুখ কেঁপেছে অত্যাচারের দূর্গ। এতে বিস্ময়ের কিছু নেই, কৃষিকাজে পুরুষদের সঙ্গে সমানভাবেই অংশ নেয়া মণিপুরী নারীরা তো গর্জে উঠবেই।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;দমনপীড়ন নীতিই যথারীতি গ্রহণ করলেন আলী আমজাদ খাঁ, অসংখ্য নেতা কর্মীকে কয়েদখানায় আটকে রাখলেন । পুঁথিকাব্যে পাওয়া যায়;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;সাহেব বলেন, প্রজাগণ বলি তোমাদের কাছে&lt;br /&gt;ভানুবিলের বহু খাজনা বাকি পড়িয়াছে।&lt;br /&gt;অজ্জে অজ্জে বাকি খাজনা পরিশোধ করিয়া&lt;br /&gt;নতুন কবুলিয়াত দিবায় লেখিয়া।&lt;br /&gt;তারা কহে মিয়া সাহেব এমন কইবায় না&lt;br /&gt;প্রাণ থাকিতে কবুলিয়ত আমরা দিব না।&lt;br /&gt;যে সময়ে মণিপুরীগণ এ কথা কহিলা&lt;br /&gt;বারুদের ঘরে যেন আগুন লাগাইলা।&lt;br /&gt;হুকুম করিয়া সাহেব দেশওয়ালী ডাকিয়া&lt;br /&gt;পিলখানাতে মণিপুরী সব রাখ বান্দিয়া...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;একটি মণিপুরী গীতিকবিতাতে তার পরবর্তী বিদ্রোহ সংগ্রামের ভয়াবহ চিত্র পাওয়া যায়। অনুবাদে সেটি পড়া যাক,&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;ঘরে থেকে পঞ্চানন সব কথা শুনলো&lt;br /&gt;কাসিম সর্দার তার ঘরেতে দাঁড়ালো।&lt;br /&gt;পঞ্চানন তার সাথে পরামর্শ করে&lt;br /&gt;দুই হাতে বাঁশ আর দাও নিলো ধরে...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;সেই যুদ্ধে পঞ্চানন শর্মা শত্রুপক্ষের আগুয়ান হাতী-ঘোড়া সৈন্য নিজ হাতে ক্ষত- বিক্ষত করেছিল, রাসবিহারী দাশও ক্ষুব্ধ মণিপুরী জনগণের হাতে ভূপাতিত হন।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;গোটা ভারতবর্ষে তখন চলছিল জাতীয় পর্যায়ে নানামুখী বৃটিশবিরোধী আন্দোলন, গান্ধীর নেতৃত্ব সত্যাগ্রহ আন্দোলন নিয়েছিল তীব্ররূপ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ভানুবিল কৃষকবিদ্রোহের অব্যবহিত আগে মিলে চুর যাই ও কুলাউড়ায় ঘটে যাওয়া আন্দোলনগুলোও তখন কর্মীদের অনুপ্রেরণা যুগিয়েছিল। এছাড়াও বৃহত্তর সিলেটের শোষিত নিম্নবর্গের অসংখ্য বিদ্রোহের ইতিহাস ভানুবিলের কৃষক প্রজাদের সংগ্রামে, পরিকল্পনায়, নেতৃপর্যায়ের চিন্তা তৎপরতায় রেখেছিল বৌদ্ধিক - প্রায়োগিক ভূমিকা। যেমন - পাণ্ডুয়ার খাসিয়া বিদ্রোহ, হবিগঞ্জের কৃষক আন্দোলন, চা শ্রমিক বিদ্রোহ, লবণ-সত্যাগ্রহ আন্দোলন, বিদেশী পণ্য বর্জন আন্দোলন, চৌকিদারী কর-বিরোধী সংগ্রাম ইত্যাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;শোষণ-নিপীড়নের অদূর অতীতকালের অভিজ্ঞতার উত্তরাধিকার, সুস্পষ্ট অবিচার, রাজনৈতিক সংগঠন ও নেতৃবৃন্দের সক্রিয় অংশগ্রহণ প্রভৃতি শর্ত মিলে ভানুবিলের কৃষক সংগ্রাম ধারণ করে শোষিত-নির্যাতিতের জাতীয়তা সূচক এক মহাবিপ্লবের রূপ, যা উপনিবেশ থেকে মুক্তির মহাভারতীয় সংগ্রামের সাথে কোনো না কোনভাবে এক হয়ে যায়, যার অনিবার্য ফল দাঁড়ায় কৃষকসমাজ বা নিপীড়িতের মুক্তি। আন্দোলনের কালে নির্মমভাবে নির্যাতিত, অত্যাচারিত কৃষকেরা সর্বশক্তি নিয়ে ঝাঁপিয়ে পড়েছিল চূড়ান্ত পর্যায়ে। গণ গ্রেফতারের পরোয়ানা ও আন্দোলন দমনে বাধা হতে পারেনি। টানা প্রায় ৩ বছর সেই আন্দোলন চলে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;এরই মধ্যে অবশ্য ঘটেছিল শাসককুলের পরিবর্তন। জমিদার আলী আমজাদ খাঁ-র মৃত্যু ঘটলে তার পুত্র আলী হায়দার খাঁ প্রজা শাসনের ভার নেন। রাসবিহারীর স্থলে নায়েব হন প্রমোদ ধর। কিন্তু স্বভাবচরিত্রে তারা একই রকম। প্রমোদ ধর ছিলেন আরও নিষ্ঠুর ঘাতক। জমির খাজনাও বাড়িয়ে দেয়া হয়, কিয়ার প্রতি দেড় টাকা থেকে বাড়িয়ে আড়াই টাকা। গাছ কাটা, পুকুর খনন করার অধিকারটুকুও হরণ করে নেয়া হলো। ফলে বিক্ষোভ অবাধ্য হয়ে উঠেছিল ক্রমশ:।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আনুমানিক (বিভিন্ন নথিপত্র অনুযায়ী) ১৯৩২ সালের দিকে এ-আন্দোলনের সমাপ্তি ঘটে কৃষক প্রজাদের বিজয়ের মধ্য দিয়ে। তাদের খেসারত দিতে হয়েছে অনেক - প্রায় ৩০০টি ঘর হাতী দিয়ে মাড়িয়ে ভেঙে ফেলা হয়েছে, ক্রোক করা হয়েছে সবকিছু। এক সময় গরু-বাছুর ক্রোক করতে এলে কৃষকেরা সেগুলোকে গোয়ালঘর থেকে দূর মাঠে ছেড়ে দিয়ে আসত নিয়ম করে সাময়িক রেহাই পাবার জন্য।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আবার আন্দোলন অহিংস নীতিতে চলার জন্য শর্তায়িত বলে অদ্ভূত কৌশলও নেয়া হত যেমন - জমিদারের হাতী-ঘোড়া, ঘর-বাড়ী মাড়াবার জন্য এলে পাড়ার লোকজন এসময়ে ঢাক-করতাল, শেলপুৎ, মইবঙ (শঙ্খ) বাজিয়ে ওদের তাড়িয়ে দিত। এভাবে অভিবাসিত ভক্তিভাবাপন্ন বৈষ্ণব ধর্মাশ্রয়ী মণিপুরী জনগণ নানা কৌশলে, সাহসে, স্পৃহায় সংঘটিত করেছে একটি মহান সংগ্রাম। যার প্রতিপক্ষ শুধু জমিদার বা সামন্তশ্রেণী নয়, আন্দোলনের চূড়ান্ত পর্যায়ে সৈন্যরাও যেখানে শত্রুপক্ষকে স্পষ্ট সহযোগিতা করে। তবে বৃটেনের লেবার পার্টি তার সমালোচনা করে। বিদ্রোহের ঘটনা সরেজমিনে তদন্ত করতে সে দলের ৩ জন পার্লামেন্ট সদস্য নিয়ে গঠিত একটি কমিশন ভানুবিলে আসেন। তাঁরা হলেন, - মিস উইল কিনসন, থ্রী.ভি.কে কৃষ্ণমেনন প্রমূখ। বৃটিশ পার্লামেন্টেও ভানুবিলের ঘটনা আলোচিত হয়। এর পক্ষে বিশ্ব জনমত গড়ে ওঠে। একটি স্থানিক বিদ্রোহ গোটা ভারতের জাতীয় আন্দোলনের সহায়ক হয়ে ওঠে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ভানুবিলের কৃষক আন্দোলন তাৎপর্যপূর্ণ, ঐতিহাসিক, এ আন্দোলনের প্রেক্ষিতেই আসাম সরকার ১৯৩৫ সালে সিলেট জেলা প্রজাস্বত্ব আইন পাশ করে। যে জমি-জমার উপর কৃষকদের স্বত্ব প্রতিষ্ঠিত হয়। জমির খাজনাও কেদার প্রতি আড়াই টাকার পরিবর্তে দুই টাকা সাব্যস্ত করা হয়। তৈরী হলো নতুন শাসনতন্ত্র। সংগঠিত মানুষের বিজয় সূচিত হয়েছিল ভানুবিলে। আবার মুখ তুলে বলেছে ইতিহাস, অন্যায়ের বিরুদ্ধে সদর্পে রুখে দাঁড়ানোর কোনো বিকল্প নেই। রাজনীতি অনভিজ্ঞ সহজ-সরল মণিপুরী জনগণ সেটা বুঝে নিয়েছিল।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আর সেই শিক্ষা তাদের জীবন-সংস্কৃতিতে-রাজনৈতিক অস্তিত্বকেও জাগিয়ে তুলেছিল। তুলেছিল বলেই পরবর্তীতে বাংলাদেশের মুক্তিযুদ্ধে মণিপুরী জনগণ অনেককিছু চিন্তা না করে শুধু শোষণ ও অন্যায়কে নিজেদের মতো চিনে নিয়ে শোষিত বাঙালির পক্ষে লড়াই করেছে অস্ত্র হাতে, জীবনপণ করে। সে-ও এক ইতিহাস।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;আচিক থোকবিরিম&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;মানখিন প্রদীপ সাংমা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;মানুষের কন্ঠ থেকে যে ধ্বনি নির্গত হয় তা দেখা যায় না। এই ধ্বনিকে লেখে প্রকাশ করার জন্য দরকার সাংকেতিক চিহ্নের বা বর্ণের। প্রাণী জগতের মধ্যে কেবলমাত্র মানুষই শব্দ বা ধ্বনি উচ্চারণের মাধ্যমে যে মনের ভাব ব্যক্ত করে, সেই ভাব স্থায়ীরূপে ধরে রাখার জন্য যুগে যুগে উদ্ভাবন করেছে বিভিন্ন ধরনের লিখন পদ্ধতির বা বর্ণমালার। গঠনগত ও সংখ্যাগত ভাবে বিভিন্ন জাতিসত্ত্বার মধ্যে প্রচলিত বিভিন্ন ভাষার বর্ণমালা সমূহের মধ্যে ব্যাপক বৈচিত্র্যতা রয়েছে। আর এই বৈচিত্র্যতার মাধ্যমে একেক ভাষা-ভাষী জাতিগোষ্ঠীর নিজ নিজ স্বকীয়কা আরো বেশী সুষ্পষ্ট হয়ে প্রকাশিত হয়; যেমনঃ সংখ্যার দিক থেকে সংস্কৃত ও বাংলা বর্ণমালা ৫১টি, হিব্রু ২২টি, গ্রীক ২৪টি, লাতিন ২২টি, স্পেনীশ ২৭টি, চাইনিজ প্রায় ৮০,০০০টি এবং গঠনগত দিক থেকেও এদের বৈচিত্র্যতা বেশ সুস্পষ্ট। সাংকেতিক চিহ্ন বা বর্ণমালার মাধ্যমে বিভিন্ন জাতিসত্ত্বা তাদের যুগসঞ্চিত আপন জ্ঞান, বিশ্বাস, ভাল-মন্দ ও উত্থান-পতনের ইতিহাস পৌঁছে দিচ্ছে প্রজন্ম থেকে প্রজন্মান্তরে। বাংলাদেশ ও ভারত মিলিয়ে পৃথিবীতে প্রায় ১৫ লক্ষেরও অধিক লোক মান্দি জাতিসত্ত্বার। টিবেটো-চীন ভাষা পরিবারের বোডো শাখাভুক্ত আচিক ভাষার নিজস্ব কোন বর্ণমালার প্রচলন আজও করা সম্ভব হয়নি। তবে সুপ্রাচীন কালে মান্দিদের নিজস্ব বর্ণমালা ছিলো বলে জনশ্রুতি রয়েছে মান্দি সমাজে। বিভিন্ন কারণে তা হারিয়ে গেছে। আচিক ভাষাকে লিখে প্রকাশ করার জন্য অনেককেই রোমান বা বাংলা হরফ ব্যবহার করতে দেখা যায়। কিন্তু আচিক ভাষা তার আপন বর্ণমালায় যতটা সুন্দর ও সাবলীলভাবে পরিষ্ফুট হবে তা কখনোই অন্য কোন হরফের মাধ্যমে সম্ভব হবে না। এই চেতনাবোধ থেকেই নিজ জাতির নিজ ভাষাকে নিজ বর্ণমালায় প্রকাশ করার জন্য এর আগে জন থুসিন রিছিল, ডানিয়েল আর রুরাম ও মার্টিন রেমা নামক বাংলাদেশের তিনজন মান্দি গবেষক আলাদা আলাদা গবেষণার মাধ্যমে তিন ধরনের আচিক বর্ণমালার উদ্ভাবণ করেছিলেন। কিন্তু নানান কারণে উদ্ভাবিত আচিক বর্ণমালা সমূহের কোনটিরই স্বার্থক প্রচলন ঘটানো সম্ভব হয়নি। কিন্তু আচিক ভাষাকে লিখিত রূপ দেবার যে স্বপ্ন মান্দি জাতির বুকে দীর্ঘদিন ধরে, সেই স্বপ্ন বাস্তবায়নের প্রচেষ্টা থেমে নেই। আর এই প্রচেষ্টার অংশ হিসেবেই দীর্ঘদিনের অক্লান্ত পরিশ্রম আর চিন্তা-ভাবনার ফলস্বরূপ মোট ২৬ টি বর্ণের আচিক বর্ণমালার উদ্ভাবন করেছি। উদ্ভাবনকৃত বর্ণমালার নাম দিয়েছি আচিক থোকবিরিম । এই আচিক থোকবিরিম দিয়েই আচিক ভাষাকে তার আপন ছন্দে আপন আবহে প্রকাশ করা বেশ সহজ সাধ্য হবে। নিম্নে আমার উদ্ভাবিত আচিক বর্ণমালা সমগ্র মান্দি জাতির সামনে হাজির করছি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আচিকে এক একটি অক্ষরকে টাপসুয়া (Tapsua) বলে। আর টাপসুয়া অক্ষর সমষ্টিকে থোকবিরিম (Thokbirim) বলা হয়। আচিকে মোট অক্ষর ২৬ টি। এদের মধ্যে এই ৬ টি বর্ণ স্বরবর্ণ বা গামবিরিম (Gambirim) বাকি ২০ টি অক্ষর সামবিরিম (Sambirim) বা ব্যঞ্জন বর্ণ। বাংলায় যেমন স্বরবর্ণ ও ব্যঞ্জন বর্ণ কে একত্রে বর্ণমালা বলা হয় তেমনি আচিকেও সামবিরিম এবং গামবিরিম অক্ষর সমষ্টিকে থোকবিরিম বলা হয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;বি.দ্র.- কিছু কারিগড়ি সমস্যা থাকায় এই লেখাটির পুরোটা দেয়া সম্ভব হলো না বলে আন্তরিকভাবে দু:খ প্রকাশ করছি। অতি শীঘ্রই তা দিয়ে দিতে পারব বলে আশা রাখি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);font-size:180%;" &gt;ডুকলাদের সকল ঢোল বেজে ওঠুক বর্ণদাপটের বিরুদ্ধে&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;পাভেল পার্থ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);font-size:130%;" &gt;১.আমাদের হাতে ভদ্রলোকেরা জল খান না...&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;মৌলভীবাজারের শ্রীমঙ্গলের মাষ্টারপাড়া। বাঙালি হিন্দুর বউপক্ষের বিয়ে বাড়ি। অধিবাস হয়েছে কাল, বিয়ে অবধি ডুকলাদের দলটি আছে। সমানে ঢোলসহ বাদ্য-বাজনা বাজিয়েই চলেছে সবাই। কী কসরৎ! কী বাজনা! কী সুর! কী দুর্দান্ত অভিজ্ঞতা আর শ্রমের সম্মিলন। নিমন্ত্রিতদের জন্য চা-মিষ্টির পালা এসেছে। আগত অতিথিদের প্রতিজনকেই আলাদা থালায় মিষ্টি দিলেও, ডুকলাদের দলটিকে একটা বড় তাগাড়ে মুড়ি আর গোটাকয় মিষ্টি দেয়া হয়েছে; কেবলমাত্র ডুকলাদেরকেই প্লে­ট ছাড়া চায়ের কাপ ধরিয়ে দেয়া হয়েছে। আসলে এটি বিয়ে বাড়ির কোন ব্যবস্থাপনার ত্রুটি বা আর্থিক টানাপোড়েনের বিষয় ছিল না। বা এমন নয় যে প্লেট সংকট হয়েছে। এ হচ্ছে নিয়ম। সিলেট জনপদের নিয়ম। এখানে বাঙালি বর্ণহিন্দুরা ডুকলাদের হাতে জল খায় না, নিজেদের বিছানায় ডুকলাদের বসতে দেয় না, ডুকলারা বাঙালিদের লগে বড়জোড় প্লে­ট ছাড়া খালি কাপে চা খেতে পারে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);"&gt;২.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;মৌলভীবাজারের কমলগঞ্জের ভানুগাছ বাজার। মিষ্টির দোকানে পয়সাপাত্তি থাকলে তো কত জনই আসে ( যদিও এই লিঙ্গীয় দাপুটে সমাজে বাঙালি পুরুষেরাই এই কৌশলটি নেয়)। সুধারাম কর (৩৫) আর কাশীনাথ কর (৩০) দুইজনেই ঢুকে গিয়েছিলেন দোকানের ভেতর। পয়সা দিয়েই দোকানে বসে মিষ্টি খেতে চেয়েছিলেন। দোকান মালিকসহ আর সব ক্রেতারাও জাপটে ধরে তাদের। গালি-গালাজ করে দোকান থেকে বের করে দেয়। সুধারাম আর কাশীনাথ কম পয়সা দিয়ে বা বাকিতে কিনে খেতে চাননি, তারা কেবল দোকানে অন্যদের লগে বসে খেতে চেয়েছিলেন। দোকান মালিক বা ক্রেতাদের লগে তাদের পূর্বতন কোন ঝগড়াঝাটিও ছিল না। আসলে এটি নিয়ম! এইসব অঞ্চলে ডুকলারা নিদারুণ ভাবে অচ্ছুত (!) অস্পৃশ্য (!) । দোকানে বসে অন্যদের লগে কোনো কিছু খাওয়া বারণ। এমনকি কোনো ধর্মীয় বা সামাজিক উৎসবেও তাদের খাবারের জায়গা আলাদা। ডুকলাদের লগে এক ঘরে ঘুমালে, একলগে বাজালে, একলগে খেলে, ডুকলাদের হাতের রান্না বা জল খেলে বাঙালি বর্ণহিন্দুর যাবতীয় জাত নাকি চলে যায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মানুষের লগে মানুষের এইরকমের ভয়াবহ বিনাশী বর্ণসম্পর্কগুলো এখনও সিলেট জনপদে বহাল আছে। ডুকলাদের ( সিলেট জনপদে এদের নানান নাম, ডুগলা-ঢুলি-কুলি-শব্দকর...!) লগে তথাকথিত বর্ণহিন্দু (!) সহ বাঙালি জাতটাই একটা দাপুটে ফারাক রেখে চলে। ডুকলাদের দিয়ে দাসগিরি করানো হয়, ধকল টানানো হয়, কিন্তু ব্যাটাগিরির বর্ণদাপট এখনও বহাল তবিয়তেই বিরাজমান। তবে দুম করে সিলেট জনপদের বর্ণহিন্দুদের (!) ভেতর এই বর্ণদাপট চলে আসেনি। এইসব বর্ণবৈষম্যের দুনিয়াময় নিপীড়ন আর প্রতিরোধের লড়াই ইতিহাস আছে, আছে নানান রাজনীতিক ইশারা, বহুজাতিক দেন দরবার। ড. মুহম্মদ শহীদুল্লাহ সম্পাদিত বাংলাদেশের আঞ্চলিক ভাষার অভিধান পুস্তকে ‌ডুকলা শব্দের অর্থ হিসেবে বলা হয়েছে অসভ্য,নিকৃষ্ট জাতি বা সমপ্রদায়। শব্দটি নাকি হিন্দি দোগলা শব্দ থেকে এসেছে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;শ্রীহট্টের ইতিবৃত্ত পুস্তকে ডুকলাদের উদ্ভব ও পরিসংখ্যান সম্পর্কে বলা হয়েছে, “ঢোলি বা বাদ্যকর-ডোম, পাটনি বা কৈবর্ত হইতে ইহাদের উদ্ভব বলিয়া অনুমিত হয়। ইহাদের সংখ্যা ১০২৫৫ জন; (তন্মধ্যে পুরুষ ৪৯৮১ এবং স্ত্রী ৫২৭৪ জন)। যাহারা বাদ্যকর বলিয়া পরিচয় দিয়াছে তাহাদের সংখ্যা ১৫২ জন পূর্বোক্ত সংখ্যার মধ্যে ধৃত হইয়াছে।” সূর্যকুমার তর্কসরস্বতী তাঁর জাতি পুরাবৃত্ত ( ১৯২০ ) পুস্তকে উলে­খ করেছেন-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;কুন্ডকারো ডোখলে বা মৃতপঃ হস্তিপস্তথা।&lt;br /&gt;এতে বৈ তীবরাজাতাঃ কন্যায়াং ব্রাহ্মণ্যস্য ॥&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;তীবরের ঔরসে ব্রাহ্মণীকন্যার গর্ভে উৎপন্ন সন্তান দেশভেদে কুম্ভকারা, ডোখল, মৃতপ ও হস্তিপ নামে প্রসিদ্ধ। ডোখলগন মাতৃজাত্যুক্ত দশরাত্রাশৌচী, ইহারা বাদ্য ব্যবসায়ী।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯০৫ সালে বি.সি. অ্যালেন সম্পাদিত আসাম জেলা গেজেটিয়ার্স-এর সিলেট খন্ডে ডুকলাদের ( যদিও ঢুলী বা শব্দকর হিসেবেই পরিচয় করানো হচ্ছে) জনসংখ্যার হিসেব দেয়া হয়েছিল ১০১০৩ জন। ডুকলারা চলতি সময়ে সিলেট জনপদের মৌলভীবাজার জেলাতেই সবচেয়ে বেশী বাস করছেন। তার ভেতর কমলগঞ্জ উপজেলা অন্যতম। রসময় মোহান্ত সিলেট অঞ্চলের আদিবাসী প্রেক্ষিত ও শব্দকর সমাজ সমীক্ষা পুস্তকে কমলগঞ্জ উপজেলার ১৯৯৫ সালের ডুকলাদের মোট জনসংখ্যা ৪০৭৩ জন উল্লে­খ করেছেন। বাংলাদেশে বাঙালি ভিন্ন আর সকল জাতির যেমন হিসেবপত্তর রাষ্ট্রের হদিসে নাই, ডুকলাদের খবর সেভাবেই রাষ্ট্র রাখেনা, রাখার দরকারও মনে করে না কোন কালে। আর দাপুটে ব্যবস্থায় নিরন্তর পর হয়ে ওঠা এইসব মানুষেরা কেবলি আপন ঘর-দুয়ার, জমিন, বাদ্যবাজনা, কাজ, লড়াই ও স্বপ্ন হারাতে থাকেন। উচ্ছেদ আর নিশ্চিহ্ন হতে থাকে মানুষের জনপদ, মানুষেরই দাপটে।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);"&gt;&lt;br /&gt;চান্ডালে সে রান্ধে অন্ন, ব্রাহ্মণে সে খায়...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ডুকলাদের কেন্দ্রীয় পেশাই বাদ্য বাজনা। আগে অনেকে হুক্কা খাওয়ার জন্য টিক্কা তৈয়ার করতেন। চোঙা পিঠা খাওয়ার জন্য ডলু ও কালি বাঁশ কাটতে যেতেন পাহাড়-জঙ্গলে। কচি পাঁঠাকে খাসী বানানো আর এঁড়ে বাছুরকে বলদে রূপান্তরিত করার কাজ করতেন। উৎসব আয়োজনে খাবার পাত্র হিসেবে ব্যবহৃত কলাপাতা আর শটি পাতা জোগাড় করতেন। এখন জঙ্গল রাষ্ট্রের দখলে, এসেছে নিত্যনতুন ব্যবসায়িক ডেকোরেটর, এসেছে সিগারেট কোম্পানি আর পুস্তকি আধুনিক পশু ডাক্তার (!), আর এসেছে মারদাঙ্গা ব্যান্ডপার্টি (!)। ডুকলারা আর সব প্রান্তিক মানুষের মতনই সার্বজনীন প্রাণবৈচিত্র্যে নিজেদের আপন অধিকার হারিয়েছেন। নিশ্চিহ্ন হয়েছে আপন জাতিগত আচার ও ইতিহাস। চলতি সময়ে আপন বাদ্য বাজনাও দখল হয়ে গেছে বহুজাতিক গান-বাজনার বাজারের দাপট দ্বারা। তার উপর সামাজিক কায়দায় বর্ণবৈষম্যতো আছেই। এ অবস্থায় ডুকলাদের চলতি সময়ের অবস্থান এতোটাই প্রান্তিক যে, দাপুটে মানুষেরা যেমন ডুকলাদের নিয়ে যাবতীয় হাসি-ঠাট্টা-তামাশা-মশকরা করে নিপীড়ন করেন তেমনি ডুকলারাও অনেক ক্ষেত্রে আপন পরিচয় দিতে ভয় পান। বাঙালি বর্ণহিন্দুর চিহ্নিতকরনের দাপটের আড়ালে পড়ে আছে ডুকলাদের আপন ধর্মের ইতিহাস। এ ইতিহাস চলতি কায়দায় ইতিহাস হয়ে ওঠে না বলেই ডুকলাদের বুড়া শিব, জগন্নাথও আমাদের আপন হয়ে ওঠেন না। জগন্নাথ বর্তের একটা গানে আছে :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 153);"&gt;পশ্চিমে বন্দনা করি ঠাকুর জগন্নাথ&lt;br /&gt;যাহার বাজারে রে লরিয়া বিকায় ভাত।&lt;br /&gt;ভাত বিকায়, ব্যাঞ্জন বিকায়, আর বিকায় পিঠা,&lt;br /&gt;জগন্নাথের লাবড়া ব্যাঞ্জন খাইতে লাগে মিঠা।&lt;br /&gt;চান্ডালে সে রান্ধে অন্ন, ব্রাহ্মণে সে খায়,&lt;br /&gt;তেও তো ধার্মিক লোকের জাত নাহি যায়।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;নিপীড়িত ডুকলাদের জীবনযাপনেই এইসব বহুপাক্ষিক প্রতিরোধী অদাপটীয় কায়দা বিরাজমান। কিন্তু সেই দিন কী কখনোই ডুকলাদের দেখা হবে এই দাপুটে বর্ণব্যবস্থায় যেদিন চান্ডালে সে রান্ধে অন্ন, ব্রাহ্মণে সে খায়...?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);"&gt;আবার বেজে ওঠুক মঘাই ওঝার ঢোল বাদ্যি...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;উপমহাদেশের অনন্য নজির মঘাই ওঝার ঢোল বাদ্যি। ডুকলা মঘাই ওঝার ঢোল বাদ্যি আমাদের বর্ণদাপুটে ব্যবস্থায় কখনোই ইতিহাস নয়। অথচ আমরাই সকল মানুষ সমান, সবার উপরে মানুষ সত্য এইসব ব্যাটাগিরি করি। আমরা ভারতের চুনী কোটালকে আত্মহত্যা করিয়েছিলাম। কারন নিদারুণভাবে অস্পৃশ্য লোধা সমাজের চুনী কোটালের সামনে আমরা দাপুটে বর্ণ সমাজকে হাজির করেছিলাম। আমরা নিত্য চা পান করতে গিয়ে বেমালুম ভুলে যাই আমাদের চা বাগানগুলোতে গিরমিট চুক্তির (আজীবন দাসত্ব চুক্তির) মাধ্যমে আমরা সাঁওতাল-মুন্ডা-ওঁরাও-খাড়িয়া-মাহাতোদের বন্দী করে রেখেছি। আমরা একুশে ফেব্রুয়ারি আন্তর্জাতিক মাতৃভাষা দিবস পালন করতে গিয়ে গায়েব করে ফেলি এই রাষ্ট্রে বাংলা বাদেও আরো ৪৫ বা তারও বেশী জাতির আপন আপন ভাষা আছে। নিজের মায়ের ভাষায় বাঙালির যদি বেঁচে-বেড়ে ওঠার অধিকার থাকে তবে বাদবাকি সকল জাতিগোষ্ঠীরও আছে। আমাদের রাষ্ট্র দুমদাম করে জাতিসংঘের সবকিছু স্বাক্ষর করে দেয়। জাতিসংঘের ১৯৬৬ সালের সকল প্রকার বর্ণবৈষম্য দূরীকরনের(?) লক্ষ্যে অনুষ্ঠিত আন্তর্জাতিক কনভেনশনে বাংলাদেশও স্বাক্ষর করেছে। প্রতিবছর ২১ মার্চকে আন্তর্জাতিক বর্ণবৈষম্য দিবস ঘোষণা করা হয়েছে। অথচ এখনো এই রাষ্ট্রের পরতে পরতে, রন্ধ্রে রন্ধ্রে বর্ণদাপট। এই জনপদের আপন জ্ঞানকান্ডতো তাই বলে, মানুষের বাইরের চামড়া যাই হোক, রক্ত সবার লাল। আমরা কতজন মানুষ সেটা ভেতর থেকে বিশ্বাস করি। ডুকলা সহ রাষ্ট্রের বর্ণনিপীড়িত সকল মানুষের রক্তই লাল। এক লাল রক্ত কী করে আরেক লাল রক্তকে আজীবন দাস বানাতে চায়? বেজে ওঠুক গ্রাম-জনপদে আবারো মঘাই ওঝার ঢোল বাদ্যি। এই বর্ণদাপুটে সমাজকে আসুন ছিন্নভিন্ন, টুকরো টুকরো করে ফেলি। এখানে আপন শ্বাস ফেলার অধিকার সবার সমান। কেবলমাত্র ডুকলা বলে, এখানে কেউ কারো দখলকৃত দাস নয়। আসুন সকলে সামিল হই আপন প্রতিরোধের পাটাতনে, বর্ণদাপুটে সমাজকে চিহ্নিত করি, লড়াইটা মজবুত করি, এ লড়াই তো আমার-আপনার-ডুকলাদেরও-সকল লাল রক্তের !&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;অসুখ-বিসুখের দেব-দেবী : মান্দি, কোচ ও হাজং সমাজের নিজ নিজ দলবদ্ধ হওয়ার প্রতীক&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;দুপুর মিত্র&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;মার্কস ও এঙ্গেলসের মতে ধর্ম হচ্ছে -the heart of a heartless world, কিংবা the opium of the masses. ধর্ম প্রসংগে তাঁদের ভাবনা-চিন্তা হলো-এটি অধিপতি শ্রেণীর সহায়ক শক্তি যা সেই শ্রেণীর আধিপত্যকে বৈধ ও স্বাভাবিক করে তোলে। আর বিপরীতভাবে নিপীড়িতদের পারলৌকিক মুক্তির আশা-আকাঙ্খায় ধর্মীয় নিপীড়ন যা অধিপতি শ্রেণীরই নিপীড়ন, তা মেনে নেবার জন্য আহবান করে। মার্কসের মতে ধর্ম একটি কাল্পনিক বিষয়। আর তাই মানুষে মানুষে যৌক্তিক সম্পর্কের ভিত্তি গড়ে উঠলেই তার অবসান ঘটবে বলে নিশ্চিত হওয়া যায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মার্কসের ধর্ম বিষয়ক এইসব চিন্তার চেয়ে আমার গুরুত্বপূর্ণ মনে হয়েছে ডুর্খেইমের ধর্ম সম্পর্কিত চিন্তাগুলো যা ১৯০২ থেকে ১৯১১ পর্যন্ত ÔThe Elementary forms of the Religious life’ এ লেখা হয়। গুরুত্বপূর্ণ ভাবার সবচেয়ে বড় কারণ হিসেবে দেখানো সম্ভব-মার্কস মনে করতেন শিল্পায়ন সমাজতন্ত্রের অনেক পূর্বেই ধর্মকে মিথ্যা হিসেবে প্রতিষ্ঠিত করবে। কিন্তু আমার মনে হয়েছে শিল্পায়ন কখনোই মিথ্যা প্রতিপন্ন করতে পারেনি-পারবেও না। বরং এটি আরো ধর্মকে প্রতিষ্ঠিত করে চলেছে যার উদাহরণ এখন আমাদের চোখের সামনে অনেক। যেমন খৃষ্টান্তরিতকরণ ইত্যাদি। মার্কস যেখানে ধর্মকে কাল্পনিক মনে করেন ডুর্খেইম সেখানে বলেন-ধর্মের মত একটি প্রতিষ্ঠানের ভিত্তি বিভ্রান্তি বা মায়া হতে পারে না। তাঁর মতে, বাস্তবে এমন কোনো ধর্ম নেই যেটি মিথ্যা। তাদের নিজ ঢঙে প্রতিটিই সত্য, প্রতিটিই মানব অস্তিত্বের প্রদত্ত দশার ব্যাখ্যা হাজির করে, আলবৎ ভিন্নভাবে। এ কারণে আমরা যখন আদিম ধর্মের দিকে ফিরে তাকাই, আমরা সেগুলোকে খাটো করার জন্য কাজ করি না, কারণ এই ধর্মগুলোও অপরাপর ধর্ম মতন কোনোভাবে কম সম্মানজনক নয়। সেগুলো একই চাহিদায় সাড়া দেয়, একই ভূমিকা পালন করে, সেগুলোর পিছনে একই কারণ রয়েছে; ধর্মীয় জীবনের প্রকৃতি প্রদর্শন করতে সেগুলো একইভাবে সক্ষম । সত্যিই তাই। এবং ধর্মীয় আচার-অনুষ্ঠান-পার্বনিক মানুষের চাহিদাকেই-জীবনের চাহিদাকেই স্পষ্ট করে তোলে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মার্কসের সাথে ডুর্খেইমের বেশ কিছু জায়াগায় মিল রয়েছে যেমন-ধর্ম নিপীড়িতদের আদিম বা যন্ত্রণা নিবারক । এখানে ডুর্খেইমের বলেছেন ধর্ম গরীবের সান্ত্বনাদানকারী। কিন্তু মার্কস যেখানে মনে করতেন ধর্ম মানুষের বৈপ্লবিক সম্ভাবনাকে নষ্ট করে, ডুর্খেইম সেখানে মনে করেন ধর্মীয় বিশ্বাস কেবলমাত্র ধর্মীয় বিশ্বাসে পুনর্শক্তি যোগায় না-এটি সৃষ্টি-পুণঃসৃষ্টি দুটোই করতে পারে। কাজেই অধিপতি শ্রেণী যে ধর্মের মাধ্যমে নিপীড়ন চালায় তাকে যেমন উৎখাত করতে পারে তেমনি সৃষ্টি করতে পারে বিপ্লবের সম্ভাবনাও।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;অর্থাৎ এটি সম্ভব কারণ ডুর্খেইমের মতে ধর্মীয়-আচার অনুষ্ঠান পার্বনাদি কেবলমাত্র বিশ্বাসীদের মধ্যেকার এবং ঈশ্বরের প্রতি বন্ধনকে শক্তিশালী করে না, এটি সদস্যের সাথে দলের বন্ধনকেও শক্তিশালী করে। আচার-অনুষ্ঠান পালনের মাধ্যমে সামাজিক দলটি তার অস্তিত্বের ব্যাপারে সচেতন হয়। ফলে সমষ্টিগত বোধ ও ঐতিহ্যের প্রেক্ষিতে নিজেদের একাত্রিত বোধ করেন এবং সম্মিলিত হন। কাজেই ধর্মীয় অনুষ্ঠানাদিই নিজেদের ঐতিহ্য-সংহতিকে পাকাপোক্ত করতে পারে। আর তাই এখনো ক্ষুদ্র জাতিসত্ত্বাদের ভিতর পালিত হয়ে আসছে নানান ধর্মীয় আচার-অনুষ্ঠান-পার্বনাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;এই লেখায় বৃহত্তর ময়মনসিংহ অঞ্চলের মান্দি, কোচ ও হাজং সমাজের অসুখ-বিসুখের দেব-দেবীদের নাম ও সংক্ষিপ্ত পরিচয় হাজির করছি যা আমাকে বিভিন্ন জায়গা ঘুরে ঘুরে সংগ্রহ করতে হয়েছে। এইসব দেব-দেবীর পূজা নানানভাবে তাদের মধ্যেকার ভ্রাতৃত্ববোধকে টিকিয়ে রেখেছে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);font-size:100%;" &gt;মান্দি সমাজের অসুখ-বিসুখের দেব-দেবীদের নাম ও সংক্ষিপ্ত পরিচয়&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;১. চুরাবুদি : হাত-পা ফুলে গেলে এই পূজা করতে হয়। পূজা করতে ১টি মোরগ ও চু লাগে।&lt;br /&gt;২. জগুরং সিল : মাথা-ব্যথার জন্য পূজা দিতে হয়। চু ও ১ টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৩. মিন্না মিদ্দি : বাঁশ দিয়ে দুইটি সাপ বানিয়ে পেটের ব্যথার জন্য রাস্তায় এই পূজা করতে হয়। পূজার জন্য ১ টি মোরগ ও চু লাগে।&lt;br /&gt;৪.দারিচিক : গর্ভপ্রসবের সময় পেটের ব্যথা হলে এই পূজা করতে হয়। ঘরের নকসাস পেছনে পূজা সাজাতে হয়। মোরগ ১ টি লাগে। চু লাগে।&lt;br /&gt;৫.দারিচিক রামানি : গর্ভপ্রসবের সময় পেটের ব্যথা হলে রাস্তায় এই পূজা করতে হয়। এখানেও মোরগ লাগে ১ টি। চু লাগে।&lt;br /&gt;৬.সালবংগী : বাচ্চার জ্বর সবসময় থাকলে সালবংগী পূজা করতে হয়। মোরগ লাগে ১ টি।&lt;br /&gt;৭.হানিং মিদ্দি : বাচ্চার জ্বর হলে মাটির নিচে গর্ত করে মানুষের মত মূর্তি বানিয়ে হানিংমিদ্দি পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৮.বিদ্দায়ী চিবল : জ্বরের সাথে সাথে শরীর ফুলে গেলে বিদ্দায়ী চিবল পূজা করতে হয়। ফুরা রান্না করে ৩ ভাগ করতে হয়। ১ ভাগ দেবতাকে উৎসর্গ করতে হয় এবং বাকি ২ ভাগ প্রসাদ হিসেবে সবার খেতে হয়। পূজার সময় মোরগের রক্ত দেবতার গায়ে মাখাতে হয়।&lt;br /&gt;৯.চেংদ্দী : বাচ্চা সবসময় কান্নাকাটি করলে এই পূজা করতে হয়। পূজার সময় ১ টি মোরগ লাগে। চু লাগে।&lt;br /&gt;১০.দরিবল : মাথা ঘুরালে করতে হয়। ১ টি মোরগ ও চু লাগে।&lt;br /&gt;১১.দুয়াজাক : শরীর অতিরিক্ত ক্লান্ত হলে দুয়াজাক পূজা করতে হয়। ১ টি মোরগ লাগে ও চু লাগে।&lt;br /&gt;১২.আতিচেলা : বাচ্চা অতিরিক্ত কান্নাকাটি করলে করতে হয়। ১টি মোরগ ও চু’র প্রয়োজন হয়।&lt;br /&gt;১৩.রিসি হানথাম : শরীরে অতিরিক্ত চুলকানি থাকলে করতে হয়। পূজাটি বিকালে করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;১৪.উদোম : পা বা হাত ফুলে গেলে মানুষ বানিয়ে দুইপাশে কলাগাছ গেরে এই পূজা করতে হয়। পূজায় ছাগল ১টি এবং মোরগ ১টি লাগে।&lt;br /&gt;১৫.হানিমাছি : অতিরিক্ত মাথা ঘুরালে করতে হয়। ২টি মোরগ লাগে। ১টি দিয়ে দেবতার গায়ে রক্ত মাখাতে হয়। অপরটি দিয়ে ফুরা রান্না করতে হয় যার ১ ভাগ দেবতার জন্য বাকি ২ ভাগ প্রসাদ হিসেবে সবার খেতে হয়।&lt;br /&gt;১৬.দাগবা বিচ্চিমা : কোনো কারণ ছাড়াই শরীরে সবসময় ক্লান্তি থাকলে এই পূজা করতে হয়। মোরগ ১টি এবং ১ হাড়ি চু লাগে পূজা দিতে।&lt;br /&gt;১৭.জাঙ্খিপাং : অনেক দিন হওয়ার পরও বাচ্চা হাঁটতে না শিখলে ঘরের দরজার সামনে এই পূজা করতে হয়। ২ টি মোরগ লাগে। ১টি দিয়ে দেবতার গায়ে রক্ত মাখানো হয়। অন্যটি দিয়ে ফুরা রান্না করতে হয়। ফুরা ৩ ভাগ করে ১ ভাগ দেবতাকে দিতে হয় বাকি ২ ভাগ প্রসাদ হিসেবে সবার খেতে হয়।&lt;br /&gt;১৮.নককাম : শরীরে বিষ-ব্যথা হলে করতে হয়। পূজার সময় ঘরের প্রত্যেক খুঁটির সাথে আমের পাতা বেঁধে রাখতে হয়। হাঁস ১টি এবং মোরগ ১টি লাগে।&lt;br /&gt;১৯.দাগাল : প্রতি বিকেলে জ্বর হলে এই পূজা করতে হয়। মোরগ ১টি লাগে।&lt;br /&gt;২০.‡`b`v¤^vK : বাচ্চার জ্বর ও বারবার পড়ে যাওয়ার উপসর্গ থাকলে এই পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;২১.বানপাং : বাচ্চা জ্বরের সময় অজ্ঞান হয়ে গেলে করতে হয়। পূজার সময় সাত বোন বানিয়ে খাদাম তৈরি করতে হয়। ১টি হাঁস ও ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;২২.গিদ্দক রুগিবা : অতিরিক্ত গরম থেকে জ্বর হলে করতে হয়। ১টি হাঁস ও ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;২৩.দুরা Avw¤^mx : সকালে এবং দুপুরে জ্বরের লক্ষণ দেখা দিলে করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;২৪.বারিং কল : হাত-পায়ে গর্তের মত ঘা হলে করতে হয়। ১ জোড়া কবুতর লাগে।&lt;br /&gt;২৫.গেরাম : সবসময় শরীরে জ্বর থাকলে এই পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;২৬.চুয়াল আচাকনী : বুক ব্যথা করলে এই পূজা করতে হয়। পূজার সময় মোরগের চোয়াল লাগে। আর কুকুর কেটে রক্ত দেবতার শরীরে মেখে দিতে হয়।&lt;br /&gt;২৭.দুনি চুয়াল : সবসময় ঢেকুর উঠলে করতে হয়।&lt;br /&gt;২৮.হিচানী দমোকনী : অজ্ঞান হয়ে গেলে এই পূজা করতে হয়। খালের উপরে পূজা করতে হয়। ১টি পাঁঠা এবং ১ জোড়া কবুতর লাগে।&lt;br /&gt;২৯.চিব্রেং : কেঁপে কেঁপে জ্বর হলে এই পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৩০. বাঙ্গালস্নি : শরীরে সবসময় জ্বর থাকলে করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৩১. রিসি নকমা : সারা শরীরে ঘা হলে করতে হয়। ১টি পাঁঠা ও ১টি মুরগি লাগে। চু লাগে ৩ থেকে ৪ টি।&lt;br /&gt;৩২. রিসি হানথাম : শরীর বেশি চুলকালে বিকেলে এই পূজা করতে হয়। মোরগ লাগে ১টি।&lt;br /&gt;৩৩.মিককাসি : চোখে চুলকানিসহ ব্যথা হলে করতে হয়। মোরগ লাগে ১টি।&lt;br /&gt;৩৪.সালবামন ফ্রিং : যখন-তখন শরীর ফুলে গেলে। মুখ বাঁকা হয়ে গেলে এই পূজা দিতে হয়। ১টি মোরগ লাগে। সকালে এই পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৩৫.সালবামন হানথাম : মুখ ফুলে গেলে এই পূজা করতে হয়। বিকালে পূজা দিতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৩৬.দালওয়া চিরিং : পা-মুখ ফুলে গেলে করতে হয়। হাঁস ১টি ও মোরগ ১টি লাগে। ধানের গোলা ঘরের সামনে এই পূজা দিতে হয়।&lt;br /&gt;৩৭.সুয়াবারি জাংগিম : শরীর হলদে রঙ হয়ে গেলে গোয়াল ঘরের মধ্যে এই পূজা করতে হয়। ১টি হাঁস ও ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৩৮.রাককাসি পাচাংগ্নি : দিন রাত সবসময় জ্বর হলে করতে হয়। খাদাম বানাতে হয় দুইটি। একটি ঘরের সামনে এবং অপরটি ঘরের পাশে। বড় মোরগ দিয়ে এই পূজা দিতে হয়।&lt;br /&gt;৩৯.দুমাগিবারিম্মা : প্রসূতির সন্তান হবার পর ফুল না পড়লে এই পূজা করতে হয়। পূজার সময় ১টি বড় মোরগ লাগে। মোরগটি দিয়ে ঘরের দরজায় বাড়ি দিতে হয়।&lt;br /&gt;৪০.মারাংরককা : প্রসূতির বাচ্চা হওয়া ও ফুল পরার পর অসুখ-বিসুখ না হওয়ার জন্য পূজা করতে হয়। পূজার সময় মুরগির ডিম লাগে।&lt;br /&gt;৪১.হাপুরু মিদ্দি : কানে কম শুনলে মোরগ দিয়ে পূজা দিতে হয়।&lt;br /&gt;৪২. সালজং দুবক নিয়া : শরীর অবশ হয়ে গেলে পূজা দিতে হয়। ১টি লাল মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৪৩.গনচুহাদক : বাচ্চা সবসময় কাঁদতে থাকলে মোরগ দিয়ে পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৪৪.গনচু নকসাম : বাচ্চা পাগলামি করে কাঁদলে ঘরের পেছনে পূজা দিতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৪৫.হারেদ্দা : শরীরে ঘা হলে পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৪৬.মইলা আমোয়া : বাচ্চা হয়ে শুধু মারা গেলে পূজা করতে হয়। শ্যাঁওড়া গাছের নিচে ১টি পাঁঠা এবং ১টি মোরগ দিয়ে এই পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৪৭.বুরগিদিক : বাচ্চা ঘন ঘন কাঁদলে পূজা দিতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৪৮.দুহাজাক : বাচ্চা হাত-পা ছেড়ে দিয়ে কাঁদলে এই পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৪৯.সালবংগি : প্রত্যেকদিন দুপুরে জ্বর হলে ঘরের চালের উপর খাদাম বসিয়ে পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৫০.খাণ্ডাব গুয়েরা : শরীরে ঠোসা পরলে করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৫১. তংরেংমা : মানুষের মাথা সবসময় ঘুরলে এবং পড়ার উপসর্গ হলে এই পূজা দিতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৫২.গান্দি গলদাক : সবসময় মাথা-ব্যথা হলে পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৫৩.আমিন্দা : কেঁপে কেঁপে জ্বর হলে পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৫৪.আসংদেননা : গ্রামের মানুষে একের পর এক জ্বর হয়ে মরতে থাকলে এই পূজা করতে হয়। ১টি পাঁঠা ও ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৫৫.শনি মারাং রগ্গা : নাক দিয়ে রক্ত পড়লে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৫৬.দারিচিক ফ্রিং দমকনা : সন্তান গর্ভে থাকা অবস্থায় পেটের ব্যথা হলে সকালে পূজা করতে হয়। ১টি পাঁঠা ও ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৫৭.বরিশাল : জ্বর হয়ে ঘন ঘন অজ্ঞান হয়ে পড়লে এই পূজা করতে হয়। পূজায় ১টি পাঁঠা, খই, কলা, চিনি, চন্দন প্রভৃতি লাগে।&lt;br /&gt;৫৮.দেনবিলসিয়া : জ্বর হলে পূজা করতে হয়। যেদিন পূজা সেদিনই খাদাম বানাতে হয়। পূজায় ভাত দিয়ে খামালকে ঢিল ছুঁড়তে হয়। ১টি শুকর লাগে।&lt;br /&gt;৫৯.মাইছা আমোয়া : মানুষের জ্বর হবার পাগলের মত অবস্থা হলে পূজা করতে হয়। নদীর ধারে যে কোন মাছ ও পাঁঠা দিয়ে বলি দিতে হয়।&lt;br /&gt;৬০.মিক্কাসি : চোখ ব্যথা ও চোখ দিয়ে অনবরত জল পড়লে এই পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৬১.দুব্রিংচা কাইচু গারিয়া : খুব দ্রুত শরীর ফুলে গেলে এবং ব্যথা হলে করতে হয়। ১টি লাল মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৬২.জাশুতা : জ্বর হলে মানসিক করে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৬৩.হাঙ্খি মিদ্দি : থেকে থেকে জ্বর হলে জলের ধারে এই পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৬৪.চলসি : মুখ কিংবা গাল ফুলে গেলে মোরগ অথবা ছাগল দিয়ে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৬৫.চিয়াবেং : কান বন্ধ হয়ে গেলে ১টি মোরগ দিয়ে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৬৬.চান্দ : রাতে জ্বর হলে এই পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৬৭. ওয়াককারাং : পায়ে ঘা হলে এই পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৬৮. বন দেবতা : অজ্ঞান হয়ে গেলে ১টি মোরগ অথবা ১টি শুকর দিয়ে এই পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৬৯.সুরিগিতিং : অসময়ে মাসিক হলে ১টি মোরগ দিয়ে করতে হয়।&lt;br /&gt;৭০. হাসি আমোয়া : কেঁপে কেঁপে জ্বর হলে মাটি দিয়ে গরু বানিয়ে পূজা দিতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৭১.কৃষ্ণ ঠাকুর : বাচ্চার ঘন ঘন জ্বর হলে আবার সেরে গেলে এই পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৭২.শুসিমি সংগরচা : মাথার চুল জট বেধে জ্বর হলে করতে হয়। ১টি শুকর এবং ৩/৪টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৭৩.ইস্কাল ওয়াদা : পায়খানা হয় না এবং ঘন ঘন বমি হয়। এরূপ হলে রাস্তায় এই পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৭৪.খংখান মিদ্দি : ঘন ঘন ঢেকুর হলে করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৭৫.দুরাহারাগাথ : বাচ্চা নেড়া হয়ে হাঁটলে মাটি উঁচু করে পূজা করতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৭৬.সাংকা বালা : ঘন ঘন জ্বর হলে দিতে হয়। ১টি মোরগ লাগে।&lt;br /&gt;৭৭.অলিবক : জণ্ডিস হলে করতে হয়। ১টি কবুতর লাগে। গার রোগ হয় সে প্রসাদ খাইতে পারে না।&lt;br /&gt;৭৮.মেঙ্গং মিদ্দি : পেটে প্রচণ্ড ব্যথা হলে করতে হয়। রাস্তার ধারে ১টি মোরগ দিয়ে এই পূজা দিতে হয়।&lt;br /&gt;৭৯. নকনি মিদ্দি : কেঁপে কেঁপে জ্বর হলে করতে হয়। ৩/৪টি চু, ৪টি মোরগ, ১টি শুকর অথবা ১টি পাঁঠা লাগে।&lt;br /&gt;৮০. `yiv¤^ywm : বাচ্চার জ্বর না ছাড়লে ১টি মোরগ দিয়ে এই পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);font-size:100%;" &gt;কোচ সমাজের অসুখ-বিসুখের দেব-দেবীর নাম ও সংক্ষিপ্ত পরিচয়&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.কাক মাঞ্চি : জ্বর হলে পূজা করতে হয়। দেবতার বাহন হাতি। আজুম গোত্রের যারা, তারা এই পূজা ঘরের বাইরে এবং সিমসাং গোত্রের যারা তারা ঘরের ভিতরে পূজা করে।&lt;br /&gt;২.যারাং : ম্যালেরিয়া হলে এই পূজা করতে হয়। এর বাহন ময়ূর। মোরগ দিয়ে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৩.বারুম খোলা : শরীরের ঘা ভালো না হলে হাঁস দিয়ে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৪.মুইলা : বাচ্চা ভূমিষ্ট হবার পর হঠাৎ করে মারা না যাওয়ার জন্য পূজা দিতে হয়।&lt;br /&gt;৫.ওয়াচিং দিল্লী : আমাশয়ের কারণে পেটের ব্যথা হলে বাঁশের চাকু বানিয়ে মোরগ কেটে এই পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৬.কামারতুকসাং : হাঁপানির মত কাঁশ হয়ে না গেলে ছাগল অথবা পাঁঠা বলি দিয়ে পূজা করতে হয়। পূজায় অব্যবহৃত হাল চাষের ফলা লাগে।&lt;br /&gt;৭.দুখুমবনিতা : মাথা ব্যথা হলে পাঠা বলি দিয়ে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৮.জগবোছা : বুকে ব্যথা হলে এই পূজা করতে হয়। মাদার গাছের ছুড়ি বানিয়ে কবুতর বলি দিতে হয়।&lt;br /&gt;৯.লামনি ওয়াই : পা ঝিম ঝিম করলে কবুতর দিয়ে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;১০.ঠ্যাংগামারা দেবতা : পা নেড়া হয়ে গেলে ভালো হবার জন্য পূজা করতে হয়। পা পাইন গাছ ও পাট দিয়ে শক্ত করে বেধে রাখতে হয়। রাস্তায় কবুতর বলির মাধ্যমে এই পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;১১.হুদুম ওয়াই : শরীর ব্যথা করলে এই পূজা করতে হয়। পূজায় পানের ২টি ডাল লাগে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);font-size:100%;" &gt;হাজং সমাজের অসুখ-বিসুখের দেব-দেবীর নাম ও সংক্ষিপ্ত পরিচয়&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.মইলা দেও : বাচ্চা প্রসবের পর পূজা করতে হয়। যেন বাচ্চার কোনো রোগ-বালাই না হয়। ছাগল অথবা পাঁঠা বলি দিতে হয়।&lt;br /&gt;২.হাও ঠাকুর : অসুখ-বিসুখ, বিপদ-আপদ থেকে রক্ষা পাবার জন্য পূজা করতে হয়। এই দেবতার বাহন গরু।&lt;br /&gt;৩.হাওয়া দেও : শক্তি বৃদ্ধির জন্য পূজা করা হয়।&lt;br /&gt;৪.ডাইনি : রোগ ভালো না হলে পাখি, ভেড়া অথবা হাঁস মানত করে রাস্তার তেমাথা মোড়ে পূজা করতে হয়।&lt;br /&gt;৫. পতে দেও : বাচ্চা মার দুধ না খেলে মানসিক করে পূজা করা হয়।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);font-size:100%;" &gt;&lt;br /&gt;অসুখ-বিসুখের দেব-দেবী ও মান্দি-কোচ-হাজংদের ধর্মীয় দর্শন :&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মান্দি-কোচ-হাজং ক্ষুদ্র জাতিসত্ত্বার প্রত্যেকের ধর্মে অসুখ-বিসুখ সম্পর্কে প্রায় একই ধরনের দার্শনিক চিন্তা কাজ করেছে। তাঁরা অসুখ-বিসুখকে পাপের শাস্তি হিসেবে দেখেন, দেখেন দেব-দেবীর অসন্তুষ্টির কারণ হিসেবে। এই সব ধর্মে অসুখ-বিসুখ সম্পর্কিত শত্রুর ধারণাও বিদ্যমান, যেখানে মনে করা হয় কবিরাজ বা এরকম শ্রেণীর লোক যারা তান্ত্রিক; তারা শত্রুতা বসত মানুষের অসুখ-বিসুখ ঘটাতে পারেন।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মান্দি, কোচ ও হাজং ধর্মীয় মতে মানুষের মৃত্যু আবশ্যিক হলেও আত্মা অমর। এই আত্মা পূর্বজন্মের ফলস্বরূপ মানুষ অথবা জীবজন্তু হিসেবে পৃথিবীতে আসেন। পূর্ব জন্মে পাপের সম্পূর্ণ শাস্তি না হলে তা ইহজন্মে অসুখ-বিসুখ হিসেবে ভোগ করতে হয়। কখনো কখনো ইহ জন্মেই মানুষ পাপের শাস্তি অসুখ-বিসুখের মাধ্যমে ভোগ করে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;এই সব ধর্মীয় মতে যেহেতু সৃষ্টিকর্তা পৃথিবী সৃষ্টি করেছেন, সেহেতু তাদের সৃষ্টিকর্তাকে নিয়ম মাফিক স্মরণ করা উচিত। কেউ যদি তাঁদের যথা নিয়মে স্মরণ না করেন, তাহলে তা পাপের পর্যায়ে পড়ে এবং পাপের শাস্তি হিসেবে অসুখ-বিসুখও হতে পারে। এইসব একই ধরনের দর্শনচর্চা মান্দি, কোচ ও হাজংদেও পৃথকভাবে দলবদ্ধ করে তোলে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);font-size:100%;" &gt;অসুখ-বিসুখের দেব-দেবী মান্দি, কোচ ও হাজং সমাজের নিজ নিজ দলবদ্ধ হওয়ার প্রতীক :&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;মান্দি সমাজে অসুখ-বিসুখ থেকে মুক্তির জন্য যে আমোয়া বা পূজা করা হয়, তা সাধারণত বাড়ির আশেপাশে পরিষ্কার-পরিচ্ছন্ন জায়গায় (কিমাণ্ডা) করতে হয়। সেখানে ৪টি বাঁশ পুঁততে হয়। ঐ স্থান মাটি দিয়ে সামান্য উঁচু করা হয়। খামাল বা পুরোহিত রোগীকে পুরুষ হলে কিমান্ডার ডান দিকে আর মেয়ে হলে বাম দিকে বসিয়ে মন্ত্রপাঠ করেন। যেদিন আমোয়া বা পূজা সেদিন অসুস্থ ব্যক্তির বাসায় পাড়া-প্রতিবেশী, আত্মীয়স্বজন সবাইকে শুকর, মোরগ এবং চু দিয়ে আপ্যায়ন করা হয়। এ সময় ঐ বাসায় নাচ-গান অনুষ্ঠিত হয়। প্রথমে খামাল এবং পরে সকল বয়সের নারী-পুরুষ এই নাচ-গানে অংশগ্রহণ করেন, যা তাদের মধ্যেকার সামাজিক ও সাংস্কৃতিক সম্পর্ককে শক্তিশালী করে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;হাজং ও কোচ সমাজেও পূজা-পার্বনের দিন সকল শিশু-কিশোর-যুবক-যুবতী-বৃদ্ধ-বৃদ্ধা নানান নাচ-গান ও আলাপচারিতায় মেতে ওঠেন যাকে আমরা নিজেদের দলবদ্ধ হওয়া ও সামাজিক-সাংস্কৃতিক সম্পর্ক বিকাশের প্রতীক হয়েই ফুটে উঠতে দেখি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;কিন্তু পরিতাপের বিষয় এই যে, এই সব দেব-দেবীর নাম ও আচারাদি সংগ্রহ করতে গিয়ে দেখেছি অনেক আচার-অনুষ্ঠানই হারিয়ে যেতে বসেছে। নানান জনের সাথে আলাপ করতে গিয়ে মনে হয়েছে এগুলো হারানোর পিছনে যতোটা না অর্থনৈতিক ব্যবস্থা দায়ি, তারচেয়ে বেশি দায়ি নিজেদের ধর্মীয় বিশ্বাস নিজেরাই খাটো করে দেখা। কেননা অর্থনৈতিক ব্যবস্থা উত্তরণের জন্য ধর্মান্তরিত হওয়া ছাড়াও আরো অনেক পথ রয়েছে। ধর্মই যেখানে বিশ্বাসের উপর প্রতিষ্ঠিত সেখানে নিজধর্মকে অযৌক্তিক বলে আরেকটি ধর্মে ধর্মান্তরিত হওয়া কতখানি যৌক্তিক-আপনারা কি একবার ভেবে দেখবেন ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;শ্রদ্ধাষ্পদেষু&lt;br /&gt;1. জনিক নকরেক, চুনিয়া, মধুপুর, টাঙ্গাইল।&lt;br /&gt;2. মতিলাল হাজং, সুসংদূর্গাাপুর, নেত্রকোনা।&lt;br /&gt;3. সহিন মৃ, চুনিয়া, মধুপুর, টাঙ্গাইল।&lt;br /&gt;4. নেত্তা নকরেক, হাগুরাকুরি, মধুপুর, টাঙ্গাইল।&lt;br /&gt;5. হাজং অশ্বিনী কুমার রায়, লাঙ্গলকোরা, ধোবাউড়া, ময়মনসিংহ।&lt;br /&gt;6. স্মরেন কোচ, খলচান্দা, নালিতাবাড়ি, শেরপুর।&lt;br /&gt;7. সুধীর হাজং, সমশ্চুরা, নালিতাবাড়ি শেরপুর।&lt;br /&gt;8. যুগল কিশোর কোচ, রাংটিয়া, ঝিনাইগাতি, শেরপুর।&lt;br /&gt;9. পঙ্কজ দেবর্ষি, লাঙ্গলজোড়া, ধোবাউড়া, ময়মনসিংহ।&lt;br /&gt;বিশেষ কৃতজ্ঞতাঃ&lt;br /&gt;১.পরাগ রিছিল, জয়রামকুরা, হালুয়াঘাট, ময়মনসিংহ।&lt;br /&gt;২.বচন নকরেক, চুনিয়া, মধুপুর, টাঙ্গাইল।&lt;br /&gt;৩.সৃজন সাংমা, গবেষণা কর্মকর্তা, বিরিশিরি কালচারাল একাডেমী, নেত্রকোনা।&lt;br /&gt;ঊল্লেখ্যঃ জানিরা, ১৪তম সংখ্যা, সম্পাদক-সৃজন সাংমা, প্রকাশকাল-১৯৯৭, জুন।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;চাকমা নাটক ও জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিল&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;মৃত্তিকা চাকমা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;১৯৭১ সালে বাংলাদেশ প্রতিষ্ঠার পরপরই অবিভক্ত পার্বত্য চট্রগ্রামে আদিবাসী সংস্কৃতি চর্চার একটা জোয়ার এসেছিল। এ জোয়ারের প্রধান ভূমিকা পালন করে তৎকালীন ছাত্রসমাজ আর পার্বত্য চট্রগ্রামের একমাত্র সাংস্কৃতিক সংগঠন গিরিসুর শিল্পী গোষ্ঠী। বলতে গেলে আদিবাসী জনগোষ্ঠীর প্রত্যন্ত অঞ্চলে সংস্কৃতি চর্চার বিকাশ ঘটে-নাচে, গানে, পোষাক-পরিচ্ছদে। সুখের বিষয় এ ধারা এখনো প্রবাহমান।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 102, 0);font-size:100%;" &gt;ক্রমিকনং-নাটকের নাম-নাট্যকারের নাম-মঞ্চায়ন-সন&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.আনাত্‌ ভাজি উধে কামু-চিরজ্যোতি চাকমা-১ বার-১৯৮৩&lt;br /&gt;২.যেযে দিনত কাল-শান্তিময় চাকমা-২ বার-১৯৮৪&lt;br /&gt;৩.বিঝু রামর স্বর্গত্ যানা-শান্তিময় চাকমা-২ বার-১৯৮৫&lt;br /&gt;৪.আন্দারত জুনিপহর্‌-শান্তিময় চাকমা-১ বার-১৯৮৬&lt;br /&gt;৫.দেবংসি আধর কালা ছাবা-মৃত্তিকা চাকমা-২ বার-১৯৮৯&lt;br /&gt;৬.গোঝেন-মৃত্তিকা চাকমা-১ বার-১৯৯০&lt;br /&gt;৭মহেন্দ্রর বনভাজ-মৃত্তিকা চাকমা-২ বার-১৯৯১&lt;br /&gt;৮.এক জুর মানেক-মৃত্তিকা চাকমা-১ বার-১৯৯২&lt;br /&gt;৯.অয় নয়া বৈদ্য-ডা. ভগদত্ত খীসা-১ বার-১৯৯৩&lt;br /&gt;১০.ঝরা পাদার জীংকানি-শান্তিময় চাকমা-২ বার-১৯৯৪&lt;br /&gt;১১.জোঘ্য-মৃত্তিকা চাকমা-১ বার-১৯৯৪&lt;br /&gt;১২.অদত্&amp;amp;-ঝিমিত ঝিমিত চাকমা-১ বার-১৯৯৫&lt;br /&gt;১৩.আন্দালত পহ্‌র&amp;amp;-ঝিমিত ঝিমিত চাকমা-১ বার-১৯৯৬&lt;br /&gt;১৪.হককানীর ধন পানা-মৃত্তিকা চাকমা-৯ বার-১৯৯৯&lt;br /&gt;১৫.কাত্তোন-ঝিমিত ঝিমিত চাকমা-২ বার-২০০০&lt;br /&gt;১৬.এগাত্তুরর তরনী-মৃত্তিকা চাকমা-২ বার-২০০১&lt;br /&gt;১৭.ভূত~মৃত্তিকা চাকমা-২ বার-২০০২&lt;br /&gt;১৮.দুলু কুমোরী-তরুন চাকমা-৪ বার-২০০৩&lt;br /&gt;১৯.অঈনজেব-ঝিমিত ঝিমিত চাকমা-২ বার-২০০৪&lt;br /&gt;২০.চিত্রা নদী পারে-মৃত্তিকা চাকমা-৩বার-২০০৫&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;স্বাধীনতার দশ বছর পর ১৯৮১ সালের ২৭ ফেব্রুয়ারি একদল পড়ুয়া তরুনদের মাধ্যমে জন্ম হয় রাঙ্গামাটি ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিল-বর্তমানে জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিল (জাক)। পার্বত্য চট্রগ্রামের আদিবাসী নন্দনতাত্ত্বিক বিষয়গুলোর পাশাপাশি চাকমা ভাষায় নাট্য চর্চার ক্ষেত্রে বলিষ্ঠ ভূমিকা পালন করে। এর ধারাবাহিকতায় গত ১৯৮৩ সাল থেকে ২০০৫ সালের মধ্যে যতগুলো নাটক মঞ্চায়ন হয়েছিল তার পরিসংখ্যান এখানে তুলে ধরা হলো-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৮০ দশকের শুরুতেই জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিল (জাক) যখন চাকমা নাটক মঞ্চায়নের কাজ শুরু করে তখন রাঙ্গামাটির গুটিকয়েক তথাকথিত আদিবাসী জ্ঞানীজন-গুণীজন জাক এর কর্মীদের উপর সমালোচনায় উন্মুখ। তাঁদের ধারণা নাটক মানে শুধু বাংলা ভাষায়, কী মঞ্চে কী লেখ্য রূপে! কীভাবে সম্ভব চাকমা ভাষা দিয়ে চাকমা নাটক! মোটকথা তাঁদের বক্তব্য- যারা চাকমা নাটকের নামে মঞ্চে অভিনয় করবে তারা পাগল ছাড়া কিছুই নয় । এভাবে বিভিন্ন জনের বিভিন্ন আলোচনা-সমালোচনা সহ্য করে জাক এগিয়ে যায়। অপর দিকে উপজাতীয় সাংস্কৃতিক ইনিষ্টিটিউট-উসাইও সহযোগিতার হাত প্রসারিত করে জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিলকে। এবং এভাবে পার্বত্য চট্রগ্রামের প্রত্যন্ত অঞ্চলে ছড়িয়ে পড়ে চাকমা নাটকের বিভিন্ন দিক। এরপর চাকমা নাটক আন্দোলনের চলার পথে এগিয়ে আসেন ঢাকা শিল্পকলা একাডেমীর নাট্যকলা ও চলচ্চিত্র বিভাগের সহকারী পরিচালক গোলাম হাবিবুর রহমান মধু (বর্তমানে অবসরপ্রাপ্ত)। তাঁর প্রচেষ্টায় সপ্তাহ ব্যাপী রাঙ্গামাটি শিল্পকলা একাডেমীতে আধুনিক নাটকের কলাকৌশল সম্পর্কে কর্মশালা সমাপ্ত হয়। তাঁর কর্মশালার উপর ভিত্তি করে জাক পরবর্তীতে তাদের নাটকগুলোতে আঙ্গিকগত দিক পরিবর্তন ঘটায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯৯১ সাল। দেশের সিংহাসন বদল হয়। সামরিক শাসকের হাত থেকে গণতান্ত্রিক সরকারের হাতে। ঠিক ঐ সময়টাতে বিঝুর সময় জাক মঞ্চায়ন করে মৃত্তিকা চাকমা রচিত মহেন্দ্রর বনভাজ । রাঙ্গামাটিতে নাটকটির সফল মঞ্চায়ন দেখে বাংলাদেশ শিল্পকলা একাডেমীর নাট্যকলা ও চলচ্চিত্র বিষয়ক সহকারী পরিচালক গোলাম হাবিবুর রহমান জাক কে আমন্ত্রণ জানান ঢাকাতে নাটকটি মঞ্চায়িত করার। আর এভাবেই ঢাকায় শিল্পকলা একাডেমীর মঞ্চে প্রথম চাকমা নাটক মঞ্চায়নের ফটক উন্মোচিত হয়। নাটকটির অংশ বিশেষ নিম্নরূপঃ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মহেন্দ্রর বনভাজ&lt;br /&gt;মৃত্তিকা চাকমা&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;দৃশ্য- ১&lt;br /&gt;অক্ত: সাঝন্যা মাধান&lt;br /&gt;জাগাঃ গভীন ঝার&lt;br /&gt;[ গাঝ-বাঝর ঝুব সেরে অনুমহর ৫০/৬০ বজস্যা উক্ক মিলে (মহেন্দ্রর মা) কোঙেই কোঙেই থাক্কে দেঘা যেব। সে সেরে অক্ত অক্ত জন্তুর জানুয়াররর শুনযেব। মিলেবোর ধাগেদী উক্ক কুলা্যাঙ দেঘা যেবÕ]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মাঃ ( উদ্যা-ভূদ্যা বাদে) ইঁ-হিঁ, ও মা, মাআ মারে, ও-উ-উমা, মারে। অযাঁ কবাল, ও কবাল। কবাল, ও তুই কিয়ে এধক সেয়ান্যান অহ্‌লে-ই-ই। এ্যাঁ কবাল? ( মিলেবোর আহ্‌বিলেজর সমারে সমারে জীবজন্তুর-র উন শুন যেব। সেরেউনে মিলেবোর কান পাদি শুনি থেব )-মহেন্দ্র, মহেন্দ্র-অ-অ! আঁ পুদ, ও পুদ, কুধু যাজ্‌? মহেন...&lt;br /&gt;( ফাদা তালি দিয়ে কাবরান তিঙতিঙ্যা গোরি মু-উড়িব'। হাক্কন পর মহেন্দ্র গাঞ্জা পিন্যা, তালি দিত্যা শিথুম উক্ক উস্যা, তাগল এক্কান আহ্‌ধত আর কানাত কয়উক্ক কলাত্তুর বোগোলী, সে--- বনর লদা-পাদা লোই, তা মারে দুরত্তুন দাঘী দাঘী এব')&lt;br /&gt;মহেন্দ্রঃ মা, ও-মা, মা!( পঝানী থব) মা ঘুম গেলে নাকি? ও মা ( এবার কারবান উল্লেই তামারে কবালত ধোরী চেই ) মা, আ কি কেয়্যান উম্‌ উম্‌ পাঙর? জ্বর উথ্যাদে মা?&lt;br /&gt;মাঃ ( এবার তা মা এক্কা চাত্তেই) মহেন, এলেদে বা?&lt;br /&gt;মহেনঃ অয় মা।&lt;br /&gt;মাঃ আ এধক্কন কুধু যেয়স বা? রেত অল্লি, মুই দ ডাক্কে ডাক্কে অরান অলুং।&lt;br /&gt;মহেনঃ কি গোত্তুং মা । এ্যাই-এ-মা, কলাত্থুর, বগলী আন্যং। উদ্‌ মা খেদং মালে।&lt;br /&gt;( পোজ্যাতুন মহেন্দ্র তা মারে ধোরি তুলিব)&lt;br /&gt;-মা, আ কেয়্যান এধক কিয়ে উম্‌ উম্‌ ওইয়্যা?&lt;br /&gt;মাঃ আঁ পুদ, দুগর পিরে উকুল্যে অয়দ্যা আয়!&lt;br /&gt;মহেনঃ দারুঅদ নচিনং, তেহ্‌ কি অভ মা?&lt;br /&gt;মাঃ কি আর অভ। ( লাম্বা উক্ক-ব নিজেস ফেলেব)&lt;br /&gt;মহেনঃ রেদ অল্লি মা, কুঝি কুঝি থুরুন খেইল। ( কলাত্থুরুন তা-মারে বেহ বেই দিব।)&lt;br /&gt;মাঃ আ, তুই ন খেবে বা? ( পাঘোর শুলিব)&lt;br /&gt;মহেনঃ মুই সিধু খেয়ং। পেদ নপুরের আর। মা, তুই খা।&lt;br /&gt;মাঃ কোদ্দুরত যেয়স বা?&lt;br /&gt;মহেনঃ (দুরত গোরি দেঘেই দিব) উই-ও-বো, উন্দি দোনাবত যে কলাবনান দেঘর, এ্যাঁ সিধু।&lt;br /&gt;মাঃ ও মারে, মা, আ-এদ্দুরত কিত্তে যেয়স ! নারে না, সেয়ন্যান গোরি ন যেইস আর। খেই-ন'পেলেও ন' যেইস।&lt;br /&gt;মহেনঃ চিদে ন'গোরিস মা! বানা ভগবান ইধু সুরনগর, আমি যেন মাদি-মাদি এই বনভাঝত্তুন মুক্ত ওই পারিয়।&lt;br /&gt;মাঃ আঁ পুদ! বনভাঝত পোজ্জোইদে পোজ্জেই, আঝা-দ' ন'গরঙর, মুক্ত ওই পারিবং।&lt;br /&gt;মহেনঃ বাজি থেলে একদিন অভঙ। ও...হো...মা তুই হাক্কন থেই পারিবেনি? এক্কা গজ্জংগাজ' তেলান আন্দুগঙই।&lt;br /&gt;মাঃ নারে পুদ, না! এ্যা-রেদি বেলি মায়!&lt;br /&gt;মহেনঃ বেজ্‌ দুরত নয়, যেমও এম্মোই। ( আঙুল্লোই দেঘেই দিব)&lt;br /&gt;- উ...ই...ই...ও...য়ো..বো।&lt;br /&gt;মাঃ কি গত্ত, থোক।&lt;br /&gt;মহেনঃ চেরাক জ্বালেই পারিবঙ-দ'মা।&lt;br /&gt;মাঃ এই ঘুর আন্দারত চেরাক জ্বালেই কি উধো পেব'?&lt;br /&gt;মহেনঃ অন্তত: আমা মুজঙান-দ' অভ'।&lt;br /&gt;মাঃ যা সালেন। ( মহেন্দ্র তাগলান আহধলোই যেবগেহ'। ইন্দি তা মা কলাত্থুর খানা মুমগোরি বোগালীত্তুন চিবি পানি পিয়েই খেই আর, কাবরান উড়ি ঘুমত পোরিব। হাক্কন পর জিয়েন পায়রর শুন' যেব'। তারপর বোম্বা উক্ক ধোরেই মহেন্দ্র এবগোই। আহ্‌ধত কিছু লদি জাবুর ও থেব।)&lt;br /&gt;মহেনঃ মা, ও মা, ঘুম গেলে না কি? মা-&lt;br /&gt;মাঃ ( কাবরান উল্লেই) এলেদে বা? কোই কত্তমান পেয়স?&lt;br /&gt;মহেনঃ ( বোম্বাবো দেঘেই) ইয়ত বেক্কান ভোরেয়ং মা। দর-মা, ধোরিস্‌ । ( মহেন্দ্র বোম্বাবো তা মারে দিব)&lt;br /&gt;-ইন্দি দেঘা মা, মুই তরে দারু কাদি দোং।&lt;br /&gt;মাঃ থোক্‌ থোক্‌, সে-নচিন্যা-ন' মেল। কি পাদা উদিজ নেই!&lt;br /&gt;মহেনঃ বনর লদা পাদা ফেলা ন যায়, এক্কান নয় এক্কান গুন থায়।&lt;br /&gt;মাঃ পুদ সেদক্কানি নয়, বোম্বাবো আগে ধরা; আগে ইত্তুন লোড়িয়।&lt;br /&gt;মহেনঃ আ কিয়ে মা?&lt;br /&gt;মাঃ মত্তুন এব্রে কেজান কেজান মনে অত্তে।&lt;br /&gt;মহেনঃ মা, কুধু আর যেবং, যিদু যেদং সাদ্‌ ঝার-জঙ্গল লাঘত পেবং।&lt;br /&gt;( আর জিয়েন পায়র সারা শব্দ শুন যেব। আর সিয়েবেজ্‌ তা মা চক্কমক্ক অভ)&lt;br /&gt;মাঃ বা, ইত্তুন গেলে দোল অভ দে। মুই দরাঙর। যেই, বা যেই।&lt;br /&gt;মহেনঃ যেই আয় সালেন মা, দে-উদ।&lt;br /&gt;( তারা পঝা বিরোন তোগেই-বিগেই লেই, মহেন্দ্র ও তা পঝানি বাঙা-মোস্যা গোরি লোই বোম্বাবো এক আহ্‌ধে, আর তাগলান আর এক আহ্‌ধে ধোরি লারে লারে আহ্‌ধা ধোরিবেক। )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২৫ জনের একটা বিশাল গ্রুপ নিয়ে ঢাকার বুকে নাটক মঞ্চায়ন করে আসা বিরাট ব্যাপার। তবে এ সাফল্যের পেছনে রাঙ্গামাটি, চট্রগ্রাম, ঢাকায় স্বজাতীয়দের অনেক প্রেরণা রয়েছে। সুখের বিষয় উক্ত নাটকটি জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিল (জাক) পড়ম অডিও এবং ভিডিও ধারণ করে ঐ শিল্পকলা একাডেমী মঞ্চে। প্রায় সাত বছর পর আবার বিঝুর সময় পরিবেশিত ঝিমিত ঝিমিত চাকমা রচিত ও নির্দেশিত আন্দালত পহ্‌র' মঞ্চে ভিডিও ধারণ করা হয়। আর এভাবেই বহি:দৃশ্যের চিত্রায়নও করতে সক্ষম হয় জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিল।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিলের নাট্যচর্চা ক্ষেত্র প্রসারিত হওয়ার সাথে সাথে বন্ধুত্ব গড়ে উঠে দেশ-বিদেশের বিভিন্ন সংগঠনের সাথে। তার মধ্যে প্রথম এগিয়ে আসে আরণ্যক নাট্যদল । একসময় উক্ত সংগঠনের এক সিনিয়র কর্মী পাভেল আজাদ (আজাদ আবুল কালাম) জাক-র নাট্য কর্মীদের নিয়ে সপ্তাহব্যাপী নাট্য কর্মশালা সমাপ্ত করেন। বর্তমানে তিনি প্রাচ্য নাট এর কর্ণধার হয়ে সাফল্যের সাথে কাজ করে যাচ্ছেন। তাঁর ঐ কর্মশালার জন্য জাক-র নাট্যকর্মীরা তাকে আজীবন স্মরণ রাখবে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;অশান্ত পার্বত্য চট্রগ্রাম শান্ত হলো। ২রা ডিসেম্বর ১৯৯৭ সালে পার্বত্য শান্তি চুক্তির পর বদলে গেলো পার্বত্য অঞ্চলের সামাজিক-সাংস্কৃতিক প্রেক্ষিত। বদলে গেলো জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিলের নাট্য গতিধারা। এই পরিবর্তনের নতুন ধারা পরিস্ফুট হয় হককানির ধন পানা নাটকে। ২০০০ সালে আন্তর্জাতিক মাতৃভাষা দিবস উপলক্ষ্যে এই নাটকটি মঞ্চায়িত হয় ঢাকার কেন্দ্রীয় শহীদ মিনার, মিরপুর স্টেডিয়াম, মহিলা সমিতি মঞ্চ সহ কয়েকটি জায়গায়। নিচে হককানী ধন পানা নাটকের একটি দৃশ্যের কিছু সংলাপ পত্রস্থ করা হলো-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;দৃশ্য-৩&lt;br /&gt;অক্তঃ সাঝন্যা মাধান।&lt;br /&gt;জাগাঃ মনতুলী মোন।&lt;br /&gt;[jvBU এযানার সমারে কেড়ংচানে তা বাঙামোচ্যা ভুদিবোলোই তা আহ্‌ধানার ¯^fv‡e জুরি বাজেই বাজেই এব। এ্যান সলাত পদ পাজাবত দেঘে উক্ক কলাপাদা উগুরে ভাদপোই। সিভে আদেক্যা গরি দেঘী খুঝি অহয়। আ আমক ওই সাগত সাগত উগুরী উধে। এ্যানেহ্‌ এ্যানেহ্‌ ভাত্তুন খেবার ভাত্তুন ভালীগরি লাচোচ্‌ জাগে। এ্যাহন গত্তে গত্তে ভুদশুদ্দো মেক্কের গরি বঝি ভাত্তুন খা ধোরিবÕ]&lt;br /&gt;কেড়ং চানঃ ( তা মুদ্রা দুঝে কেড়ংকাড়াং ওই )&lt;br /&gt;-এ্যাঁহ। ( আমক ওই হাক্কন পর )&lt;br /&gt;-ভাদ। ঘেক্‌ঘেস্যাক ভাত্তেই। ইধু কি মানুজ আঘন? ( এক্কা আমক ওই ভাবিব )&lt;br /&gt;-মানুষ্য কন মাদিত্‌ গেল নি কি! (ভাদ ভাইপো রেনী চায় আর ধুব গিলে)&lt;br /&gt;-গম তোন আঘে। কাঙারাচাক বাত্যা অভদে পারাপাং। (কায় নিনে চুমি চানার পর)&lt;br /&gt;-হিঁ: চিধোল দিএ্যা মরিচ বাত্যা। হাক্কে মা দেবী লুমিলেগী থুত্‌তুরি খেম্মে।&lt;br /&gt;(এবার ডেনে-বাঙে লুচ্চো মু গরি রেনী চেই পাগুলুং পাগুলুং খা ধরিব। এযান অক্তত হককানী এযাই)&lt;br /&gt;হককানীঃ টে ট্‌ টে রেক। (কেড়ংচানে উগুড়ি উধি ঝরাদত্‌ ভাত্তুন ঝারেই ফেলেই)&lt;br /&gt;এ ভাত্তুন কুধু পেলে?&lt;br /&gt;কেড়ং চানঃ (থদ-মদ ওই) এ-এযা-এ ঘুথ্যাবোত মা-দেবী।&lt;br /&gt;হককানীঃ (আমক ওই) ঘুথ্যাবোত! ডসউন তুই খত্তে? ডছ-ছি! ই ঘিনাচ? কি ভাত্তে ইধিজ নেই, এদা ডাক্যে, না কন এক্কান গোস্যা! তুই মুনিচ্চর ন অহভে!&lt;br /&gt;কেড়ং চানঃ মুরো উধি লামি, উধি লামি পেদ পরায় অহ্‌বানে, পেয়উং খাঙত্তে। মা-দেবী মুই তত্তুন হেমা চাঙর। এব্রে ন খেম আর। এই কানত ধোরি সমত হাঙর।&lt;br /&gt;হককানীঃ একজনর এ্যাহ্‌ধা গোচ্যা ভাদপোই তুই কেনে হেই পাবচ! এুই ভাবী কুল ন পাঙর। ছিঃ...&lt;br /&gt;কেড়ং চানঃ এ্যানে দ অহয়। একজনর ভাদপোই অন্যজনে হেই দেনা অজিত নয়।&lt;br /&gt;হককানীঃ তে? আ তুই কিয়ে মেধেরা হঅর?&lt;br /&gt;কেড়ং চানঃ কি গোত্তুং মা-দেবী, লুভ সামেলেই ন পারং।&lt;br /&gt;হককানীঃ “লুভে পাব পাবে মৃত্য- হবর পাচ?&lt;br /&gt;কেড়ং চানঃ ( এঘক গরি থেঙত পরি) মা-দেবী যা গোচ্যং আর ন গরিম। মরে পাব হোন্দেই দে।&lt;br /&gt;হককানীঃ (রাগ দেঘেই) অ-হ্‌-য়! তুই পাব গরিদে মুই হোন্দেই দিদুং।&lt;br /&gt;কেড়ং চানঃ ( থেঙত বেড়েই ধরি) মুই ইমে হাঙর মা-দেবী।&lt;br /&gt;হককানীঃ ইম্‌েহ! তরে আর এক খেপ দেঘং। (গিয়েরে কোই থেঙান তুলি নি)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(এবার সরান পেই লুচ্ছো মু গোরি হককানরি পিজে পিজে যেব গোই) বাত্তি যারেবাক।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২০০০ সালের শেষ প্রান্তে গ্রুপ থিয়েটার ফেডারেশনের সহযোগিতায় ঝিমিত ঝিমিত চাকমা রচিত কাত্তোন নাটকটি ঢাকা মহানগর নাট্যমঞ্চে মঞ্চস্থ হয়ে বিপুল সাড়া জাগায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মঞ্চ নাটকের পাশাপাশি জাক নাট্যকর্মীরা ঝিমিত ঝিমিত চাকমা রচিত আন্দালত পহ্‌র নাটকটি সুপার ভিএসএস ক্যামেরার মাধ্যমে বহিঃদৃশ্য ধারণের মাধ্যমে টিলিফিল্ম নিমার্ণে সক্ষম হয়। বলতে গেলে শুধু চাকমা সংস্কৃতি অঙ্গন নয়, গোটা জুম্ম সংস্কৃতির জন্য এটি একটি বড় কাজ। এর পরবর্তীতে শ্রী পরেশ নাথ চাকমা ও পুস্পিতা খীসার সহায়তায় ১৯৯৮ সালে জানুয়ারি ৭ তারিখ চট্রগ্রাম টেলিভিশন কেন্দ্রে একটি প্যাকেজ প্রোগ্রাম সুষ্ঠুভাবে সম্পাদন করে দর্শকদের মধ্যে বিপুল সাড়া জাগায়। মোটামুটি এভাবে এগিয়ে চলেছে চাকমা নাট্য সাহিত্য। জাক এ পর্যন্ত ২০টি নাটক মঞ্চায়ন করেছে। ২০০৫ সালে জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিলের ২৫ বর্ষ পূর্তি উপলক্ষ্যে সর্বশেষ মঞ্চায়িত নাটক চিত্রা নদীর পারে। এভাব নাট্য চর্চার পাশাপাশি অন্যান্য মাধ্যমে এগিয়ে যাওয়ার ফলে বর্তমানে জুম ঈসথেটিক্‌স কাউন্সিল দেশে-বিদেশে সুনাম অর্জন করতে সক্ষম হয়েছে।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;খাত্তাদক্কা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 204, 0);"&gt;পরাগ রিছিল&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;খাত্তা শব্দের অর্থ কথা আর দক্কা শব্দের অর্থ বাজানো। মান্দি রীতি অনুসারে কোন অনুষ্ঠান শুরু হলে প্রথমে নাগ্‌ড়া (এক প্রকার ঢোল) বাজিয়ে আমন্ত্রণ জানানো হয়। সে হিসেবে খাত্তাদক্কার অর্থ দাঁড়ায় আহবান । খাত্তাদক্কা কোথাও পরিচিত দিগ্গ্যি-বান্দি হিসেবে। ওয়াল্লা ওয়ালসন্‌নি সাল্লা সালসন্‌নি দিনরাতভর শুনলেও এই কাহিনী শেষ হবার নয়। মূলতঃ দিগ্গ্যি ও বান্দির বীরত্বগাঁথা বর্ণিত হয়েছে খাত্তাদক্কায়। ঘটনার ধারাবাহিকতা, পরিবেশ-পরিপার্শ্ব বর্ণনার সাথে এসে গেছে মান্দিদের অনেক সামাজিক নিয়ম-কানুন, জীবন-যাপন প্রণালী। যদিও তারা আমাদের মতো একেবারে স্বাভাবিক মানুষ নয় একই সাথে মিদ্দিরাং-মান্দিরাং  দেবত্বপ্রাপ্ত। খাত্তাদক্কায় বান্দিকে জামাই দেখতে যাওয়ার জন্য সংশ্লি­ষ্টজনদের আহবান জানানো হয়। আমন্ত্রণ দাতা কখনোবা তৃতীয় ব্যক্তি, মাঝে মাঝে অন্তর্ভুক্ত চরিত্রগুলো কথা বলে ওঠে বা আমন্ত্রণ জানায় এবং নিজের ও অন্যান্যদের কর্তব্য নির্দেশ করে। দিগ্গ্যি ও বান্দি দুভাই-সিম্মিজিং, থিংকিজিং তাদের বোন। অপরদিকে খানজিং (সুরি) ও গিদ্দিং দু'বোন। বান্দিদের মামার মেয়ে। মান্দি সমাজের নিয়মানুযায়ী মামাতো বোনের সাথে বিয়ে হয় এবং মামাতো বোন/ভাইয়ের সাথে বিয়ের দাবিই থাকে সামাজিকভাবে প্রথম ও প্রধান। বান্দির মামা সাংমার্‌চ্চা (সাংমারাচ্চা)। তিনি বান্দির ছোটবেলায়ই তার বড় মেয়ে সুরির জন্য বান্দিকে জামাই নিবেন বলে বোন (বান্দির মা), আত্মীয়-স্বজন এবং গ্রামবাসীদের সাথে কথা বলে আসেন। বন্ধন তৈরী করে আসেন। তারপর তিনি আর সেদিক যাননি। মেয়েরা বড় হলে-বিবাহযোগ্য হলে; তিনি জামাই দেখতে যাওয়ার প্রয়োজনীয়তা বোধ করেন। সে মতো প্রস্তুতি নেন। তবে দিগ্গ্যি ও বান্দি দুভাই বীর এবং সূর্যোদয়-সূর্যাস্তের পুত্র বলে...স্বয়ং মামাও (সুরির বাবা) তাদের ব্যাপারে চিন্তামুক্ত বা আশঙ্কামুক্ত নন। তাই গ্রামবাসী সবাইকে যথাযথ ব্যবস্থা নেয়ার জন্য বলেন। জামাই দেখতে-ধরতে যাওয়ার দলে অভিজ্ঞ, শক্তিশালীদের ভারী করেন। তার আরেকটি কারণ হলো বরযাত্রীদের দলে অনেক যুবতীরাও রয়েছেন; তবে গ্রামের সব যুবককে সাথে নেননি। নির্দিষ্ট সংখ্যক শক্তিশালী যুবকদের গ্রামে রেখে গিয়েছেন। কেননা সেই সুযোগে গ্রাম শত্রুপক্ষের দ্বারা আক্রমণের শিকার হলে তারা যাতে প্রতিরোধ করতে পারেন।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ওদিকে...তাদের আসার কথা শুনে বান্দির দল প্রস্তুতি নিতে থাকে। মহিলারা কলাপাতা ছিঁড়তে-লাকড়ি সংগ্রহ করতে যায়। রান্নাবান্না করতে থাকে। বান্দি ঘরের রাস্তা সোনা দিয়ে লেপন করে রাখে! যেখানে এসে দাঁড়াবে, সেইসব স্থান। উজ্জ্বলতায় চোখ ধাঁধিয়ে যায়!! সামনে যারা ছিল তারা বোকা বনে দেখতে থাকে। বরযাত্রীরা কত জন এসেছে গুণে দেখতে বলে। কি এনেছে কি আনেনি, কোনোকিছু আনতে বাদ পড়েছে কিনা সেসব দেখতে বলে। যা যা এনেছে সেসব তাদের জন্যেও নিয়ে যেতে হবে। সাংমার্‌চ্চা (সাংমারাচ্চা) দুই মেয়েকেই সাথে নিয়ে এসেছে। বান্দি মনে মনে ঠিক করে সে গিদ্দিংকে বিয়ে করবে। সুরিতো তার দাদা দিগ্গ্যির! এদিকে দিগ্গ্যি কুনো ব্যাঙের ছাল দিয়ে পোষাক বানিয়ে পড়ে। যাতে কেউ তার কাছে না ঘেঁষে-তাকে পছন্দ না করে। আলাপ-আলোচনা শেষ হয়। বান্দি বলে, জোড়াজুরি করলে সে যাবে না। তাকে জোড় করতে হবে না-ধরতে হবে না। সে তার মামাকে দেখাশুনা করতে জামাই যাবে। বিয়ে করবে গিদ্দিংকে। সূর্যের কপাট বন্ধ হয়ে আসে। চারপাশে আঁধার নামতে থাকে। সাংমার্‌চ্চার(সাংমারাচ্চার) দল খাওয়ানো শেষ হলে যেসব বড় পাত্রে চু-খাবার দাবার নিয়ে এসেছিল সেসব নিয়ে ফেরার প্রস্তুতি গ্রহণ করে। দিগ্গ্যি ছোটভাই বান্দি-কে বোঝায় যেন শ্বশুর-শ্বাশুড়ি-সম্বন্ধিদের সাথে ঝগড়াঝাটি না করে। গ্রামবাসীদের সাথে ভালো আচরণ করে। বিদায় পর্ব চলে। মা-বাবা, বন্ধু-বান্ধব এতদিনকার পরিচিত প্রতিবেশ রেখে চলে যাবে-। বান্দি ঘরের খুঁটি ধরে অঝোরে কাঁদতে থাকে। কেউ তাকে টানতে পারে না-নাড়াচাড়া করাতে পারে না-বোঝাতে পারে না। ...অবশেষে বরযাত্রীরা বান্দিকে সাথে নিয়ে নিজেদের গ্রামে ফিরতে থাকে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;শিল্পরীতির দিক দিয়ে খাত্তাদক্কা বর্ণনামূলক। এর রয়েছে নিজস্ব সুর। মাঝেমধ্যে অবশ্য এক-দুটি সংলাপও রয়েছে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;বান্দিকে জামাই দেখতে যাওয়ার সময় যে ওয়াক (শূকর) কাটা হয়েছিল তার আকৃতি ছিল পর্বত সমান। দৃষ্টি সীমায় রাখা যাচ্ছিল না। তার পিঠের উপর গজিয়েছিল ঘাস আর সাতটি বাঁশঝাড়! দাঁতগুলো এত বয়সী, বড় হয়ে গিয়েছিল যে মুখের ভেতর আর কোন জায়গা অবশিষ্ট ছিলনা। বান্দির হাত ধরলে একটি শক্ত লোহার খুঁটি ধরার মতো অনুভূত হতো।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;উপস্থাপনে নানান ধরন আনতে মামা মাচ্ছুরুর সংলাপের পাশাপাশি সামান্য রসিকতাও রয়েছে। যেমন অতিথিদের আগমন উপলক্ষ্যে যখন রান্না-বান্না চলছিল তখন রসিকতা করে মামা মাচ্ছুরুকে জিজ্ঞেস করা হচ্ছে, ওয়াকের (শূকরের) চোয়ালের একপাশ কোথায়? মিদ্দি-ই খেয়েছে, নাকি রান্না করতে করতে তুমিই খেয়ে ফেলেছ? আবার থলে­ংমা রতরেংমা যার কাঁধে মৌমাছি বাসা বেঁধেছে। মাথার চুলে ফিঙের বাসা! আবার ছড়িয়ে রাখা পা-কে, কেটে ফেলে রাখা গাছ ভেবে তাতে উঠে একজন পায়খানার কাজ সেরেছে এরকম মজার কিছু বিষয়াবলী...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;স্পষ্টভাবে অনুভব করা যায় প্রবল সাংস্কৃতিক চাপের মুখে নীচে পড়ে যাওয়া বা আড়ালে সরিয়ে রাখা এসব সাহিত্যকর্ম। সে যা হোক অসাধারণ কিংবা খুব সাধারণ-ই। কোথাও এগুলোর আলোচনা, বাঁচিয়ে রাখার মতো নূন্যতম চেষ্টা নেই!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;যার মুখ থেকে শুনেছি- খামাল কুনেন্দ্র চাম্বুগং ( ছিজং ফা)। তখনো ৪৭-র দেশভাগ হয়নি। জন্ম ১৯২৯ সালের দিকে। রিজার্ভে। বর্তমানে ভারতের অংশ। পরবর্তীতে জামাই হয়ে চলে আসেন বেতকুড়ি গ্রামে। তখন বর্ডার ও পি.ডব্লিঊ রাস্তার কাজ চলছিল। মান্দি জাতিসত্ত্বার আত্তং গোষ্ঠীর লোকজন নিয়োজিত ছিলেন রাস্তা তৈরীর কাজে। কাজ শেষে প্রতিরাতে আগুন জ্বালিয়ে চারপাশ ঘিরে বসে জমিয়ে তুলতেন খাত্তাদক্কার আসর। ছিজং ফা ঘর ছেড়ে চলে যেতেন সে পালা শোনার জন্য। তখন বয়স পনের কী ষোল। শুনে শুনে সে সময়েই মনে গেঁথে রেখেছিলেন-আত্মস্থ করে ফেলেছিলেন খাত্তাদক্কা। অনুবাদের কারণে হয়তো খাত্তাদক্কার প্রকৃত রস অনেকটাই হারিয়ে যাবে। খাত্তাদক্কার সিকিভাগ এখানে ছাপানো হলো।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; হঅ...হ...অ...দা.আসালদে ম&lt;br /&gt;আজকে&lt;br /&gt;সা দাবো...দিগি য়্যা&lt;br /&gt;কে এইভাবে আছো&lt;br /&gt;রা রা হাই রিবো রিবো&lt;br /&gt;আসো চলো, চলো&lt;br /&gt;হাবা হনা রিগ্ননক ম&lt;br /&gt;জমি পরিস্কার করতে যাই&lt;br /&gt;রা রা...রিবো ম&lt;br /&gt;চলো...চলো...&lt;br /&gt;হাবা গামনা রিনাজক&lt;br /&gt;জমি তৈরী করতে যাই&lt;br /&gt;থুয়া চাখাত রিমবো&lt;br /&gt;সকলে ঘুম থেকে উঠো&lt;br /&gt;ফান্থি মিন্থ্রা রাংবা...দাদং&lt;br /&gt;যুবক-যুবতীরা থেকোনা&lt;br /&gt;গাআ জা-খরাগ্‌ব্বাসা দংবো&lt;br /&gt;যারা নুলো তারা থাকো&lt;br /&gt;ম্‌খ্যা গানা গ্‌ব্বাসা র'বো&lt;br /&gt;যারা অন্ধ তারা থাকো&lt;br /&gt;নামগিবা বিজাংথিরাংদে রি'বো রিথকবো&lt;br /&gt;যাদের স্বাস্থ্য ভালো তারা চলো সবাই&lt;br /&gt;হাআ হুনা নাংগিন্নক&lt;br /&gt;মাটি কাটতে হবে&lt;br /&gt;বিলসি য়ারা রিবাইজক&lt;br /&gt;বছর তো আসছে&lt;br /&gt;খারি য়ারা সকবাইজক রা রা&lt;br /&gt;বর্ষা তো আসছে...&lt;br /&gt;মিল্লামখন রাচাজক বিয়াবা&lt;br /&gt;মিল্লাম(যুদ্ধাস্ত্র) তুলে নিল সেও&lt;br /&gt;মিল্লামখন দিবাজক দি’য়াবা&lt;br /&gt;মিল্লামই এনেছে-হাতে তুলেছে।&lt;br /&gt;হাই রিথোকবো, মিশালখবা মিয়াখবা চুফাবো&lt;br /&gt;চলো পথের খাবার-দাবার বেঁধে নাও&lt;br /&gt;হিসাল দলস্‌ননি খোদে দলবো...অ&lt;br /&gt;কলা পাতায় যা বাঁধার বেঁধে নাও&lt;br /&gt;খকখ্রেং-খোদে অলফাবো&lt;br /&gt;খকখ্রেং২ বহন করে চলো&lt;br /&gt;গিথ্‌থি আথ্‌থি রাংখো&lt;br /&gt;দা-কাঁচি নাও&lt;br /&gt;রুয়া বাসি রাংখো রা...রা...রারুমবো&lt;br /&gt;আগাছা বাছতে যা যা লাগে, নাও&lt;br /&gt;মিল্লামখোদে দাগুয়াল&lt;br /&gt;মিল্লাম নিতে ভুলো না&lt;br /&gt;আথ্‌থিখোদে দাগুয়াল&lt;br /&gt;দা নিতে ভুলো না&lt;br /&gt;হানথাংথাংনি জাকরুমমাখো খাগুয়া&lt;br /&gt;হাতে ব্যবহৃত অস্ত্রগুলো বাঁধতে যা লাগে-&lt;br /&gt;ববিল-গ্‌ন্নাল নিকনাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;শত্রুদের সাথে দেখা হতে পারে।&lt;br /&gt;হাই রিথকবো...চাখাতবো চাখাতবো&lt;br /&gt;চলো সবাই-উঠো, উঠো&lt;br /&gt;মাইয়াখো চানচিয়া&lt;br /&gt;কী ভাবো,&lt;br /&gt;মাইয়াখো নিগাম্মা&lt;br /&gt;কীসের দিকে তাকাচ্ছো ?&lt;br /&gt;নিফ্‌ল্লিবা দঙ্গামা&lt;br /&gt;পেছন ফিরে কী কেউ থাকে&lt;br /&gt;নিফ্‌ল্লিবা রিয়ামা&lt;br /&gt;পেছন ফিরে ফিরে কী যায় ?&lt;br /&gt;হাই রিথকারিবো&lt;br /&gt;চলো সবাই&lt;br /&gt;সাল্লারামনি আংদিসা বিসংদে&lt;br /&gt;সূর্যের পুত্র তারা...&lt;br /&gt;সালজক্কননি ফিসা ইসংদে&lt;br /&gt;সূর্যাস্তের পুত্র তারা...&lt;br /&gt;দেল মিৎচি ব্‌ঙ্গাখো&lt;br /&gt;পনের হাত প্রস্থের গাছ&lt;br /&gt;দেন্ন-নারা দেনথুয়া, দাক্কা-বান্দিদে&lt;br /&gt;এক কোপেই কাটা শেষ করে...বান্দি এরকম&lt;br /&gt;বিলসানান চতদুয়া বিলসানান হংমানজা&lt;br /&gt;একবারের জন্যেও হয়নি, এক কোপে শেষ,&lt;br /&gt;মগ্গলা ইসংদে&lt;br /&gt;পড়ে গেছে।&lt;br /&gt;রান্নি মিংনা দংসুয়া মাচ্ছা বা&lt;br /&gt;বাঘ গর্জন করছিলো&lt;br /&gt;মাচ্ছা আরো-ফা চাখক ওয়াগকসুয়ে দংসুয়া ইসংদে&lt;br /&gt;বড় বাঘও নাক ডেকে ঘুমোচ্ছিল...&lt;br /&gt;বল-খো ওয়াখো দেন্নবা চাখাতজা&lt;br /&gt;গাছ-বাঁশ কাটলেও উঠেনি&lt;br /&gt;বল্লা গাআকদাফ্‌ফোবা ইজামজা মাচ্ছাবা&lt;br /&gt;শরীরের উপর গাছ পড়লেও বাঘ হাই তোলেনি&lt;br /&gt;দাও মাই দাকগ্‌ন্নক...থবান&lt;br /&gt;থবান এখন কী করবে?&lt;br /&gt;খাইম্‌ন্না রুয়াচা ফ্‌ত্তা স্খুখো&lt;br /&gt;কুড়াল দিয়ে মাথায় আঘাত করেছে-&lt;br /&gt;রাঙ্গসা চ্রক দুয়াঙ্গা&lt;br /&gt;একবার লাফিয়ে গেছে,&lt;br /&gt;চিরিং নালসা বালাঙ্গা বিয়াবা, মাচ্ছাবা&lt;br /&gt;একটি ঝর্ণা পেরিয়ে গেছে&lt;br /&gt;মাচ্ছা ছিদল গাব্বা মান্দিয়ানি ফংরাক্কা রামরামদে হংজানে&lt;br /&gt;একটি বড় বাঘের শক্তি কমতো নয়&lt;br /&gt;রামরামদে হংজানে&lt;br /&gt;কম নয়!&lt;br /&gt;অ মামা মাচ্ছুরু&lt;br /&gt;ও মামা মাচ্ছুরু৩&lt;br /&gt;অ চাখাতবো...&lt;br /&gt;ওঠো...&lt;br /&gt;হা'বা গামনা রিয়ামা-রিজামা&lt;br /&gt;জমি তৈরী করতে যাবে কী যাবে না ?&lt;br /&gt;অ মামা মাচ্ছুরু খিমি য়ারা জলরুরু&lt;br /&gt;মামা মাচ্ছুরু লম্বা লেজ ওয়ালা&lt;br /&gt;                                                                                                               আহা খক্কাসক,আ-হা(কথা)&lt;br /&gt;বোকা খক্কাসক,আ-হ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;দাআয়ারা মাইদাক্কি রগিন্নক&lt;br /&gt;এখন কীভাবে নাচবে&lt;br /&gt;সিম্মিজ্‌ঙ্গা ননোয়া দিগ্যি&lt;br /&gt;বোন সিম্মিজিং ?&lt;br /&gt;থিংকিজিংঙা নন-আ&lt;br /&gt;ছোটবোন থিংকিজিং&lt;br /&gt;রিয়ামা রিজামা&lt;br /&gt;তুমি কী যাবে?&lt;br /&gt;অ-সুরি&lt;br /&gt;অ সুরি&lt;br /&gt;রি'বো আনচিংবা&lt;br /&gt;চলো আমরাও-&lt;br /&gt;অ মামা মাচ্ছুরু খিমি য়ারা জলরুরু&lt;br /&gt;মামা মাচ্ছুরু লম্বা লেজওয়ালা&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;খা-আঙ্গা খক্কাসক আঙ্গাবা রিগন্নক(কথা)&lt;br /&gt;বোকা আমিও যাব সাথে&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;রি'বো, রি'বো, রি'বো চাখাতবো&lt;br /&gt;চলো, চলো, ওঠো...&lt;br /&gt;অ বুদা র্‌ৎচ্চারা (বুদারাচ্চা)&lt;br /&gt;বুদা র্‌ৎচ্চারা&lt;br /&gt;আই হিগেন রিগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;যাবো চলো&lt;br /&gt;সাল্লারামনি আংদিচা&lt;br /&gt;সূর্যের পুত্রের কাছে...&lt;br /&gt;সালজক্কননি ফিসাচা&lt;br /&gt;সূর্যাস্তের পুত্রের কাছে...&lt;br /&gt;হাই রিনা নাঙ্গোদে&lt;br /&gt;যেতে হলে&lt;br /&gt;চাচ্চিখোবা গ'বোমো..&lt;br /&gt;আত্মীয়দের কাছে (কথা) ছড়াও...&lt;br /&gt;মিখআরা জ'বো ম&lt;br /&gt;চাল ভাঁজো&lt;br /&gt;মা দাক্কে নি’গ্‌ন্নক&lt;br /&gt;কীভাবে দেখব?&lt;br /&gt;বাদিগিবা সগ্‌গিন্নক&lt;br /&gt;কীভাবে পৌঁছবো?&lt;br /&gt;চাচ্চিচাবা রিনাদে নাঙ্গা&lt;br /&gt;আত্মীয়দের কাছে যাওয়া প্রয়োজন&lt;br /&gt;চাওয়ারিখোদে নিনাদে নাঙ্গা...&lt;br /&gt;জামাই দেখাও প্রয়োজন...&lt;br /&gt;গিদ্দিংনাসা খানজিংনাসা সিনাজক&lt;br /&gt;গিদ্দিংর জন্য খানজিংর জন্য জিজ্ঞেস করব&lt;br /&gt;খানজিং না-সা নিনাজক অ-বান্দি খো...&lt;br /&gt;খানজিং-র জন্য দেখব, বান্দিকে...&lt;br /&gt;চাওয়ারি নিনা নাংনাজক&lt;br /&gt;জামাই দেখতে হবে&lt;br /&gt;চাওয়ারিদে সিকনাজক&lt;br /&gt;জামাই ধরব,&lt;br /&gt;দা-সালদে ম...&lt;br /&gt;আজকে...&lt;br /&gt;অ মামা...আ নিয়াআমা নিজামা&lt;br /&gt;মামা দেখবে কী দেখবেনা&lt;br /&gt;নিক্কামা নিকজাআমা&lt;br /&gt;পূর্বে দেখেছে কী দেখেনি (?)&lt;br /&gt;হাই রি'য়ে নিনাজক&lt;br /&gt;চলো যেয়ে দেখি,&lt;br /&gt;আমা ইন্নে চিঙ্গি চন্ন চন্ননি গান্না গানগিজাওনি&lt;br /&gt;আমাদের ছোটবেলায়&lt;br /&gt;চুয়া সংগুবাআন দঙ্গা&lt;br /&gt;রান্না করা চু ৪ আছে&lt;br /&gt;ইখো চেক্কে রন্‌বোনে চাচ্চি রিবাওদে&lt;br /&gt;মেহমান এলে&lt;br /&gt;ইখো সি'ম্মে রিংবোনে,ইখো&lt;br /&gt;পানি মিশিয়ে দিয়ো।&lt;br /&gt;আমা নাঙ্গো রিবাগেন&lt;br /&gt;মা তোমার এখানে আসবেন&lt;br /&gt;দাআসালদে নিকসুয়া জুমাংচা&lt;br /&gt;স্বপ্নে আজ তাকে আসতে দেখেছি&lt;br /&gt;মামা সকবায়েঙ্গা&lt;br /&gt;মামা পৌঁছবে&lt;br /&gt;মানি রিবায়েঙ্গা&lt;br /&gt;মামীও আসছে&lt;br /&gt;আফ্‌ফা নক্ক দঙ্গামা, দংজামা&lt;br /&gt;বাবা ঘরে আছে কী নেই ?&lt;br /&gt;বিখো সান্দি বাআঙ্গা&lt;br /&gt;তার খুঁজে আসছে&lt;br /&gt;বিখো নেম বাআঙ্গা&lt;br /&gt;তাকে খোঁজ করছে&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;অ...থবান, থবান&lt;br /&gt;ও থবান, থবান&lt;br /&gt;হাই রিগিনকমো, হাই জকগ্‌ন্নকমো&lt;br /&gt;চলো যাবে নাকি, ছুটবে কী-না&lt;br /&gt;নাঙ্গি আনোয়ানা&lt;br /&gt;তোমার বোনের জন্য&lt;br /&gt;চাওয়ারিখো নিনামুং&lt;br /&gt;জামাই দেখব&lt;br /&gt;দে ফান্থিখো সিকনা ম&lt;br /&gt;পুত্রকে (!) ধরি,কী বলো (?)&lt;br /&gt;হাই রি-বো হাই রি'বো&lt;br /&gt;চলো যাই, চলো&lt;br /&gt;সাংমা রাচ্চা, হাই রিবোদা&lt;br /&gt;সাংমা রাচ্চা যাই চলো&lt;br /&gt;নাঙ্গি আনোনা&lt;br /&gt;তোমার ছোটবোনের জন্য&lt;br /&gt;দেফান্থি রানা...&lt;br /&gt;পুত্র নেওয়ার জন্য...&lt;br /&gt;চাওয়ারিখো সিক্‌না&lt;br /&gt;জামাই ধরার জন্যে&lt;br /&gt;হাই রি'বো, থবানারা থদিক্কা&lt;br /&gt;চলো যাই থবান দ্বিধা করোনা।&lt;br /&gt;সাংমাআরা র্‌চ্চারা&lt;br /&gt;সাংমার্‌চ্চা&lt;br /&gt;ও বুদা র্‌চ্চা, ও বুদা র্‌চ্চা&lt;br /&gt;বুদা র্‌চ্চা&lt;br /&gt;হাই রিবো নাবা, হাই রিবো নাবা&lt;br /&gt;তুমিও চলো - তুমিও&lt;br /&gt;আইয়াও...সা ইন্নে রিজাওয়া&lt;br /&gt;আশ্চর্য... কে বলে যাবেনা (?)&lt;br /&gt;সা ইন্নে সকজাওয়া...&lt;br /&gt;কে বলে পৌঁছবেনা।&lt;br /&gt;আঙ্গা রিনা নাংগিন্নক&lt;br /&gt;-আমার যেতে হবে&lt;br /&gt;আঙ্গা সকনা নাংগন্নক&lt;br /&gt;আমার পৌঁছতে হবে&lt;br /&gt;হাংথাংনি আনোনা&lt;br /&gt;নিজের ছোটবোনের জন্য&lt;br /&gt;হাংথাংআনি নামচিকনা&lt;br /&gt;নিজেদের পুত্রবধুর জন্য&lt;br /&gt;আঙ্গা রিজা জ্‌গ্গদে সা-রিজগ্‌ন্নকনো&lt;br /&gt;আমি না গেলে কে যাবে&lt;br /&gt;ফাংনা মুড়ি দংজামা&lt;br /&gt;বৃদ্ধ-বৃদ্ধা কী নেই?&lt;br /&gt;দংআবা দংজাওবা&lt;br /&gt;থাকলে-না থাকলেও&lt;br /&gt;আঙ্গা রিনা নাংগিন্নক&lt;br /&gt;আমার যেতে হবে-&lt;br /&gt;আঙ্গাবা জকগিন্নক&lt;br /&gt;আমি মুক্ত হবো (দায়িত্ব থেকে)&lt;br /&gt;বাই সাকসা নাংগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;কতজন লাগবে&lt;br /&gt;বাই সাকসা রিগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;কতজন যাবে ?&lt;br /&gt;রা রা ...রিবুদা ...&lt;br /&gt;চলো&lt;br /&gt;রা রা ...রিবুদা অ...&lt;br /&gt;চলো&lt;br /&gt;হাই চাখাত চাখাত&lt;br /&gt;ওঠো,ওঠো...&lt;br /&gt;সাল্লারামচা রিনামো&lt;br /&gt;সূর্যোদয়ের দিকে যাবো&lt;br /&gt;সালচখ্‌নচা জকনামো&lt;br /&gt;সূর্যাস্তের দিকে রওনা দেবো&lt;br /&gt;ইয়া ইন্নে...&lt;br /&gt;এ-ই বলে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;খক্করিংখো অলবো&lt;br /&gt;খক৫ ঝুলিয়ে নাও&lt;br /&gt;মিগারিংখো জবো&lt;br /&gt;পথের নাস্তা ভেঁজে নাও&lt;br /&gt;হাই রিথোকবোমো&lt;br /&gt;চলো সবাই&lt;br /&gt;হাই রিবোমো&lt;br /&gt;চলো যাই।&lt;br /&gt;আমা নকচা রিগেনমো&lt;br /&gt;মায়ের বাড়ি যাবে নাকি,&lt;br /&gt;আম্বি নকচা সকনামো&lt;br /&gt;নানীর বাড়ি পৌঁছাবে কী ?&lt;br /&gt;হাই আনচিং-দে&lt;br /&gt;চলো আমরা...।&lt;br /&gt;বান্দি নক্ক দঙ্গোদে&lt;br /&gt;বান্দি যদি ঘরে থাকে&lt;br /&gt;সিকজল্লিবা রাবাগেন&lt;br /&gt;ধরে নিয়ে আসব।&lt;br /&gt;থল্লেবা রাবাগেন&lt;br /&gt;মিথ্যে বলে হলেও&lt;br /&gt;আমা নক্ক দঙ্গোদে&lt;br /&gt;মা ঘরে থাকলে&lt;br /&gt;বনিং দংআ দংসিলদে&lt;br /&gt;প্রতিবেশীরা থাকলে&lt;br /&gt;আদি নক্ক দঙ্গোদে&lt;br /&gt;মাসি ঘরে থাকলে,&lt;br /&gt;সিংজল হামজল দাগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;জিজ্ঞেস করব-তাৎক্ষণিক চাইব&lt;br /&gt;রাবা জল্লে রিনগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;সাথে নিয়ে আসব&lt;br /&gt;চুয়া মিয়া নাঙ্গোবা&lt;br /&gt;চু ও ভাতের প্রয়োজন দেখা দিলে&lt;br /&gt;ওয়াক্কা দুয়া নাঙ্গোবা...&lt;br /&gt;ওয়াক৬, অন্যান্য প্রাণী লাগলেও...&lt;br /&gt;জামানোসা রিনগিন্নক&lt;br /&gt;পরবর্তীতে যাব সেসব বিষয়ে-&lt;br /&gt;জামানোসা সিংগিন্নক&lt;br /&gt;পরবর্তীতে জিজ্ঞেস করতে।&lt;br /&gt;দাআওনিনা আইয়োদে&lt;br /&gt;এখন দেখব!&lt;br /&gt;কথ্‌থা মেল্লিয়াঙ্গোদে&lt;br /&gt;কথা যদি মিলে যায়-&lt;br /&gt;খুফা মাগাপাঙ্গোদে&lt;br /&gt;কথা যদি মানিয়ে যায়,&lt;br /&gt;সিকজল্লারি রাগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;সাথে নিয়ে নেব&lt;br /&gt;রিমজল্লারি নিগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;ধরে দেখব!&lt;br /&gt;নিসকখবা দাদন&lt;br /&gt;কোন কথা-ই শোনোনা&lt;br /&gt;হাই রিম্মি রিবো..মো&lt;br /&gt;চলো নিয়ে চলো...&lt;br /&gt;হাই সাল্লি রি'বো মো&lt;br /&gt;চলো টেনে নিয়ে যাই।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আঙ্গাআদে নিকখুজা ইন্নাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;আমিতো দেখিনি, বলতে পারে&lt;br /&gt;মিচিকখোসা নিগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;মেয়েকে দেখব-&lt;br /&gt;মিয়াখোসা সংগিন্নক ইন্নাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;ছেলেদের স্থাপন করবো (যেহেতু); বলতে পারে।&lt;br /&gt;আঙ্গা রিম্মি রিগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;আমি  নিয়ে যাবো,&lt;br /&gt;আঙ্গা বুদা র্‌চ্চারা&lt;br /&gt;আমি বুদা র্‌চ্চারা-&lt;br /&gt;আঙ্গা সাংমা র্‌চ্চারা&lt;br /&gt;আমি সাংমা র্‌চ্চারা-&lt;br /&gt;হাই রি'বো মো&lt;br /&gt;চলো যাই..।&lt;br /&gt;ননোখোবা রিমফাবো&lt;br /&gt;ছোটবোনকেও সাথে নাও,&lt;br /&gt;আবিখোসা সালফাবো...&lt;br /&gt;দিদিকে সাথে টানো&lt;br /&gt;দিমদাগ্‌ন রিবো মো&lt;br /&gt;সবাই চলো না-কি...?&lt;br /&gt;আদা মামা দংগুবা দিম্‌দাকন রিনাদে নাংগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;ভাই-মামা যারা আছে সবারই যেতে হবে&lt;br /&gt;সাল্‌নাদে নাংগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;টানতে তো হবে...&lt;br /&gt;রামরাম অংফাগিজাসা বিসংদে&lt;br /&gt;সাধারণ নয় তারা&lt;br /&gt;গ্র বিহি গিমফালগুয়াসা খুফা আগানগুয়াসা ইসংদে&lt;br /&gt;গ্র৭ খেতে তারা পারদর্শী&lt;br /&gt;বিলরাক্কাবা রামরামদে হংজা বিসংদে&lt;br /&gt;শৌর্যের দিক দিয়েও তারা কম নয়&lt;br /&gt;মি'ল্লামচা রিম্মবা&lt;br /&gt;মিল্লাম হাতে ধরলে&lt;br /&gt;মিল্লাম রিংরাং রিংরাং&lt;br /&gt;মিল্লাম চিক্‌চিক্‌ !!!&lt;br /&gt;দাক্কারিসা দঙ্গানে বিসংদে&lt;br /&gt;এভাবে থাকে তারা&lt;br /&gt;বেল মিৎচিবঙ্গা বলখোদে&lt;br /&gt;পনের হাত প্রস্থের গাছ&lt;br /&gt;সাদন্নারা সাদ্দুয়া দাকনাআ মান্নানে বান্দিদে&lt;br /&gt;এক কোপ-এক ছাঁট-ই যথেষ্ট বান্দির !&lt;br /&gt;বিনি জাক্কো রিমরাদে&lt;br /&gt;সে যেটি ব্যবহার করে&lt;br /&gt;রামরাম হংফাগিজানে&lt;br /&gt;সেটি আর সাধারণ নয়।&lt;br /&gt;রামরাম থালহংগিজা&lt;br /&gt;তীক্ষ্ণ বুদ্ধির অধিকারী-&lt;br /&gt;বিখো সিক্‌না রিমগিপা ফাআমা-ফাজামা&lt;br /&gt;তাকে ধরার সাহস হবে তো ?&lt;br /&gt;হানগিয়া মা হানগিজা&lt;br /&gt;কাছে ঘেঁষার সাহস কী হবে ?&lt;br /&gt;বিখো রিমনা মান্নামা মানজামা&lt;br /&gt;তাকে ধরতে পারে কী-না (?)&lt;br /&gt;বিনি খুয়া আগানো&lt;br /&gt;সে কথা বললে&lt;br /&gt;জাজাআরি রগিন্নক&lt;br /&gt;দ্বিধাগ্রস্থ হয়ে নাচবে&lt;br /&gt;খু-ফা বললাঙ্গো&lt;br /&gt;অবিরাম  বলে গেলে-&lt;br /&gt;জ্রিম-হঙ্গি দংগিন্নক আনচিংদে&lt;br /&gt;আমরা তবদা লেগে থাকব !&lt;br /&gt;সা ইখো বলগেন&lt;br /&gt;কে এটি বলবে?&lt;br /&gt;সা ইখো থতগেন&lt;br /&gt;কে এটি টোকা দেবে ?&lt;br /&gt;সা ইখো মিংনুয়া&lt;br /&gt;কে এর নাম উচ্চারণ করবে&lt;br /&gt;সা ইখো দিনুয়া&lt;br /&gt;কে এটি তুলবে;&lt;br /&gt;ইখো মালমোকাঙ্গোদে&lt;br /&gt;এটির সমাধা দিয়ে গেলে&lt;br /&gt;বিসংনা বাত্তে গ্রখো জিনো&lt;br /&gt;তাদের চেয়ে বেশী উপটৌকন দেবো&lt;br /&gt;মা'নগুবাসা রিবোমো&lt;br /&gt;যে পারো সে চলো,&lt;br /&gt;খুফা আগানাংনা মানগিপা&lt;br /&gt;যে ভালো কথা বলতে পারে&lt;br /&gt;সা সকবো মো&lt;br /&gt;সে পৌঁছ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;হেই দানাং মো, রা রা...&lt;br /&gt;ওহ্‌ তোমরা...&lt;br /&gt;ও বান্দি, চাখা চাখাত..চাখাত...&lt;br /&gt;বান্দি ওঠো, ওঠো&lt;br /&gt;হাই আনচিংবা রিনাজক&lt;br /&gt;চলো আমরাও যাই&lt;br /&gt;হাই রিগ্‌ন্নকমো থবানআরা থদ্দ্‌ক্কা...&lt;br /&gt;চলো  থবান&lt;br /&gt;বানবানিসা দিগ্গ্যিয়া&lt;br /&gt;দিগ্গ্যি, বানবানি৮ এখানে-।&lt;br /&gt;হাই রিগ্‌ন্নকমো&lt;br /&gt;চলো যাবে নাকি&lt;br /&gt;হা'বাচিন রিনাজক&lt;br /&gt;জমির দিকেই যাই।&lt;br /&gt;ফান্থি-মিন্থ্রা রাংবা রিথকবো&lt;br /&gt;যুবক-যুবতীরাও চলো&lt;br /&gt;ম্‌ক্কাগানাগ্‌ব্বাসা দংরিকবো&lt;br /&gt;অন্ধ যারা তোমরা থেকে যাও&lt;br /&gt;জাআখরাকরাসা দংরিকবো&lt;br /&gt;নুলো যারা তারা থেকে যাও&lt;br /&gt;হাই রিগ্‌নকমো হাংথাংথাংনি গিচ্চিখো&lt;br /&gt;চলো নিজেদের কপালের কাছে&lt;br /&gt;হাংথাংথাংনি রুয়াখো&lt;br /&gt;নিজেদের বপন&lt;br /&gt;রাথকিন রিবোমো...&lt;br /&gt;নিয়ে চলো...&lt;br /&gt;বিলসি আ সকজক, খারিআ নক্‌জক দামাংমো&lt;br /&gt;বছর এসেছে, বর্ষা বাড়ি পৌঁছেছে&lt;br /&gt;ও মামা মাচ্ছুরু রিয়ামা রিজামা চাখাতবো...&lt;br /&gt;মামা মাচ্ছুরু যাবে কী যাবে না, ওঠো&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;খক্কাসক আঙ্গাবা রিগেনথক (কথা)&lt;br /&gt;বোকা আমিও চলে যাব&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;হাই রিবো-রিবো, হাই রিবো...&lt;br /&gt;চলো যাই, তবে&lt;br /&gt;না'ঙ্গি রিগ্‌বাখোদে সাল্লাসালজাংচিবানুয়া&lt;br /&gt;তোমার সাথে গেলে দুপুর গড়াবে&lt;br /&gt;ওয়াল্লা ওয়াস্‌ননিনা নিগন্নক&lt;br /&gt;রাত্রি গড়াবে&lt;br /&gt;ওয়াল্লা সালসিন্‌নিনা জগ্‌গন্নক মো&lt;br /&gt;সারা রাত্রির জন্যে কী যাবো ?&lt;br /&gt;হেই রি'বো ও বান্দি, ও বান্দি&lt;br /&gt;চলো বান্দি, ও বান্দি&lt;br /&gt;না'ঙ্গি জজংরাংখো না'ঙ্গি মামা রাংখো&lt;br /&gt;তোমাদের ছোটভাই, মামাদের&lt;br /&gt;না'ঙ্গি আদা রাংখোবা হা-ই থম্মি রি'বোমো&lt;br /&gt;তোমাদের বড় ভাইদেরও নিয়ে চলো&lt;br /&gt;হাই থাম্মি রিবোমো&lt;br /&gt;চলো-জড়ো করে&lt;br /&gt;আকসানাদে দারিবো&lt;br /&gt;একা যেও না।&lt;br /&gt;ববিলগ্‌ল্লাল দংনাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;শত্রু  থাকতেও পারে&lt;br /&gt;মিল্লাম স্ফি রাংখো দাগুয়াল&lt;br /&gt;মিল্লাম স্ফি৯ নিতে ভুলো না&lt;br /&gt;হানথাং জাকরুমরাংখোদে দাগুয়াল&lt;br /&gt;নিজ হাতে ব্যবহৃত হাতিয়ার গুলো নিতে ভুলো না&lt;br /&gt;জাল জি জি নি&lt;br /&gt;নিজেদের -প্রত্যেকের&lt;br /&gt;ফাখ্রংঅসা গাত্তিসা রিবো&lt;br /&gt;কাঁধে উঠিয়ে নাও-&lt;br /&gt;দাআ গুয়াল্লাবোনে&lt;br /&gt;ভুলে যেও না যেন।&lt;br /&gt;নাম্মা মিথ্রারাংবা...&lt;br /&gt;সুন্দরী যুবতীরা&lt;br /&gt;গিদ্দিং&lt;br /&gt;গিদ্দিং&lt;br /&gt;ও খানজিংরাং রিবো&lt;br /&gt;খানজিং- চলো।&lt;br /&gt;জাওয়া মান্দি মিকনেংনাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;অন্য মানুষ ঈর্ষা করতে পারে-&lt;br /&gt;জাওয়া মাদ্দু নাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;অন্যেরা লোভ করতে পারে&lt;br /&gt;দাজামান চাক্কাবো&lt;br /&gt;পেছনে পড়ে যেও না&lt;br /&gt;দাজামান চিক্কাবো&lt;br /&gt;পেছন কামড়ে থেকো না,&lt;br /&gt;নি-বা মিকবকগ্‌ব্বাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;দেখে পছন্দ করে ফেলার মানুষও রয়েছে&lt;br /&gt;নিনা নাসিগ্‌ব্বাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;দেখলে ক্ষতি হয়ে যাবে- এমন রয়েছো যে-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;হেই রিম্মআ অ-বুদা র্‌চ্চা মো&lt;br /&gt;ডাকার সময়-বুদার্‌চ্চা,&lt;br /&gt;অ সাংমা র্‌চ্চা মো&lt;br /&gt;সাংমার্‌চ্চা&lt;br /&gt;হাই আনচিংবা রিনাজক&lt;br /&gt;আমরাও যাত্রা শুরু করি&lt;br /&gt;আনচিংনি আমা আনোচা&lt;br /&gt;আমাদের মা-বোনের কাছে,&lt;br /&gt;চাওয়ারিনা রি'গেনমো&lt;br /&gt;জামাইয়ের জন্য যাবে নাকি&lt;br /&gt;দেফান্থিনা সিকনামো&lt;br /&gt;পুত্রের জন্য ধরি (?)&lt;br /&gt;আনচিংআনি আমাচা&lt;br /&gt;আমাদের মা...&lt;br /&gt;অ-মানি সারিচা...রিনামো রা...&lt;br /&gt;শ্বাশুড়ি-ননদের কাছে যাবে নাকি...&lt;br /&gt;থম্মেদাক্কে নিবো মো&lt;br /&gt;যোগাড় করে দেখো-&lt;br /&gt;মিয়া চুফাই নিবো মো&lt;br /&gt;ভাত-চু রান্না করো&lt;br /&gt;মিজারিংখো _Õ†¤^v মো&lt;br /&gt;বাড়তি ভাতগুলো টোকাও&lt;br /&gt;আনচিংবা রিনাজক&lt;br /&gt;আমরাও যাই।&lt;br /&gt;গাল্লা দিগ্রি দকমিদ্দিং সুরিবা&lt;br /&gt;অলংকার পড়া শুরু করেছে সুরি&lt;br /&gt;সকমিয়াচিং সকমিদ্দিং সুরিবা&lt;br /&gt;পুষ্ট হচ্ছে স্তন&lt;br /&gt;চাওয়ারিদে সিকনাদে নাংগ্‌ন্নকমো&lt;br /&gt;জামাই ধরাতো প্রয়োজন।&lt;br /&gt;মামাগিব্বাদে জাফাক চাংচাং দাক্কংজক&lt;br /&gt;তার মামা (শ্বশুড়) তো জীর্ণ-শীর্ণ হয়ে যাচ্ছে&lt;br /&gt;বা'র্‌ক্‌নি সাল্লোদে&lt;br /&gt;হয়তো কোনদিন&lt;br /&gt;গ্‌ম্মা দঙ্গা নাসিনাবা দঙ্গা&lt;br /&gt;হারিয়ে-বিনাশ হয়ে যেতে পারে&lt;br /&gt;ইনা সিখাংইন সুষমরাখো সংনা নাঙ্গামো---&lt;br /&gt;এর আগেই সুষমরা১০গাঁড়া প্রয়োজন নাকি?&lt;br /&gt;নকরুমাখো সিকনা নাঙ্গামো--&lt;br /&gt;ঘরজামাই ধরা প্রয়োজন।&lt;br /&gt;হানথাঙ্গানি খামদাক্‌খো...&lt;br /&gt;নিজেদের আপন মানুষকে&lt;br /&gt;হানথাঙ্গানি খ্রিখো&lt;br /&gt;ভালোবাসার মানুষকে&lt;br /&gt;হাই নিনা রিনাজক&lt;br /&gt;দেখতে যাই চলো।&lt;br /&gt;রা রা ...হানথাঙ্গানি মসা বনিং দাক্কা রাংখো&lt;br /&gt;নিজেদের শালা-সম্বন্ধি সম্পর্কীয়দের&lt;br /&gt;রা থম্মি নি'বোমো&lt;br /&gt;দেখো-জড়ো করে&lt;br /&gt;চাখাত্তামা চাখাতজা&lt;br /&gt;ওঠে কী ওঠেনা,&lt;br /&gt;ইজাম্মামা ইজামজা&lt;br /&gt;হাই তোলে কী তোলেনা&lt;br /&gt;চামি সা-ই নিবো মো&lt;br /&gt;ঘুম থেকে ডেকে&lt;br /&gt;থকদিংখয়ে নিবো মো&lt;br /&gt;চাপড় মেরে দেখো।&lt;br /&gt;সাংমা র্‌চ্চারা হাইয়ামা হা-ইজা&lt;br /&gt;সাংমার্‌চ্চা জানো কী ?&lt;br /&gt;মান্দে থম্মে নিনাবা&lt;br /&gt;মানুষ জড়ো করে দেখতে-&lt;br /&gt;মান্দি ওয়াত্তি নিনাবা&lt;br /&gt;মানুষ ছেড়ে দিতে&lt;br /&gt;সেংগিপ্পা দাক্‌গিপ্পাখো&lt;br /&gt;চালাক-চতুরদের&lt;br /&gt;ফংরাকগিব্বা মান্দিখো&lt;br /&gt;যারা শক্তিশালী।&lt;br /&gt;ফান্থিরাংখো... থম্‌বো&lt;br /&gt;-যুবকদের জড়ো করো&lt;br /&gt;চাফাল মান্দিখোন নি'বো&lt;br /&gt;বাড়ন্ত মানুষদেরই দেখো।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;হানথাং বলজাওবা খুফা নাম্মি আগান্না মানগিপ্পা নাঙ্গা&lt;br /&gt;নিজে বলতে না পারলে বাকপটু মানুষ প্রয়োজন&lt;br /&gt;গ্রুজিনা মানগিপা নাঙ্গা&lt;br /&gt;ক্ষতিপূরণ অস্বীকার করার মানুষ প্রয়োজন&lt;br /&gt;খিন্নি খাসি বিবাল বালগিপা মান্দিবা নাঙ্গা&lt;br /&gt;চুল পাকা অভিজ্ঞ মানুষ থাকলে-&lt;br /&gt;উখো-ইন রিমনাদে নাঙ্গা&lt;br /&gt;তাকেই ধরা প্রয়োজন।&lt;br /&gt;ও বুদার্‌চ্চা&lt;br /&gt;অ বুদার্‌চ্চা&lt;br /&gt;দঙ্গাআমা দংজা&lt;br /&gt;আছো কী নেই&lt;br /&gt;নিক্কা দঙ্গামা দংজা&lt;br /&gt;পূর্বে দেখা আছে কী ?&lt;br /&gt;ও চাখাতখুজামা ও ইজামখুজামা&lt;br /&gt;ওঠোনি কী ? হাই কী তোলনি ?&lt;br /&gt;হেংগক রা-ই থুয়েঙ্গা, চামি সাও হাইজা&lt;br /&gt;নাক ডেকে ঘুমোচ্ছে, উঠালেও টের পায় না!&lt;br /&gt;সিলথংখোসা সু'য়েমুং গিংচা জতর্‌র্‌য়েতা&lt;br /&gt;লোহা নাক দিয়ে ঢুকিয়ে-নাড়ানো হয়েছে&lt;br /&gt;উনসা ইজামা ও বুদার্‌চ্চাবা&lt;br /&gt;তখন হাই তোলেছে বুদার্‌চ্চা&lt;br /&gt;বিনিবিল্‌বা রামরামারি হংজানে&lt;br /&gt;তার শক্তিও কম কিন্তু নয়!&lt;br /&gt;ও দ'রেং রাজা&lt;br /&gt;ও চিল রাজ!&lt;br /&gt;নাআ রিয়ামা রিজামা&lt;br /&gt;তুমি যাবে কী যাবে না।&lt;br /&gt;গিদ্দিংমা গিদ্দিং আনি ফাগিপা&lt;br /&gt;গিদ্দিং এর পিতামাতা&lt;br /&gt;চাওয়ারিনা রিনা হাম্মেঙ্গা&lt;br /&gt;জামাইয়ের জন্য যেতে চাচ্ছি,&lt;br /&gt;খিন্নামা খিন্নাজা&lt;br /&gt;শুনেছ কী শোননি ?&lt;br /&gt;নাআ হা-ইমা হা-ইজা&lt;br /&gt;তুমি জানো কী (?)&lt;br /&gt;হাই রিবো মো&lt;br /&gt;চলো যাই...&lt;br /&gt;রি'নাদে নাংচংমত্তা&lt;br /&gt;যাওয়াতো অবশ্যই প্রয়োজন&lt;br /&gt;সা ইন্নে রিজাওয়া&lt;br /&gt;কে বলে যাব না ?&lt;br /&gt;হানথাংনি আমানা হানথাংনি নামচিকনা&lt;br /&gt;নিজের মায়ের জন্য-পুত্রবধুর জন্য&lt;br /&gt;হানচিং সান্দিজাওদে সা সান্দিনুয়া&lt;br /&gt;আমরা না খুঁজলে কে খুঁজবে ?&lt;br /&gt;সা ইনজামনুয়া&lt;br /&gt;কে হাই তোলবে।&lt;br /&gt;অ... দাআসালদে মো&lt;br /&gt;আজকে অন্তত&lt;br /&gt;অ স্খাল লাল্লেং খো নিয়ে চাখাত&lt;br /&gt;রাক্ষস লাল্লেং-কে দেখে উঠো !&lt;br /&gt;হাইয়ামা হাইজা&lt;br /&gt;জানো কী জানোনা&lt;br /&gt;গিদ্দিংনি ফা গিম্মা&lt;br /&gt;গিদ্দিং বাবা হারিয়েছে।&lt;br /&gt;জামাইনা রিনা হা'মেঙ্গা&lt;br /&gt;জামাইয়ের জন্য যেতে চাচ্ছি-&lt;br /&gt;রি'না নাংগেন মো আনচিংবা&lt;br /&gt;তো যাওয়া কী দরকার আমাদের?&lt;br /&gt;আঙ্গা ইজামখুজামুং&lt;br /&gt;তখনো হাই তুলিনি&lt;br /&gt;আঙ্গা স্মাক খুজামুং&lt;br /&gt;আমি তখনো জাগিনি&lt;br /&gt;আগানাবা দংজা বলাবা দংজা&lt;br /&gt;বলা নেই কওয়া নেই,&lt;br /&gt;বাদিক-কিবা হা-ইনা&lt;br /&gt;কীভাবে যে জানবো,&lt;br /&gt;বাদ্দিকিবা বল না&lt;br /&gt;কীভাবে কথা বলব ?&lt;br /&gt;হুম...ম...ম...&lt;br /&gt;হুম...ম...ম...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;হাই রিগ্‌নকমো হাই রিগ্‌নকমো&lt;br /&gt;যাবে নাকি চলো, যাবে নাকি?&lt;br /&gt;সা সা রিগ্‌নক সা সা  দগিন্নক&lt;br /&gt;কে কে যাবে, কে উজান বাইবে?&lt;br /&gt;হানথাং-থাঙ্গন চানচিয়ে রারুমবো&lt;br /&gt;নিজেরাই ভেবে নাও&lt;br /&gt;চাওয়ারিখো সিংনাদে নাংজক গিদ্দিংনা&lt;br /&gt;গিদ্দিং এর জন্য জামাই দেখা প্রয়োজন,&lt;br /&gt;দে ফান্থিখো সিঙ্গনা নাংগ্‌নক&lt;br /&gt;পুত্রকে জিজ্ঞেস করতে হবে&lt;br /&gt;হাই রিরুমবো মো&lt;br /&gt;চলো সকলে।&lt;br /&gt;আমা ইন্নে গিদ্দিংনে&lt;br /&gt;মা বলে গিদ্দিং&lt;br /&gt;গান্না গান্‌জা দান্নোনে,চুয়া সংগিবা দঙ্গা&lt;br /&gt;তোমার ছোটকালে রাঁধা চু আছে&lt;br /&gt;ইখো রা-ই হিবোমো&lt;br /&gt;এটি নিয়ে চলো&lt;br /&gt;আক্‌খিসা ইন্নোবা&lt;br /&gt;সামান্য হলেও,&lt;br /&gt;গ্রকসাদে থিকনুয়া&lt;br /&gt;এক ঢোক করে হবে,&lt;br /&gt;গ্রকসাদে থিকনুয়া&lt;br /&gt;এক ঢোক করে হবে।&lt;br /&gt;সা সা রিব্বিগেন&lt;br /&gt;কে,কে বহন করবে&lt;br /&gt;সা সা অলগেন&lt;br /&gt;কে কাঁধে তুলবে ?&lt;br /&gt;খাকসি বিড়িগদ্দা&lt;br /&gt;বদনার...&lt;br /&gt;সাকবিঙাদে নাপনা মান্না খাক্ষীবা&lt;br /&gt;পাঁচজন নল দিয়েই ঢুকতে পারে&lt;br /&gt;চিলমংগিদ্দা খলগ্রিক গ্রি নাপ্‌পা&lt;br /&gt;বিশজন মুখ দিয়ে।&lt;br /&gt;হিখো সুগাল্লে রাবোমো&lt;br /&gt;এটি ধুঁয়ে নাও-&lt;br /&gt;বান্দিয়ানা খান্নাদে নাঙ্গা ইনোমো&lt;br /&gt;বান্দির জন্য খাওয়ানো প্রয়োজন&lt;br /&gt;বিচ্চিখদে দিংদাঙ্গন রা'বো&lt;br /&gt;রস আলাদা-ই নাও&lt;br /&gt;গ্রানখদে দিং-দাঙ্গন থমবো&lt;br /&gt;শুকনো (খাবার) গুলো আলাদা কুড়াও&lt;br /&gt;দাআ গুয়াল্লাবোনে বিখো থুসিফেক্কেতে&lt;br /&gt;ভুলনা, তাকে গাঢ় ঘুমে রেখে,&lt;br /&gt;বিখো b‡¤^v‡MZ-wMRv‡b&lt;br /&gt;দুর্বল না করে&lt;br /&gt;আনচিং সিঙ্গনা মানজাওয়া&lt;br /&gt;আমরা জিজ্ঞেস করতে পারবো না-&lt;br /&gt;বিয়াদে রামরাম হংফাগিজাসা&lt;br /&gt;সে কিন্তু সাধারণ নয়&lt;br /&gt;রামরাম হংফাগিজাসা বিয়াদে&lt;br /&gt;সাধারণ নয় সে -।&lt;br /&gt;গ্র জিয়বা-বিয়াসারা হংজানে&lt;br /&gt;গ্র তাকে ছাড়া হয়না&lt;br /&gt;সাল্লারামনি আংদিসা বিসংদে&lt;br /&gt;সূর্যের সন্তান তারা...&lt;br /&gt;আনচিংঙ্গাদে মাইবা?&lt;br /&gt;আমরা কে?&lt;br /&gt;থাম্‌ফি মাংসিনিগিদ্দা হংজা , আনচিংদে&lt;br /&gt;একটি মাছির মতো নই&lt;br /&gt;খু’ফা বলনা গিত্তাবা হংজা নাচিংদে&lt;br /&gt;কথা বলার মতোও নই।&lt;br /&gt;বিনি জাকথংখো রিম্মআ সিলথংখো রিম্মাগিদ্দা দাক্কানে&lt;br /&gt;তার হাতের কব্জি ধরলে লোহার খুঁটি ধরার মতন,&lt;br /&gt;খিন্নিসক গা’গংনে, বিয়াদে&lt;br /&gt;পা থেকে চুলের প্রান্ত পর্যন্ত&lt;br /&gt;রামরাম হংফাজাসা....বিয়াদে&lt;br /&gt;সাধারণ নয় সে......।&lt;br /&gt;বেলমিক্‌চি ব্‌ঙ্গাখো&lt;br /&gt;পাঁচজনকে&lt;br /&gt;জা’গ্রা দামবেং র’ন্নানে&lt;br /&gt;ঘরের রুয়া-বাগা বানাতে বলেছে।&lt;br /&gt;ব্রেপ্‌দংদং বিয়াদে&lt;br /&gt;দিয়েছে শক্ত বাঁধন।&lt;br /&gt;ইখো নিক্কআরা না’সংদে&lt;br /&gt;ঘর দেখলে&lt;br /&gt;নাপনা হাসিকামা হাসিকজানুয়াই&lt;br /&gt;ঢুকতে কী ইচ্ছে করবে ?&lt;br /&gt;আঙ্গাআন চন্নো বিখো নিকগিবা ইন্নে&lt;br /&gt;আমি ছোটকালে যেহেতু তাকে দেখেছি&lt;br /&gt;বিখো খুদ্‌ম্মে নিয়ন মিক্রন রংদাল্লেসা নিয়ানে বান্দিদে&lt;br /&gt;তাকে চুমু দিয়ে দেখলে চোখ বড় বড় করে তাকাতো বান্দি!&lt;br /&gt;মামা গিপ্পাআন খেনসিক-খেনসিক দাকফিল্লে&lt;br /&gt;আপন মামা ভয়ে ভয়ে&lt;br /&gt;খুফাখন আগান্নারিয়া&lt;br /&gt;কথা শুরু করে-&lt;br /&gt;বিখবা দেকেন...চাওয়ারিদে হাখাঙ্গে দন্নবা বিয়াবা&lt;br /&gt;তাকে আগে থেকে জামাই ঠিক করে রাখলেও&lt;br /&gt;আঙ্গি সুরিনান, বিখোদে&lt;br /&gt;সুরির জন্যে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;খুমানসিয়ে দন্নাংজক&lt;br /&gt;কথা বলে যাচ্ছি&lt;br /&gt;খুমানসিয়ে দনবাজক&lt;br /&gt;কথা বলে এসেছি&lt;br /&gt;ওয়ালদুখায়ে দনবাআ বিনি আফ্‌ফারাংমুং&lt;br /&gt;বাঁধন দিয়ে এসেছি তার অভিভাবকদের সাথে&lt;br /&gt;বিনি গুমিরাংমুং&lt;br /&gt;তার দুলাভাইদের সাথে&lt;br /&gt;বিনি আদিমুং&lt;br /&gt;তার মাসির সাথে&lt;br /&gt;বিখো ইন্নো বিয়াবা&lt;br /&gt;জিজ্ঞেস করলে সে নিজেও&lt;br /&gt;বিসংবা খুরাচ্চাক্কা, মা-গিবাবা&lt;br /&gt;প্রতিশ্রুতি দিয়েছে। রাজি মা ¯^qs-&lt;br /&gt;চিঙ্গা থাসি জিলনোমা,&lt;br /&gt;আমরা কী খাসি বানিয়ে পালব ?&lt;br /&gt;চিঙ্গা ব্রেপ জিলনোমা&lt;br /&gt;আজীবন বন্ধন দিয়ে পালব ?&lt;br /&gt;নাসংনান আংদিখো বাআবান&lt;br /&gt;তোমাদের জন্যই পুত্র জন্ম দিয়েছি&lt;br /&gt;নাসংনান চিঙ্গাদে চিয়াবা&lt;br /&gt;তোমাদের জন্যই আমরা সন্তান প্রসব করেছি&lt;br /&gt;নাসং রাজাজক্কদে সাওয়াবা রানুয়া&lt;br /&gt;তোমরা না নিলে কে নিবে&lt;br /&gt;সাওয়াবা রানুয়া ইন্নো&lt;br /&gt;কে নেবে বলেছে?&lt;br /&gt;নাসং নিজাজক্কদে&lt;br /&gt;তোমরা না দেখলে-&lt;br /&gt;নাসং দিমজাজক্কদে&lt;br /&gt;তোমরা ভনভন না করলে&lt;br /&gt;সাওয়াবা নিগ্‌ন্নক&lt;br /&gt;কে দেখবে,&lt;br /&gt;সাওয়াবা চাগিন্নক&lt;br /&gt;কে খাবে?&lt;br /&gt;অ মামা মাচ্ছুরু খিমি জলরুরু&lt;br /&gt;ও মামা মাচ্ছুরু লম্বা লেজওয়ালা&lt;br /&gt;অ নাঙ্গি য়্যা বাগ্নাখোদে&lt;br /&gt;তোমার এই ভাগ্নেকে&lt;br /&gt;দাআসালদেমো চাওয়ারিখো সিঙ্গনা রিবাওঙ্গা&lt;br /&gt;আজকে জামাই জিজ্ঞেস করতে আসছে&lt;br /&gt;খিন্নামা-খিন্নাজা&lt;br /&gt;শুনেছ কী শোননি ?&lt;br /&gt;খা গগ্গাসক আঙ্গাদে খিন্নাখুজানে,&lt;br /&gt;বোকা আমি, শুনিনি&lt;br /&gt;থাম্ফি মাংগিদ্দাবা আঙ্গাবা খিন্নাখুজা খা গগ্গাসক&lt;br /&gt;একটি মাছির মতোও শুনিনি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;রা ইন্দাকোদে নিসুবো&lt;br /&gt;এরকম.....হলে তাকাতে থাকো&lt;br /&gt;হিবাগিপ্পা মান্দিনা হামফক হনসুনাদে নাংনুয়া&lt;br /&gt;অতিথিদের জন্য পিঁড়ি দিতে হবে&lt;br /&gt;জাল্লেঙ্গা,বিনি কাসারিখো বিনি বান্দাসিলখো&lt;br /&gt;জায়গা বাড়িয়েছো...? কাচারি ঘর তৈরী করো&lt;br /&gt;থারিয়েমুং দনসুবো হাথ্‌ল্লাখো নকখ্রাকো&lt;br /&gt;পরিস্কার করে রাখো বাড়ির উঠোন-আশপাশ&lt;br /&gt;চিরঙ্গেমুং সিকসুবো ও মামা মাচ্ছুরু অ খিমি জলরুরু&lt;br /&gt;সুন্দর করে স্বাগতম জানাও মামা মাচ্ছুরু।&lt;br /&gt;অ নাঙ্গি মান্দিরাংখোবা সা সা দঙ্গা&lt;br /&gt;তোমার মানুষ কে কে আছে ?&lt;br /&gt;দিসা ফিসারাংখো রাই রা...অ থম্মি সুবুদা&lt;br /&gt;ছোট ছেলেমেয়েদের জড়ো করে...&lt;br /&gt;রা......থারিসুবুদা&lt;br /&gt;তৈরী করতে থাকো-&lt;br /&gt;নাঙ্গি আবিরাংখো নাংনি আনুরাংখো&lt;br /&gt;তোমার বড়-ছোট বোনদের&lt;br /&gt;সংনি নক্‌নি মান্দিরাংখো জদিম্মি স'বো দে&lt;br /&gt;গ্রামের মানুষদের সাথে নিয়ে&lt;br /&gt;না-আ দকথুং খাবোনে&lt;br /&gt;সর্বক্ষণ জাগ্রত রাখো&lt;br /&gt;হিজুজুয়েসা আগানবো&lt;br /&gt;দৌঁড়াতে দৌঁড়াতে বলো&lt;br /&gt;হিরুরুয়েসা বলবো&lt;br /&gt;হাঁটতে হাঁটতে কথা বলো&lt;br /&gt;সংনি মান্দিরাংখোবা&lt;br /&gt;গ্রামের মানুষদের&lt;br /&gt;হানি মাচ্ছকরাংখোবা&lt;br /&gt;মাটির হরিণদের&lt;br /&gt;চিঙ্গা হু-ইফাজানে&lt;br /&gt;আমরা চিনি না !&lt;br /&gt;ইন্নিয়্যা চিঙ্গা হাইফাজানে আগাননুয়া&lt;br /&gt;আমরা চিনি না বলবে কেউ-&lt;br /&gt;খিন্না না গিদ্দা-হাইনা গিদ্দা&lt;br /&gt;কথা শোনার জন্য-জানার জন্য।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;য়্যা দফিসাখো নিবো&lt;br /&gt;এই মুরগীর বাচ্চাটি দেখো-&lt;br /&gt;য়্যা ওয়াকফি সাখো রিমবো&lt;br /&gt;এই শূকরের বাচ্চাটি ধরো&lt;br /&gt;মান্দি হিবা জগ্গদে&lt;br /&gt;মানুষ এসে পড়লে&lt;br /&gt;দাক্কামব্রুই ফিন্নিকাগিদ্দা ইননুয়া&lt;br /&gt;দেখাচ্ছে-বলতে পারে&lt;br /&gt;সা বিলরাকগুয়া সা&lt;br /&gt;শক্তিশালী-কে?&lt;br /&gt;ইখো রিমনা রিয়াংবো&lt;br /&gt;সেটি ধরতে চলে যাও&lt;br /&gt;গিদ্দিঙ্গানি মাগিপ্পা ইন্নে&lt;br /&gt;গিদ্দিংর মা বলে&lt;br /&gt;দিসা ফান্থি দ'ঙ্গো জিলগিপ্পা ওয়াকফিসা&lt;br /&gt;যুবতী বয়সে পালা বাচ্চা শূকর...&lt;br /&gt;ওয়া-গি চিনসিননি চাগিপ্পা ওয়াক্কা-নে&lt;br /&gt;পিঠের উপর সাতটি বাঁশঝাড় উঠেছে&lt;br /&gt;রিংখং চাংখেত ফিলজকনে খুসিকবা&lt;br /&gt;দাঁতের জন্যই জায়গা আর নেই&lt;br /&gt;জেংচেং চংস্‌নে চাগিপ্পা ওয়াক্কানে&lt;br /&gt;লাল ঘাস উঠেছে দেহের উপর&lt;br /&gt;নিয়আরা নিসকজা আব্রি চতসা গিত্তাসা নিকজকনে&lt;br /&gt;তাকালে-সীমাহীন উঁচু পর্বতের মতো দেখাচ্ছে&lt;br /&gt;রা ইখো রিমনা রিয়াঙ্গো-আ&lt;br /&gt;সেটি ধরার জন্য গেলে-&lt;br /&gt;নিক্কারিন ওয়াল-ফিল্লা মাচ্ছুরু&lt;br /&gt;দেখেই ফিরে এসেছে মাচ্ছুরু&lt;br /&gt;নিক্কারিন দিফিল্লা, বিয়াদে&lt;br /&gt;তুলেছে লেজ।&lt;br /&gt;আঙ্গাআদে....আঙ্গা আমসকজাওয়া, আঙ্গা ইখো&lt;br /&gt;পারবোনা এটি, সাহস কুলোয় না&lt;br /&gt;রিমনাবা মানজাওয়া,ইন্নানে&lt;br /&gt;ধরতে পারবো না-বলেছে।&lt;br /&gt;অ-বানবান-নে, রা রি'ম্মে নি'বোদা&lt;br /&gt;বানবান ধরে দেখো&lt;br /&gt;রা সিক্কি নিবোদা&lt;br /&gt;আটকাও-&lt;br /&gt;মান্দি রিবাজকদে দাক্কামব্রুই ফিন্নিকাগিদা হংনুয়া&lt;br /&gt;মানুষজন এসে পড়লে দেখানোর মতো হবে&lt;br /&gt;ইচা সকবাজগ্‌দে&lt;br /&gt;এখানে পৌঁছলে-&lt;br /&gt;ফিন্নিকেমুং রাআগিদ্দা&lt;br /&gt;দেখিয়ে নেয়ার মতো হবে।&lt;br /&gt;সঙি মিন্নি দান্নোদে দখ্রুখবা নিনা আলথুনুয়া&lt;br /&gt;রান্না করে রাখলে ঘুঘুর মাংস ভালো দেখায়!&lt;br /&gt;থারি আসিম্‌ন্না সঙি মিন্নি দন্নোদে দখ্রুখবা নিনা আলথুনুয়া&lt;br /&gt;তৈরী করে রান্না করে রাখলে ঘুঘুর মাংসও !&lt;br /&gt;রা রা...বানবানিয়া রিম্‌দি-রিম্‌না রিয়াংজক&lt;br /&gt;বানবান সত্যি সত্যি ধরতে গেলো-&lt;br /&gt;জম্‌ফি জম্‌ফি জম্মাংজক&lt;br /&gt;নিঃশব্দ পায়ে, ধীরে ধীরে&lt;br /&gt;ওয়াক্কা জাফাংচান সক্কাঙ্গো&lt;br /&gt;শূকরের কাছে পৌঁছলে&lt;br /&gt;রাংসা উক ইন্নানান মিকবঙ্গানাদে থিল্লাংজক বিয়াদে&lt;br /&gt;একবারের উক শব্দেই পাঁচ হাত দূরে পড়ে গেলো&lt;br /&gt;অ আঙ্গাদে মানজাওয়া, আঙ্গাদে, ইনাদে&lt;br /&gt;আমি পারবো না, পারবো না এটি&lt;br /&gt;আঙ্গা আমসক্‌জাওয়া, আঙ্গাদে&lt;br /&gt;সাহস কুলোয় না আমার।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;দাআওয়ান...অ মামা দিগ্গ্যিবা রিম্মামা-রিম্‌জামা,&lt;br /&gt;এখন মামা দিগ্গ্যি ধরবে কী না,&lt;br /&gt;সা আমসকনাজক&lt;br /&gt;কে আর সাহস করবে?&lt;br /&gt;বান্দি গ্রি মানজাওয়া ইখোদে&lt;br /&gt;বান্দি ছাড়া কেউ পারবে না&lt;br /&gt;বান্দি গ্রি রিমনাদে নিকজাওয়া&lt;br /&gt;বান্দি ছাড়া ধরার মতো দেখি না কাউকে&lt;br /&gt;সাকসাবা মানজাওয়া, ইখোদে&lt;br /&gt;কেউ পারবেই না।&lt;br /&gt;ও মামা...সাংমা র্‌চ্চারা&lt;br /&gt;মামা, সাংমা র্‌চ্চারা&lt;br /&gt;নাআ রিব্বি নিবুদা&lt;br /&gt;তুমি বহন করে দেখো&lt;br /&gt;নাঙ্গি বাগ্নানি মান্‌সিগিব্বা ওয়াকখো&lt;br /&gt;তোমার ভাগ্নের মানসার শূকর&lt;br /&gt;রা রিম্মি নিবুদা&lt;br /&gt;ধরে দেখো&lt;br /&gt;রা, সাল্লে নিবুদা&lt;br /&gt;টেনে দেখোতো ?&lt;br /&gt;রিয়াঙ্গেমুং রুম্ম-য়্যা&lt;br /&gt;গিয়ে ধরলে-&lt;br /&gt;ওয়াকনি গাথিং দাত্তানা মিকচিবঙ্গা থিলাঙ্গা, বিয়াদে&lt;br /&gt;শূকরের লাথির জন্য পনের হাত দূরে পড়েছে&lt;br /&gt;রিমরিম মিত্থাল দাক্কিজক, বিয়াদে&lt;br /&gt;গড়াতে গড়াতে...&lt;br /&gt;ওয়াখি-মিখ্‌খি দাক্কিসা দঙ্গিজক, বিয়াদে&lt;br /&gt;লজ্জায় রাঙ্গা হয়ে থাকলো।&lt;br /&gt;অ বানবান...আরা...রিম্মি নিবুদা, নাবা&lt;br /&gt;বানবান তুমিও ধরে দেখো&lt;br /&gt;আঙ্গাদে মানজাওয়া নিক্কারিন আঙ্গাদে আমসকজা&lt;br /&gt;আমি পারবো না , দেখেই সাহস করি না,&lt;br /&gt;নিক্কারিন আঙ্গাদে নিসকজা&lt;br /&gt;আমার দৃষ্টি সীমারই বাইরে&lt;br /&gt;বান্দি হানথাং মাআম্মে রিয়াংজক&lt;br /&gt;বান্দি নিজে শব্দ করে চলে গেলো&lt;br /&gt;বায়ানা নাসঙ্গা&lt;br /&gt;কোথায় তোমরা ??&lt;br /&gt;রিস্‌ফিলখো খিজামা নাসঙ্গা বিলআরা দংজামা নাসঙ্গা&lt;br /&gt;তোমাদের শরীরে কী শক্তি নেই, পুরুষলিঙ্গ কী বহন করোনি ?&lt;br /&gt;ইখো মানজাওদে... আকথেত্তারি গাল্লেত, গাল্লেত&lt;br /&gt;এটি না পারলে ছিঁড়ে ফেলে দাও, ফেলে দাও&lt;br /&gt;ইনাআন খাদিঙ্গা মিন্থ্রা দিসা দংগিপ্‌আরাংদে&lt;br /&gt;একথা শুনে উপস্থিত যুবতীরা হেসেছে&lt;br /&gt;বান্দিয়ানি ইন্নানান, বান্দিয়ানি বলানান&lt;br /&gt;বান্দির কথা বলার জন্য।&lt;br /&gt;বিয়া হানথাং রিয়াঙ্গা জাকসামসাও রিম্মিমুং গুসিথাপ্পি রয়েঙ্গা, বান্দিদে&lt;br /&gt;নিজে গিয়ে একহাতে ধরে আছাড় দিয়ে নাচছে বান্দি!&lt;br /&gt;‘উক’ ইন্নেরুম্মআ, বিনি জাকসিখিলচান, বিয়াদে&lt;br /&gt;উক শব্দ করে। নখ দিয়ে&lt;br /&gt;রাসত্তিমুং নিজকনে, বিয়াদে&lt;br /&gt;জবাই করে দেখলো সে&lt;br /&gt;বান্দিদে. বিয়াদে&lt;br /&gt;বান্দি......&lt;br /&gt;উক উক ইন্নবা ওয়াতজাজক,&lt;br /&gt;উক উক শব্দ করলেও ছাড়লো না,&lt;br /&gt;জাথেং সামসা গাথাপ্পে জাকসিখিলচা থেতফ্রুজক, বিয়াদে&lt;br /&gt;এক পা দিয়ে চেপে রাখলো,নখ দিয়ে বিচ্ছিন্ন করলো&lt;br /&gt;ইখো মাতচতিসা বিয়াদে&lt;br /&gt;সেটি শেষ করে&lt;br /&gt;দনবাজক সিয়েত্তেমুং দনবাজক&lt;br /&gt;মৃত করে রেখে এসেছে।&lt;br /&gt;ইখো সঙ্গনা রাং-বো, ইখো থারি রিমবো&lt;br /&gt;রান্নার জন্য নিয়ে নাও, এটি তৈরী করো-&lt;br /&gt;ইন্নেমুংনা বান্দিদে গবেংব্রাক্‌কি দনবাজক&lt;br /&gt;বান্দি ছুঁড়ে রেখে এসেছে&lt;br /&gt;য়্যা ওয়াকফিসাখোদে, বিয়াদে&lt;br /&gt;ঐ শূকরের বাচ্চাটি&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(অসমাপ্ত)&lt;br /&gt;কৃতজ্ঞতাঃ&lt;br /&gt;বন্ধুত্বের দাবি পেরিয়ে হয়তো কখনো যাকে বিরক্ত করেছি-বিপ্র চিসিম;&lt;br /&gt;সুপার রাকসাম, প্রাণশন দালবৎ, সুহাস দফো।&lt;br /&gt;আরো অনেকে...খাত্তাদক্কা শোনার সুবাদে আমরা যারা&lt;br /&gt;মেতে উঠেছিলাম...!&lt;br /&gt;মিলিত হয়েছিলাম...!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2837909860989867301-8628209954599895845?l=mrhittika.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mrhittika.blogspot.com/feeds/8628209954599895845/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2837909860989867301&amp;postID=8628209954599895845' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2837909860989867301/posts/default/8628209954599895845'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2837909860989867301/posts/default/8628209954599895845'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mrhittika.blogspot.com/2007/09/blog-post.html' title='মৃত্তিকা; বর্ষ ক্রম:০২, সংখ্যা ক্রম: ০২'/><author><name>মৃত্তিকা</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03022969983760257374</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_7B_R9zaBeCg/Rupaw1cwjuI/AAAAAAAAAA8/xAykh2DVBug/s72-c/Cover-3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2837909860989867301.post-5240563271440467807</id><published>2007-08-31T01:56:00.000-07:00</published><updated>2007-09-11T00:35:25.380-07:00</updated><title type='text'>মৃত্তিকা বুলেটিন ক্রম: ০১; বর্ষ ক্রম:০২</title><content type='html'>&lt;p align="left"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_7B_R9zaBeCg/RuZDaYhInuI/AAAAAAAAAAc/8-82X1_JEo0/s1600-h/cover-2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5108844947835494114" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_7B_R9zaBeCg/RuZDaYhInuI/AAAAAAAAAAc/8-82X1_JEo0/s320/cover-2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;em&gt;মৃত্তিকা&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;জাতিতাত্ত্বিক লোকায়ত জ্ঞান ও সংস্কৃতি বিষয়ক কাগজ&lt;br /&gt;বর্ষক্রম:০২,বুলেটিন ক্রম:০১&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;বীর শহীদ পীরেন স্নালের মহান আত্মত্যাগের এক বছরে বিশেষ পত্র &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;প্রকাশকাল: ২০ পৌষ ১৪১১ বঙ্গাব্দ, ৩ জানুয়ারি ২০০৫ খৃষ্টাব্দ।।৩৪৭ শহীদ সালাম বরকত হল, জাহাঙ্গীরনগর বিশ্ববিদ্যালয় , ঢাকা থেকে প্রকাশিত।। বিনিময়: ২ টাকা&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;সম্পাদনা:জুয়েল বিন জহির, পরাগ রিছিল, দুপুর মিত্র; সহযোদ্ধা: শারমিন শর্মী, জাহানারা খাতুন সীমা, তাসলিমা আক্তার রোমন।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;বীর শহীদ পীরেন স্নালের রক্ত বলে যায় নিরন্তর সংগ্রামের কথা&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#333399;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#333399;"&gt;১.শালবন কোচ,বর্মণ, মান্দি জাতির হা.বিমা...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#333399;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;টাঙ্গাইল ও ময়মনসিংহ জেলার বিস্তীর্ণ এলাকা জুড়ে একসময় ছিল শালবনে আচ্ছাদিত মধুপুর গড় এলাকা। এই শালবনে হাজার হাজার বছর ধরে মান্দি, কোচ, বর্মণ প্রভৃতি জাতিসত্ত্বার লোকজন বসবাস করে আসছে। এই শালবনকে কেন্দ্র করেই গড়ে উঠেছে তাদের বর্ণাঢ্য ও বৈচিত্র্যময় জীবনাচার। শালবন মান্দি জাতির হা.বিমা। এই হা.বিমা তাদের কাছে অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ ও পবিত্র। বলশাল ব্রিং এর নানান প্রজাতির গাছপালা-তরুলতা, পশুপাখি সব কিছুর সাথেই গড়ে উঠেছে তাদের অকৃত্রিম সখ্যতা। কেননা মান্দিরা বিশ্বাস করে যে, এই ব্রিং এর যত গাছ-পালা, পশু-পাখি সব কিছুই সৃষ্টি হয়েছে মিদ্দি বাগবা-র পবিত্র চিপাংফাক্‌ছা থেকে। একসময় শালবনের ভিতরে নিজস্ব রীতিতে হাবাহু.আ-র মাধ্যমে ঘরে তুলত নানান ফসলাদি। কোন অভাব অনটন তেমন ছিল না। শালবনে বিচরনের ক্ষেত্রে বা ফল-মূল সংগ্রহ বা হাবাহু.আ-র জন্য কারো কাছে কোন অনুমতির প্রয়োজন পড়ত না। কেউ একবার কোন জংলা জমি পরিস্কার করে যদি জুম আবাদ শুরু করত তাতেই ঐ জমির উপর তার অধিকার প্রতিষ্ঠা পেয়ে যেত। অন্য কেউ তখন আর ঐ জমির উপর নিজ অধিকার প্রতিষ্ঠার কোনরূপ চেষ্টা করত না। এটাই ছিল সমাজের নিয়ম, যা বংশপরম্পরায় চলে আসছিল প্রজন্ম থেকে প্রজন্মান্তরে। কিন্তু এরপর একে একে পাল্টাতে থাকে শালবনের উপর আদিবাসীদের প্রথাগত অধিকারের ধরন-ধারন। ব্রিটিশ জমিদারি প্রথার মাধ্যমে মধুপুর গড় নাটোরের রাজার অধীনে আসে। নাটোরের রাজার শাসনাধীন হওয়ার পর মান্দিরা শালবনের নিচু জমি নিজেদের নামে রেজিষ্ট্রি করে নিতে এবং উঁচু জমিতে লীজের মাধ্যমে চাষাবাদ করতে পারতো। ১৮৭৮ সালে ধানী জমি ভারতীয় প্রজাসত্ত্ব আইনে নথিভুক্ত করা হয় যার আওতায় বছর বছর তারা নিয়মিত কর প্রদান করে থাকে। দ্বি-জাতিতত্ত্বের ভিত্তিতে পাকিস্তান রাষ্ট্র প্রতিষ্ঠার পর থেকেই শুরু হয় নানান প্রকল্প-প্রক্রিয়ায় শালবনেরই সন্তান মান্দি, কোচ, বর্মণদের উচ্ছেদ করার নিত্য নতুন আয়োজন। আর এইসব আয়োজন-ষড়যন্ত্রের বিরুদ্ধে মান্দি, কোচ, বর্মণেরা লড়ে গেছেন অসীম সাহসিকতায়। নিজ জননী ভূমিকে রক্ষার জন্য সেই ১৯৪৭ সালের পর থেকেই রচনা করে চলেছিল একের পর এক প্রতিরোধের। আর এই প্রতিরোধ সংগ্রামের ধারাবাহিকতায় ৩ জানুয়ারি গায়রা গ্রামে বহু যুগের নির্যাতন-নিপীড়নের পুঞ্জিভূত ক্ষোভ তাদেরকে দাঁড় করিয়েছিলো ইকোপার্কের নামে হা.বিমাকে দেয়াল দিয়ে ঘেরার প্রতিবাদ জানাতে।খা সাংমা,খা মারাক-ধ্বনিতে দ্রোহের আগুন ছড়িয়ে পড়েছিল চারিদিকে, জড়ো হয়েছিল হাজার হাজার মান্দি, কোচ, বর্মণ জাতিসত্ত্বার লোকজন। নিজেদের অধিকার এবং নিজ হা.বিমার সম্মান কে অক্ষুণ্ন রাখার দৃঢ় প্রত্যয় নিয়ে সমবেত হয়েছিল দেয়াল নির্মাণ রুখে দিতে। সেদিন হাজার হাজার আদিবাসীর বিপ্ল&amp;shy;বী চেতনাকে ম্ল&amp;shy;ান করে দিতে বনরক্ষী ও সরকারি পেটোয়া বাহিনী পুলিশের গুলিতে শহীদ হয়েছিলেন পীরেন স্নাল; আহত হয়েছিলেন উৎপল নকরেক, এপিল সিমসাং, শ্যামল চিরান ও রীতা নকরেক সহ আরো অনেকেই। এই যে পীরেন স্নালের মৃত্যু বা আরো অনেকের আহত হওয়ার ঘটনা, তা কোন ভাবেই কোন বিচ্ছিন্ন ঘটনা নয়। শালবনের আদি বাসিন্দাদের উচ্ছেদ ও শালবনকে ধ্বংস করার জন্য বন বিভাগ বা শাসক গোষ্ঠীর ধারাবাহিক অমানবিক, নিষ্ঠুর ও পৈশাচিক কর্মকাণ্ডের একটা অংশমাত্র।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;২.শালবন ধ্বংস এবং আদিবাসী উচ্ছেদ প্রক্রিয়ার নাম ফরেস্ট এ্যাক্ট, রিজার্ভ ফরেস্ট, ফরেস্ট ডিপার্টমেন্ট, ন্যাশনাল পার্ক প্রকল্প,তুঁত চাষ, ফায়ারিং রেঞ্জ...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;যুগ যুগ ধরে শালবনে বসবাসরত কোচ, মান্দিদের কখনো বনের উপর মালিকানা নিয়ে মাথা ঘামানোর প্রয়োজন পড়েনি। অন্যভাবে বলা যায় যে, মালিকানা শব্দটির অর্থই ছিল তাদের কাছে অজ্ঞাত। যে শালবনে তাদের জন্ম, বেড়ে উঠা, বনকে ঘিরেই যাদের ধর্ম, আচার, সংস্কৃতি তার আবার মালিকানা কীসের। তারাতো বনের জন্য ক্ষতিকর এমন কোন কাজ কখনো করেনি। বন থেকে যখন থারেং, থা.মান্দি সংগ্রহ করতো তখনতো তারা পুরো গাছটাকেই উপড়ে তুলে ফেলত না; বরং কাঙিখত আলু বা কচু সংগ্রহের পর সেই গাছটি আবার সযত্নে মাটিতে পুঁতে দিতো। বিভিন্ন আমুয়া(পূজো) বা অন্যান্য কাজে যখন ফুল-ফল, লতা-পাতার প্রয়োজন পড়তো তখনতো জঙ্গলের বা গাছের কাছে অনুমতি না নিয়ে তারা একটা জিনিসেও হাত দিতো না। তারাতো বন থেকে কোন জিনিস অবাধে লুটে-পুটে নিয়ে কখনো বাইরে পাচার করেনি। বরং বনের জীববৈচিত্র্য যাতে অক্ষুন্ন থাকে এজন্য মান্দিরা প্রতিবছর বর্ষাকালে পালন করতো আসংদেনা আমুয়া। আমুয়ার দিন খামালের (পুরোহিতের) পিছনে পিছনে সবাই জঙ্গলে প্রবেশ করে একটা জায়গায় পূজোর কৃত্যাদি সম্পন্ন করার পর সেখানে সবাই মিলে রোপন করতো নতুন গাছের চারা। এভাবেই নানান নিজস্ব রীতি-নীতিতে তারা বনকে, বনের জীববৈচিত্র্যকে রক্ষা করে আসছিল যুগ যুগ ধরে। বনকে ধ্বংস তো দুরে থাক, বনের সামান্যতম ক্ষতি করাকেও তারা মারাং বা দূষণীয় জ্ঞান করতো। এইছিলো শালবন কে ঘিরে কোচ, মান্দি, বর্মণদের ধ্যান-ধারনা বা বিশ্বাস। আর এই বিশ্বাসের বিপরীতেই পাকিস্থান প্রতিষ্ঠার কয়েক বছরের মাথায় সরকারের লোলুপ দৃষ্টি পড়ে মধুপুর শালবনের উপর। ১৯৪৯ সালের `East Pakistan Private Forest Act’(Act of 1950) এবং ১৯৫০ সালের `East Pakistan State Acquisition and Tendency Act’ এর অধীনে ‘রিজার্ভ ফরেস্ট ঘোষণার মাধ্যমে শালবনকে দখল করা হয়। এরপর বনবিভাগ কর্তৃক শুরু হয় কোচ,মান্দি, বর্মণদের উপর একের পর এক উচ্ছেদ নোটিশ, জবরদখল, লুটপাট, মিথ্যামামলার নানাবিধ খড়গ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ভারতীয় প্রজাসত্ত্ব আইন রদ এবং এই আইনের আওতাধীন আদিবাসীদের রেজিষ্ট্রিকৃত জমি বাজেয়াপ্ত করার প্রচেষ্টাসহ ১৯৫৬ সালে পশ্চিম পাকিস্তান সরকারের বন সেটেলমেন্ট অফিসার এস. এইচ. কোরেশী উচ্ছেদ নোটিশের ইশতেহার প্রকাশ করেন।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯৬২ সালে তৎকালীন পূর্ব পাকিস্তানের গর্ভণর আজম খান মধুপুর বনে ৪০ বর্গমাইল এলাকা নিয়ে ন্যাশনাল পার্ক বা জাতীয় উদ্যান প্রতিষ্ঠার প্রকাশ্য ঘোষণা করে এবং এই ঘোষণার প্রেক্ষিতে প্রায় ২১ হাজার একর এলাকায় যেখানে হাজার হাজার মান্দিরা বসবাস করছে সেখানে কাঁটা তারের বেড়া দিয়ে ঘিরে দেওয়া হয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯৬৮ সালে গভর্ণর ও বনমন্ত্রী কোন রকম ক্ষতিপূরণের আশ্বাস ব্যতিরেকেই চুনিয়া গ্রামের মান্দিদের প্রথম উচ্ছেদ নোটিশ এবং ১৯৬৯ সালে জাতীয় উদ্যান প্রকল্পের ভারপ্রাপ্ত কর্মকর্তা কর্তৃক চুনিয়া গ্রামে দ্বিতীয় উচ্ছেদ নোটিশ জারি করে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯৭১ সালে বাঙালির স্বাধীনতা সংগ্রামে শালবনের বাসিন্দারাও ঝাঁপিয়ে পড়েছিল পাকসেনাদের বিরুদ্ধে। হাতে তুলে নিয়েছিল অস্ত্র, লড়েছিল জীবন বাজি রেখে। শহীদ হয়েছিলেন অনেক আদিবাসী নারী-পুুরুষ। কিন্তু স্বাধীসতা সংগ্রামের পরেও শালবনের আদিবাসীদের উপর রাষ্ট্রীয় আচরনের তেমন কোন পরিবর্তন হয়নি। বনের অধিবাসীদের বিরুদ্ধে পূর্ববর্তী আমলের সমস্ত কালাকানুনই থেকে যায় অপরিবর্তিত। ১৯২৭ সালের`The colonial Forest Act’ পাল্টায় না, চরিত্র বদল হয় না বনবিভাগের, বনমন্ত্রীর বা রাষ্ট্রযন্ত্রের। মাঝে মাত্র তিনবছর বাদ দিয়ে ১৯৭৪ সাল থেকেই আবার পুরোদমে শুরু হয়ে যায় বনবাসীদের নিজ ভূমি থেকে উচ্ছেদের রকমারি সব কৌশলাদির বহুমাত্রিক প্রয়োগ। মাঝে মধ্যেই নানান অজুহাতে ফলবাগান, ধানীজমি সবকিছুই তছনছ করে দিয়ে যেত বনকর্মকর্তাদের নেতৃত্বে বনরক্ষীরা। বনের অধিবাসীরা স্থানীয় থানায় মামলা করতে গেলেও সেই মামলা গ্রহণ করা হত না।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯৭৭ সালে বনবিভাগ কর্তৃক শালবনের ভিতর কৃত্রিম লেক তৈরির নামে কোচ-মান্দিদের উচ্ছেদ প্রক্রিয়া, ১৯৭৮ সালে বাংলাদেশ সরকার কর্তৃক ন্যাশনাল পার্ক প্রকল্পের আওতাধীন এলাকায় হাজার হাজার বছর ধরে বসবাসরত অধিবাসীদের উচ্ছেদ নোটিশ জারি করে। একই বছর মুক্তিযোদ্ধা সংসদ কর্তৃক ভেড়া চড়ানোর নাম করে শালবন এলাকার চাপাইদ গ্রামে আদিবাসীদের ভূমি দখল করে নেয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯৮১ সালে ময়মনসিংহ বিভাগীয় বনকর্মকর্তার বিট অফিস প্রতিষ্ঠা ও তুঁত গাছ রোপনের নামে শালবনের মান্দিদের ১০৮ একর জমি দখল করে নেয় বনবিভাগ। আর এই দখল কার্যের জন্য বনবিভাগ প্রায় দুইশত বাঙালি মুসলমানকে জয়নাগাছা, বন্দেরিয়চলা, কেজাই গ্রামে নিয়ে আসে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯৬২ সালের তৎকালীন গভর্ণর আজম খান কর্তৃক ঘোষিত ন্যাশনাল পার্ক প্রকল্পের সার্থক বাস্তবায়ন ঘটে ১৯৮২ সালে স্বৈরশাসক এরশাদের শাসনামলে। সরকারি ভাবেই তখন মধুপুর গড়ের ২০,৮৩৭.২৩ একর বনভূমি নিয়ে মধুপুর জাতীয় উদ্যান ঘোষণা দেওয়া হয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৯৮৪ সালে আবার শালবন দখল হয় নতুন নামে নতুন ভাবে। শালবনের পরিবেশ-প্রতিবেশের কথা বিন্দুমাত্র না ভেবেই টেলকীপাড়া ও নয়াপাড়া গ্রামে বনকে ধ্বংস করে মান্দিদের নিজ জমিতে বিমান বাহিনীর জন্য ফায়ারিং রেঞ্জ প্রতিষ্ঠা করা হয়। মান্দিরা সাথে সাথেই এর বিরুদ্ধে গড়ে তুলেছিল তাদের নিয়মতানিত্রক প্রতিরোধ। কিন্তু এই প্রতিরোধে বিন্দুমাত্র কর্ণপাত করেনি বন রক্ষার প্রতিষ্ঠান বনবিভাগ বা রাষ্ট্রযন্ত্র।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;৩.শালবন ধ্বংস এবং আদিবাসী উচ্ছেদ প্রক্রিয়ার নাম রাবার চাষ উন্নয়ন প্রকল্প, উডলট প্রকল্প....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আন্তর্জাতিক সংস্থা এশীয় উন্নয়ন ব্যাংকের (Asian Development Bank-ADB) অর্থায়নে দ্বিতীয় রাবার চাষ উন্নয়ন প্রকল্প মধুপুর শালবনে শুরু হয় ১৯৮৭ সালে। শালবনের বাস্তুতান্ত্রিক অবস্থাকে (Ecological Condition) বিবেচনা না করেই সম্পূর্ণ ব্যবসায়িক স্বার্থে অবৈজ্ঞানিক ও জীববৈচিত্র্য (Biodiversity) বিধ্বংসী এই প্রকল্প হাতে নেওয়া হয়। এই রাবার চাষ প্রকল্পের জন্য ১৫০০০ একর জমি প্রকল্প আওতাধীন ধরা হলেও বনের বাসিন্দাদের বিরোধীতার মুখে ৭০০০একর জমিতে প্রকল্পের কাজ শুরু হয়। আর এই ৭০০০ একর জমিও দখল করা হয় সেই পুরনো কায়দায় অর্থাৎ মান্দিদের উচ্ছেদ প্রক্রিয়ার মাধ্যমে। রাবারের মনোকালচারের জন্য ৭০০০ একর জমি থেকে পুরো শালবন কেটে ধ্বংস করা হয়। মাটি থেকে সমূলে উপড়ে ফেলা হয় শালগাছের কপিছ (Sal coppices), যা ঐ এলাকায় ভবিষ্যতে শালবন সৃষ্টির প্রাকৃতিক সম্ভাবনাকেও স্থায়ী ভাবে ধ্বংস করে দেয়। পরে অবশ্য স্থানীয় অধিবাসীদের সাথে পরিবেশবাদীরা এ ব্যাপারে সোচ্চার হলে এশীয় উন্নয়ন ব্যাংক প্রকল্প বন্ধে বাধ্য হলেও শালবনের যে মারাত্বক ক্ষতি হয়েছে তা পূরণ হবার নয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;রাবার চাষ প্রকল্পের দুই বছর না যেতেই আসে পাঁচ বছর মেয়াদী (১৯৮৯-১৯৯৫) থানা বনায়ন ও নার্সারী উন্নয়ন প্রকল্প, যা সোস্যাল ফরেষ্ট্রি (Social Forestry) নামে পরিচিত। এবার সেই একই আন্তর্জাতিক সংস্থা এশীয় উন্নয়ন ব্যাংকের (Asian Development Bank-ADB) ৪৬.৮ মিলিয়ন মার্কিন ডলারের প্রকল্প ব্যয়ের ১১.৬ মিলিয়ন মার্কিন ডলার ব্যয় করা হয় শালবন এলাকায় উডলটের পেছনে। মধুপুরের শালবনে এই উডলট প্রকল্পে শতশত একর জমি জোরপূর্বক দখল করে নেওয়া হয়। উডলটের ব্ল&amp;shy;ক তৈরীর জন্য দখলকৃত জমির কপিছ সহ সমস্ত শালগাছ এবং হাজার হাজার প্রজাতির মূল্যবান ঔষধি গাছ সমূলে বিনষ্ট করা হয়। সেখানে লাগানো হয় Eucalyptus spp., Dalbergia sissoo, Leucaena leucocephala, Swietenia macrophylla এবং Cedra toona ইত্যাদি বিদেশি গাছ। উলে&amp;shy;খ্য যে এসমস্ত গাছ সাধারনত মরু (Barren) এলাকায় বনায়নের প্রাথমিক পর্যায়ে ব্যবহার করা হয়। অথচ আমাদের এখানে হাজার হাজার বছরের পুরোনো প্রাকৃতিক শালবন ধ্বংস করে বিভিন্ন আন্তর্জাতিক সংস্থার প্রেসক্রিপশনে এইসমস্ত গাছ লাগনো হয়েছে। আর এই সমস্ত আয়োজনই যে শালবনকে ধ্বংস এবং শালবনের আদিবাসী কোচ, মান্দি, বর্মণদের বিপন্ন থেকে বিপন্নতর করে দেওয়ার দেশীয়-আন্তর্জাতিক চক্রান্ত তা বলাই বাহুল্য।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;৪.শালবন ধ্বংস এবং আদিবাসী উচ্ছেদ প্রক্রিয়ার নাম ইকোপার্ক প্রকল্প...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৯৭.৩ মিলিয়ন টাকার মধুপুর জাতীয় উদ্যান উন্নয়ন প্রকল্পের (Modhupur National Park Development Project) আওতায় ফরেষ্ট কনজারভেশন ও ইকোটুরিজম স্কীমের সরকারী অনুমোদন লাভ করে ১৯৯৯-২০০০ অর্থবছরে তদানীন্তন আওয়ামী লীগ সরকারের আমলে। পরবর্তীতে চারদলীয় জোট সরকার ক্ষমতাসীন হওয়ার পর এই প্রকল্প বাস্তবায়নে সক্রিয় হয়। জীববৈচিত্র্য সংরক্ষণ এবং বিলুপ্ত প্রায় উদ্ভিদ প্রজাতি, পশু-পাখি ও বণ্যপ্রাণীর নিরাপদ আবাসস্থল নির্মাণের ভালো ভালো বুলি আওড়ে মধুপুর গড়ের প্রায় ৩ হাজার একর বনভূমি ঘিরে ৭ফুট উচ্চতার ৬১ হাজার ফুট ইটের দেয়াল এবং ভেতরে ১০টি পিকনিক স্পট, ২টি ওয়াচ টাওয়ার, ২টি কালভার্ট, ৩টি কটেজ, জলাধার সহ লেক ৯টি, রেষ্ট হাউজ ৬টি, রাস্তা নির্মাণ ৬টি, বন কর্মীদের ৬টি ব্যারাক নির্মাণের কাজ শুরু হয়। ২০০৩ সালের ৩ জানুয়ারি জালাবাদা, সাধুপাড়া, বেদুরিয়া, কাঁকড়াগুনি, গায়রা গ্রাম গুলোতে দেয়াল নির্মাণের জন্য বনকর্মীরা জড়িপ কাজ শুরুর আগ পর্যন্ত সেখানকার আদিবাসীরা এই দেয়াল নির্মাণের ব্যাপারে তেমন কিছুই জানতো না। অথচ এই প্রকল্পাধীন ভূমিতেই রয়েছে হাজার হাজার কোচ, মান্দিদের বসবাস। ইকোপার্কের নামে কোচ, মান্দিদের উচ্ছেদের এটা যে পুরনো উদ্দেশ্যরই নব্য একটি প্রক্রিয়া তা আর বুঝতে বাকি থাকেনা আদিবাসীদের। জানুয়ারির মাঝামাঝিতে মুক্তাগাছা থানার বিজয়পুর ও সাতারিয়া এলাকায় মান্দি গ্রাম গুলোতে স্থানীয় মান্দিদের তীব্র প্রতিবাদের মুখেও বনবিভাগ প্রথম দেয়াল নির্মাণের কাজ শুরু করে। মান্দি, কোচ, বর্মণেরা জানে এই ইকোপার্কের দেয়াল নির্মাণের ভয়াবহতা কত মারাত্মক পরিণতি ডেকে আনবে তাদের জীবনাচারে। সংঘবদ্ধ হতে থাকে আদিবাসীরা। বিভিন্ন কর্মসূচী পালনের মাধ্যমে তাদের দাবিসমূহ বিভিন্ন ভাবে সরকারের সামনে তুলে ধরবার চেষ্টা করেন। আদিবাসীদের আন্দোলনের চাপে তৎকালীন বন ও পরিবেশ মন্ত্রী শাহজাহান সিরাজ ২০০৩ সালের ৪ জুলাই দোখলায় আদিবাসী নেতৃবৃন্দের সাথে বৈঠকে বসেন। আদিবাসীরা তাদের বিভিন্ন দাবি-দাওয়া মন্ত্রীর কাছে পেশ করেন। অফলপ্রসু এক আলোচনার পর সরকারের পক্ষ থেকে আদিবাসী নেতৃবৃন্দদের সমন্বয়ে একটি কমিটি গঠনের প্রস্তাব দেওয়া হয়, যে কমিটি ইকোপার্ক সংক্রান্ত উদ্ভুত পরিস্থিতি পর্যালোচনা করে রিপোর্ট পেশ করবে। মূলত এই প্রস্তাব ছিল সরকারের পক্ষ থেকে ইকোপার্ক বিরোধী আন্দোলনকে বানচাল করে দেওয়ার একটা পাঁয়তারা। এই প্রস্তাব পেশ করেই তৎকালীন বন ও পরিবেশ মন্ত্রী আদিবাসীদের যৌক্তিক দাবি-দাওয়ার ব্যাপারে কোন কিছু না বলে চলে যান। পরবর্তীতে বনবিভাগ সরকারের পরিকল্পনা মোতাবেক যারা দীর্ঘদিন ধরে মান্দি, কোচ, বর্মণদের নিয়ে ইকোপার্কের বিরুদ্ধে আন্দোলন-সংগ্রামে নেতৃত্ব দিয়ে আসছিলেন সেই সব প্রকৃত নেতাদের বাদ দিয়ে খ্রিস্ট্রীয় মিশন প্রধান ও কতিপয় স্বার্থান্বেষী ব্যক্তিবর্গের সমন্বেয় পর্যালোচনা কমিটি গঠনের পরিবর্তে মূলত ইকোপার্ক প্রকল্প সুষ্ঠভাবে বাস্তবায়নের জন্য একটি কমিটি গঠন করে। সরকারের তৈরীকৃত বিশ্বাসঘাতক এই দালাল শ্রেণী এরপর থেকে ইকোপার্কের পক্ষে জনমত গড়ে তোলার জন্য কিছু অকার্যকর মিটিং-সমাবেশের আয়োজন করতে থাকেন। সংগ্রামরত আদিবাসীরা এই চিহ্নিত দালালদের কথায় বিন্দুমাত্র কর্ণপাত না করে চালিয়ে যেতে থাকে তাদের অস্তিত্ব রক্ষার সংগ্রাম, হা.বিমাকে রক্ষা করার সংগ্রাম। ২৩ ডিসেম্বর ২০০৩ সালে গায়রাতে অনুষ্ঠিতব্য সমাবেশ থেকে ঘোষণা দেওয়া হয় ৩ জানুয়ারি ২০০৪ সালে ইকোপার্ক বিরোধী মিছিলের। সেই ঘোষণার প্রেক্ষিতেই ৩ জানুয়ারি -০৪ গায়রা গ্রামে সাধুপাড়া, কাকড়াগুনি, জয়নাগাছা, জালাবাদা, বিজয়পুর, সাতারিয়া সহ আশেপাশের গ্রাম থেকে হাজার হাজার আদিবাসী নারী-পুরুষ নিজেদের অধিকার রক্ষার আন্দোলনে শামিল হয়। খা সাংমা খা মারাক-ধ্বণিতে মুখর হয়ে উঠে পুরো শালবন এলাকা। এদিকে সমাবেশ ও মিছিলের খবর পেয়ে সকাল থেকেই সেখানে সরকারের পক্ষথেকে বিপুল সংখ্যক পুলিশ ও অস্ত্রধারী বনরক্ষীদের এমনকি ঠিকাদারের ভাড়াটে লোকদেরও মোতায়ন করে রাখা হয়েছিল। সমাবেশ শেষে দুপুর বারোটার দিকে শুরু হয় বিক্ষোভ মিছিল। মিছিলটি কিছুদুর অগ্রসর হওয়ার পরপরই পুলিশ ও বনরক্ষীদের নির্বিচারে গুলিবর্ষণ শুরু হলে ঘটনা স্থলেই নিহত হন জয়নাগাছা গ্রামের বিশ বছরের যুবক পীরেন স্নাল; গুলিবর্ষণে মারাত্মক আহত হন রবীন সাংমা, উৎপল নকরেক, এপ্রিল সিমসাং, পঞ্চরাজ ঘাগ্রা, রহিলা সিমসাং, শ্যামল সাংমা, রিতা নকরেক সহ প্রায় ২৫জন আদিবাসী শিশু-কিশোর-নারী-পুরুষ। এই ঘটনার পরপরই আদিবাসীরা বিক্ষোভে ফেটে পড়েন। মাসব্যাপী চলে তাদের তুমুল বিক্ষোভ মিছিল, সমাবেশ। এদিকে বনবিভাগ বা সরকার শুধু হত্যা ও আহত করেই থেমে থাকেনি। ৪ জানুয়ারি রাতেই নিহত পীরেন স্নাল ও গুলিতে আহত উৎপল নকরেক, জর্জ নকরেক, শ্যামল সাংমা, মৃদুল সাংমা, হ্যারিসন সাংমা, বিনিয়ান নকরেক সহ অজ্ঞাত প্রায় ছয়শত জনকে আসামি করে মামলা দায়ের করে মধুপুর থানার হাবিলদার বাদী হয়ে। এভাবেই বনবিভাগ বা রাষ্ট্রের পক্ষ থেকে ইকোপার্ক বিরোধী আন্দোলন শুরুর পর থেকে আদিবাসীদের বিরুদ্ধে অসংখ্য মিথ্যা মামলা দায়ের করে। শুধুমাত্র জুন ২০০৩ - জুলাই ২০০৪ পর্যন্তই আদিবাসী নেতৃবৃন্দসহ নিরীহ অনেকের নামে বনবিভাগ বা সরকার মামলা দায়ের করে মোট একুশটি। এই একুশটি মামলার সবকটিতেই যাদের নাম রয়েছে তারা হলেন অজয় মৃ, প্রশান্ত মানখিন, পঞ্জরাজ ঘাগ্রা, মালতি নকরেক, স্বপন নকরেক, নেরি দালবত, মাইকেল নকরেক, চলেশ রিছিল প্রমুখ। আর পীরেন হত্যার পর আদিবাসীদের পক্ষ থেকে যে মামলা দয়ের করা হয়েছিল তা উপযুক্ত তথ্য-প্রমান নেই এই অজুহাত দেখিয়ে খারিজ করে দেয় ম্যাজিষ্ট্রেট আদালত; অথচ গুলিতে গুরুতর আহত অনেকেই হুইল চেয়ারে করে আদালতে গিয়ে সাক্ষী দিয়ে এসেছিলেন। শুধু তাই নয়,পীরেন স্নাল নিহত হওয়ার পরপরই বনবিভাগ ঘটনার দায়ভার এড়াতে রাতের অন্ধকারে শালবনের বিপুল সংখ্যক গাছ কেটে সরিয়ে নেয়, আর পরবর্তীতে গাছ চুরির মামলা ঠুকে দেয় নিরীহ আদিবাসীদের নামে। এই হচ্ছে বনবিভাগ বা রাষ্ট্র কর্তৃক জীববৈচিত্র্য রক্ষার নমুনা।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;৫.খা সাংমা, খা মারাক...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;বনবিভিাগ ও রাষ্ট্রের তত্ত্বাবধানে এযাবতকালে যতগুলো পরিকল্পনা-প্রকল্প নেওয়া হয়েছে তার কোনটাই যে শালবনকে, শালবনের জীববৈচিত্র্যকে রক্ষার জন্য নেওয়া হয়নি বরং সেখানকার আদিবাসীদের উচ্ছেদের মাধ্যমে শালবনের সম্পদ লুট-পাট করার তা অতি স্পষ্ট। যে বনবিভাগ বনরক্ষার (?) মহান ব্রতে (!) নিয়োজিত সেই বনবিভাগের কর্মকর্তারা নিজেরাই কালোবাজারিদের সাথে আতাঁত করে শালবনের সম্পদ পাচার করে আর আদিবাসীদের নামে একের পর এক মিথ্যা মামলা দায়ের করে চলে। টেলকী গ্রামের এক সিরিন নকরেকের বিরুদ্ধেই বনবিভাগ মামলা দায়ের করেছে প্রায় অর্ধশতকের মতন। বনের গাছ চুরির অভিযোগে সিরিন নকরেক জেলে থাকাকালীন সময়েও তার বিরুদ্ধে গাছ চুরির নতুন নতুন মামলা হয়। তাহলে প্রশ্ন থেকে যায়, জেলে থাকাকলীন সময়েও একজন লোক কিভাবে বনের গাছ চুরি করতে পারেন ? এর সদুত্তর বনের বাসিন্দারা কখনো পায়নি বনবিভাগের কাছে বা রাষ্ট্রের কোন প্রশাসন যন্ত্রের কাছে। তারপরেও বনের বাসিন্দারা বারবার বনকর্মকর্তাদের গাছ পাচার বন্ধ করতে নিজেরাই উদ্যোগ নিয়েছিলেন, চেষ্টা করেছিলেন শালবনের সম্পদ রক্ষা করতে। আর এর জন্য ১০ এপ্রিল ১৯৯৬ সালে জয়নাগাছা গ্রামের বিহেন নকরেককে দিনেদুপুরে জীবন দিতে হয়েছিল বনরক্ষীর গুলিতে। বিহেনের অপরাধ ছিলো ঘটনার দিন বনের ভেতর পাতা কুড়াতে গেলে সে বনবিভাগের গাছ চুরি দেখে ফেলে এবং এর বিরুদ্ধে প্রতিবাদ করে। এরপর উল্টো বনবিভাগের দাযেরকৃত গাছ চুরির মিথ্যা মামলায় আদালত রায় দেয়, বিহেনকে গুলি করা বৈধ হয়েছে কারন সে বনের গাছ চুরি করছিলো। অথচ বন আইনে গাছ চুরি করলেও কাউকে পিছন থেকে গুলি করার নিয়ম নেই। এই হচ্ছে শালবন ও বনের আদিবাসীদের উপর বনবিভাগ বা রাষ্ট্রযন্ত্রের প্রহসনের বাস্তব প্রতিচিত্র। কিন্তু শালবনের যারা আদিবাসিন্দা, শালবন যাদের জীবন-ধর্ম-সংস্কৃতির অবিচ্ছেদ্য অঙ্গ সেই মান্দি, কোচ, বর্মণেরা কোনভাবেই এই শালবনকে ধ্বংস হতে দিতে পারে না, নিজেদের অস্তিত্ব, জীবন, সংস্কৃতিকে কোন ভাবেই বিলীন হতে দিতে পারে না। আর সেজন্যেই যুগে যুগে তারা লড়াই করে এসেছে সমস্ত ষড়যন্ত্র, কালো আইন, নির্যাতন-নিপীড়ন, মিথ্যা মামলা, উচ্ছেদ আর দেয়াল নির্মাণের বিরুদ্ধে। পীরেন স্নাল সেই সংগ্রামী চেতনাকে ধারন করেই নিজ হা.বিমা ও নিজ জাতির অস্তিত্ব রক্ষার সংগ্রামে নিজের তাজা রক্ত ঢেলে দিয়েছিলেন নিজ হা.বিমার বুকে। হা.বিমার বুক থেকে পীরেন স্নালের রক্তের যে আহবান ধ্বনিত-প্রতিধ্বণিত হচ্ছে প্রতিনিয়ত সেই আহবানকে কখনো উপেক্ষা করতে পারে না হা.বিমার সন্তানেরা। বিহেন নকরেক, গীদিতা রেমা ও বীর পীরেনের সংগ্রামী চেতনাকে ধারণ করেই হা.বিমার সন্তানেরা নিজেদের অস্তিত্ব রক্ষার জন্য, শালবন তথা হা.বিমাকে রক্ষার জন্য লড়ে যাবে নিরন্তর।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;তথ্যসূত্র ঃ&lt;br /&gt;১.Bangladesh Land, Forest and Forest People Editor-Philip Gain Published by- SHED, Dhaka.&lt;br /&gt;২.সংহতি ২০০৪।।সম্পাদক-সঞ্জীব দ্রং।। প্রকাশনায়-বাংলাদেশ আদিবাসী ফোরাম; বনানী, ঢাকা।&lt;br /&gt;৩. বিপন্ন ভূমিজ, অস্তিত্বের সংকটে আদিবাসী সমাজ, বাংলাদেশ ও পূবৃভারতের প্রতিচিত্র।। সম্পাদনা- মেসবাহ কামাল,আরিফাতুল কিবরিয়া।। আরডিসি, ২০০৩ ,ঢাকা।।&lt;br /&gt;৪.মান্দিরাংনি চিঠি ।। সম্পাদক-প্রশান্ত চিরান।। ত্রয়োদশ বর্ষ-৫ম সংখ্যা,অক্টোবর ২০০৩।। প্রকাশনায়- ফারাকা কালচারাল এসোসিয়েশন।&lt;br /&gt;৫.আচিক।। সম্পাদক-অর্পন যেত্রা।। বর্ষ-২, সংখ্যা-২, ফেব্রুয়ারি-মার্চ-২০০৪।। ঢাকা।&lt;br /&gt;৬. খোলা চোখ।। সম্পাদক- খোকন রিছিল।। প্রকাশনায়- প্রগতিশীল ছাত্র সমাজ।। ৪৩৪ জগন্নাথ হল , ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়।। আগস্ট ২০০৩, ঢাকা।&lt;br /&gt;৭.দৈনিক প্রথম আলো (৪, ৫, ৬, ৭, ৯, ১০, ১৩, ২৩, ২৭ জানুয়ারি ২০০৪ সংখ্যা), ঢাকা।&lt;br /&gt;৮. দৈনিক ভোরের কাগজ (২৭ জানুয়ারি ২০০৪ সংখ্যা), ঢাকা।&lt;br /&gt;৯.দৈনিক জনকন্ঠ (২৫, ২৭ জানুয়ারি২০০৪ সংখ্যা), ঢাকা।&lt;br /&gt;১০.সাক্ষাতকার-আলবার্ট মানখিন, ইকোপার্ক বিরোধী আন্দোলনের নেতা।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2837909860989867301-5240563271440467807?l=mrhittika.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mrhittika.blogspot.com/feeds/5240563271440467807/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2837909860989867301&amp;postID=5240563271440467807' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2837909860989867301.post-167738607747963678</id><published>2007-08-30T22:48:00.002-07:00</published><updated>2007-09-11T00:49:27.910-07:00</updated><title type='text'>মৃত্তিকা : বর্ষ ক্রম: ০১;সংখ্যা ক্রম: ০১</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_7B_R9zaBeCg/RuZGy4hInvI/AAAAAAAAAAk/YhHKdK1wZvk/s1600-h/Cover-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5108848667277172466" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_7B_R9zaBeCg/RuZGy4hInvI/AAAAAAAAAAk/YhHKdK1wZvk/s320/Cover-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;মৃত্তিকা&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;জাতিতাত্ত্বিক লোকায়ত জ্ঞান ও সংস্কৃতি বিষয়ক কাগজ&lt;br /&gt;প্রথম বর্ষ : প্রথম সংখ্যা ।। ২৫শ্রাবণ ১৪১১ বঙ্গাব্দ, ৯ আগস্ট ২০০৪ খৃ:।। বিনিময় : ৬ টাকা&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;সম্পাদনা: জুয়েল বিন জহির, পরাগ রিছিল, দুপুর মিত্র&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;৩৪৭ শহীদ সালাম বরকত হল, জাহাঙ্গীরনগর বিশ্ববিদ্যালয়, সাভার, ঢাকা থেকে প্রকাশিত।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;আদিবাসী দশক শেষ হইল&lt;br /&gt;বাঙালির সংবিধান বাঙালিরই রইল&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;পাভেল পার্থ&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;…......................................................&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;বাংলাদেশের নাগরিকগণ বাঙ্গালী বলিয়া পরিচিত হইবেন&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;(গণপ্রজাতন্ত্রী বাংলাদেশের সংবিধান, ৬নং অনুচ্ছেদ, ১৯৭২)&lt;br /&gt;………………………………………………...........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা কখনো বলিনি, এই জনপদের মালিক আমরা।&lt;br /&gt;এই মাটির মালিক আমরা। এই জলধারা সমূহের মালিক আমরা। এই পাহাড় জঙ্গলের মালিক আমরা। বীজ শস্য, উঁইঢিবি, মানুষ, পাখি, মাছ বা জানোয়ারের মালিক আমরা। আমরা কখনো তো মালিকানা দাবি করিনি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;কিইবা এমন বিনিয়োগ আছে আমাদের ?&lt;br /&gt;কেনইবা আমরা খরিদ করে ফেলবো আস্ত দুনিয়া ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা কেবল জানি ও মানি এ দুনিয়ার মালিক আমরা মানুষেরা নই। আমরা কখনোই জল, পাথর, জঙ্গল, প্রাণবৈচিত্র্য বিক্রি করার কোনো চিন্তাই করিনি। কিন্তু মানুষেরাই যারা কখনোই আমাদের লগে আমাদের গ্রাম, পাড়া, আদাম, পুঞ্জি, কামি, সঙ, টিলা, জঙ্গলে বেড়ে ওঠেনি তারাই ছড়ার জল থেকে, নদীর বুক থেকে খুঁড়ে তুললো বালির ঢিবি। পিআইন নদীর শরীর কেটে কেটে তুললো পাথরের চাঁই। তারা মাধবকুন্ডের আমডেবিটের জল বোতলে বোতলে ভরে বিক্রি করল। তারা জঙ্গলের পর জঙ্গল কেটে চা বাগান আর রাবার বাগান করল। বলসাল ব্রিং হত্যা করে একাশিয়া, ম্যাঞ্জিয়াম গাছ লাগাল। আমরা কেবল এইসব খুন-জখমের প্রতিবাদ করেছিলাম।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা জানি জঙ্গল আমাদের মা।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৮৭২-৭৩ এ যখন মানুষেরা এসে টেনে টেনে খাবলে খাবলে আমাদের মায়ের শরীর থেকে সব পশম আর চামড়া তুলে সেগুন গাছ লাগাল, আমরা কেবল আমাদের মাকে বাঁচাতে চেয়েছিলাম। আমরা তো মায়ের শরীরে একটা কোপও দেইনি মায়ের অনুমতি ছাড়া। হারাছুড়ি, বান্দরবান, রাঙামাত্ত্যাতে যখন আমরা ত্রিপুরারা হউক করতাম, আগে আমরা বুরাসার ধারে অনুমতি চাইতাম; আমরা চাঙমারা জুম করার আগে মাইলুংমার ধারে অনুমতি চাইতাম; আর আমরা যারা ম্রাইনমা, আমরা ইয়ার জন্য অনুমতি চাইতাম বুমিনের ধারে; মান্দিরা হাবাহুছাআর জন্য মিসি সালজং এর ধারে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;কিন্তু আমাদেরকে বলা হয় জুম চাষ পরিবেশ নষ্ট করে। বলা হল এইসব আদিম প্রথা ছেড়ে আমাদেরকে আধুনিক হতে হবে। আধুনিকতা মানে কি তা কখনোই আমাদের জানা ছিল না। জুম নিয়ন্ত্রণের জন্য রাষ্ট্রের নীতি বা জুম নিয়ন্ত্রণ বোর্ডের বিরুদ্ধে তো আমরা যাইনি কখনো, আমরা তো কখনোই প্রশ্ন তুলিনি জুমও তো একদল মানুষের আপন চাষবাস একে কেন বন্ধ করা হবে? রাতারাতি আমাদের পার্বত্য চট্রগ্রামের পাহাড় গুলো সাফ করে জলপাই রঙের পোশাক পড়ে বন্দুক নিয়ে মানুষেরা এল। এককালে দল বেঁধে আসা ভিনদেশী ধলা চামড়াদের কথাবার্তা আমরা বুঝতামনা, ধলা চামড়ারা যেভাবে বলত আমরা কেবল তাদের ক্যামেরার দিকে ভয়ে তাকিয়ে থাকতাম, আর এখন বন্দুকের দিকে আমাদের তাকিয়ে থাকতে হয়। উন্নয়নের কথা বলে আমাদের হর্নফুলি গাঙে কাপ্তাই বাঁধ দেয়া হল। ভেসে গেল আমাদের জুম, বসত আর জীবন। আমরা ডুবে যাওয়া মাওরুম আদাম থেকে পাহাড় পেড়িয়ে পাহাড় কোথাও জায়গা পেলামনা।&lt;br /&gt;হয়তোবা বনবিভাগ জঙ্গলকে বাঁচাতে চায়, আর তাই আমাদের নামে বন মামলা দেয়। আমরা তো আবার সংরক্ষণ,পরিবেশ, উন্নয়ন এইসব বিষয় বুঝি না। আমরা কেবল জানি যে জঙ্গল-মাটি-জল আমাদের মা। আমরা মাকে খুন করি না, আমরা মাকে বিক্রি করি না, আমরা মাকে দখলও করি না, রক্ষাও করি না। আমরা মাকে বিপন্ন না করে তার লগে বড় হতে শিখি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা হাজং, মান্দিরা সুসং দূর্গাপুরে রাজার চোখ রাঙানিতে হাতি ধরে দিইনি বলে রাজা অবাধ্য হয়ে গিয়েছিলাম। আমরা জানি জানোয়ার-পতঙ্গ-পাখি-মাছ গুলো আমাদেরই ভাই-বোন, আমরা সবাই একই দুনিয়ার মায়ের পেটে জন্ম নিয়েছি। নিজের ভাইকে, নিজের বোনকে কী কেউ রাজার হাতে তুলে দেয়??? রাজাতো সেই হাতিকে কেটে কেটে টুকরা করে সিমসাং এর জলে ভাসিয়ে দিত কেবলমাত্র দাঁতগুলোর জন্য। আমরা বোন ভাইয়ের হত্যার প্রতিবাদে তাই রাজা অবাধ্য হয়ে গিয়েছিলাম। এখনও আমাদের শেরপুর আর জামালপুরের কোচ-মান্দি গ্রামে হাতিরা এসে ফসলের জমি, বসতভিটা তছনছ করে যায়, আমরা এখনো রাজা অবাধ্যই আছি!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা ভেবেছিলাম বনবিভাগ জঙ্গলকে বুঝবে।&lt;br /&gt;বৃক্ষ, লতা, গুল্ম, প্রাণবৈচিত্র্যের হা- হা-কা-র শুনবে।&lt;br /&gt;যখন বনবিভাগের মানুষেরা মেনকীফান্দার পাহাড়ে বলসাল ব্রিং সব মুথা সহ তুলে ইটের ভাঁটায় দিল আমরা মেনকীফান্দার পাহাড়ে মায়ের লগে আগলে থাকার জন্য জীবনবাজি রেখে দাঁড়িয়েছিলাম।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;সর্বশক্তিমান আল্লাহর উপর পূর্ণ আস্থা ও বিশ্বাস, জাতীয়তাবাদ, গণতন্ত্র ও সমাজতন্ত্র অথার্ৱ অর্থনৈতিক ও সামাজিক সুবিচার-এই নীতিসমূহ এবং তৱসহ এই নীতিসমূহ হইতে উদ্ভূত এই ভাগে বর্ণিত অন্য সকল নীতি রাষ্ট্র পরিচালনার মূলনীতি বলিয়া পরিগণিত হইবে। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;(গণপ্রজাতন্ত্রী বাংলাদেশের সংবিধান, ২য় ঘোষণাপত্র আদেশ নং-৪, সংযোজিত ১ক দফা, ১৯৭৮)&lt;br /&gt;...........................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা কখনোই আমাদের বুরাসা, মিসি সালজং, সুসিমি, চিগা, তাতারা রাবুগা, বুমিনে, গয়েরা, অসামোতাই, ইয়ালারাম, দুকুমগুনি, খাঙখাঙি, চরবুড়ি, বাস্তু, লিনাসা, মিনাসা, উব্লাই নাংথউ, ধরম করম, বাগবাদের কথা তুলিনি। আমরা জানি আল্লাহ, ঈশ্বর, ভগবানদের লগে আমাদের দুর্বল বিশ্বাস গুলো কখনোই দাঁড়াতে পারে না।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমাদেরতো কোনো পুস্তক নাই!&lt;br /&gt;আমাদের আবার কিসের ডাঁট, কিসের চাউনি!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;সাংসারেক, জন্টিল, ছোনং বা ক্রামা তো কেবলি আমাদের বিশ্বাস ছিল, আমরা মানি আরো না জানি কত কত বিশ্বাস এই দুনিয়ায় আছে। তারবাদেও আমরা আমাদের বিশ্বাসগুলোকে চালু রাখার জন্য, নিদেনপক্ষে লুকিয়ে রাখার জন্যও একটুকরা জংলা, পাথর বা জায়গা পেলাম না এই দুনিয়ায়। যখন দেখি ঈদ, দূর্গাপূজা, বৌদ্ধ পূর্ণিমা বা বড়দিনের জন্য সব ছুটি থাকে আমরা কিছুই ভাবি না। আমরা কখনোই ওয়ান্না, বৈসুক, বিজু, সাংগ্রাই, গরাইয়া, পুষরা, করম, কামাখ্যা, বাহা, গালমাকদুআর জন্য কোনো ছুটি দাবি করিনি।&lt;br /&gt;আমরা নিশ্চয়ই এমন আহামরি কিছু হয়ে যাইনি যে চাইলাম আর পাইলাম।&lt;br /&gt;আর কিইবা এমন উৎসব আমাদের।&lt;br /&gt;আমরা বড়জোড় না হয় একটু নাচগান করবো আর মদ খাবো।&lt;br /&gt;.................................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;প্রজাতন্ত্রের রাষ্ট্রধর্ম ইসলাম, তবে অন্যান্য ধর্মো প্রজাতন্ত্রে শান্তিতে পালন করা যাইবে।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;( গণপ্রজাতন্ত্রী বাংলাদেশের সংবিধান, অষ্টম সংশোধনী, ২নং অনুচ্ছেদে ২ক নামে সংযোজিত দফা, ১৯৮৮ )&lt;br /&gt;...................................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা কখনোই কোনো শান্তির কথা বলিনি।&lt;br /&gt;আমরা জানি না যখন ব্যাঙের ঠ্যাং বস্তায় ভরে ভরে মানুষেরা বিক্রি করে, যখন বলসাল ব্রিং থেকে জংলা আলু পাচার হয়ে যায়, যখন একাশিয়া আর রাবার বাগানে একবিন্দু জলও খুঁজে পায়না কেঁচো বা গুইসাপ তখন মানুষ কি করে শান্তিতে থাকে।&lt;br /&gt;আমরা যখন চা বাগানে কাজ করি, সাহেব বাবুদের ঘুম যদি ভেঙে যায় আমরা মাদলেও জোড়ে বোল দিই না।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;চা বাগানে কেন গিরমিট আইন চালু থাকে এসব নিয়েও আমাদের কোনো প্রশ্ন নাই।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা কেবল ভাবতেও পারিনি আমাদের মায়ের শরীর টুকরা টুকরা করে বস্তায় ভরে বিক্রি করবে মানুষেরাই; পাহাড়ের নাম, মায়ের নাম যাদের কাছে কেবলমাত্র চীনামাটি-সাদামাটি।&lt;br /&gt;...............................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;সকলক্ষেত্রে উপজাতি শব্দটি বলবত থাকবে&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;(১নং শর্ত,পার্বত্য চুক্তি ২ ডিসেম্বর ১৯৯৭)&lt;br /&gt;................................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা এইসব শব্দ-ফিরিস্তি আর বাতচিৎ গুলার মর্মও বুঝি না। উপজাতি,পাহাড়ি,আদিবাসী,সংখ্যালঘু জাতিসত্ত্বা,নৃ-গোষ্ঠী,ভূমিজ, ক্ষুদ্রজাতি,ট্রাইবাল,ইন্ডিজিনাস পিপল-এইসব পরিচয়ে আমাদের এমন কিইবা যায় আসে?&lt;br /&gt;বলা হয়ে থাকে যে, সারা দুনিয়ায় ৭০টিরও বেশী দেশে পাঁচহাজার জাতির ৩০কোটি এমন মানুষেরা বাস করেন, যারা আমাদের মতনই দুনিয়াকে কেনাবেচা করতে চান না আর নিজেদেরকে মালিক হিসেবে জাহির করেন না। জানা যায় আমরা অনেক আদিম, কুসংস্কারাচ্ছন্ন, সেকেলে, বন্য, অসভ্য,উপজাতি,জংলী,আদিবাসী বলে সারা দুনিয়ার ডাকসাইটে দরদী মানুষেরা আমাদের উন্নত আর আধুনিক করতে চায়। মহামান্য জাতিসংঘও আমাদের তরে আকুল। জাতিসংঘ ১৯৯৩ সালকে আর্ন্তজাতিক আদিবাসী বর্ষ, প্রতিবছর ৯ আগস্ট কে আর্ন্তজাতিক আদিবাসী দিবস আর ১৯৯৫-২০০৪ সালকে আর্ন্তজাতিক আদিবাসী দশক ঘোষণা করে। আদিবাসী দশকের মূল চিন্তা নাকি ছিল : Indigenous people: Partnership in action .&lt;br /&gt;এ দশকের কর্মসূচীর ভেতর ছিল:&lt;br /&gt;· ১৯৯০ দশকের প্রথমদিকে অনুষ্ঠিত আর্ন্তজাতিক সম্মেলনে গৃহীত আদিবাসী সংক্রান্ত সুপারিশমালার বাস্তবায়ন;&lt;br /&gt;· জাতিসংঘ সিস্টেমের ভিতরে আদিবাসীদের জন্য একটি স্থায়ী ফোরাম গঠন করা;&lt;br /&gt;· আদিবাসী অধিকার বিষয়ক ঘোষণাপত্রের সমাপ্তকরন ও গৃহীত করন;&lt;br /&gt;· জাতিসংঘ সিস্টেম, মানবাধিকার ও আদিবাসী অধিকার ইত্যাদি সর্ম্পকেজানার জন্যে জাতিসংঘ আদিবাসী ফেলোশিপ প্রোগ্রাম চালুকরন;&lt;br /&gt;· আদিবাসী মানুষের অবস্থা, সংস্কৃতি, ভাষা, অধিকার, এবং আশা আকাংখা ইত্যাদি সর্ম্পকে আদিবাসী ও অ- আদিবাসীদের শিক্ষা দেয়া;&lt;br /&gt;· আদিবাসী জনগোষ্ঠী লাভবান হয় এমন উন্নয়নমূলক কার্যক্রম হাতে নেয়ার জন্যে জাতিসংঘ সিস্টেম কর্তৃক বিশেষ দৃষ্টি প্রদান করা;&lt;br /&gt;· আদিবাসীদের অধিকার সংরক্ষণ করা এবং তাদের ক্ষমতায়ন করা যাতে করে তারা তাদের রাজনৈতিক, অর্থনৈতিক ও সামাজিক জীবনে&lt;br /&gt;পূর্ণ মর্যাদার সাথে নিজস্ব সাংস্কৃতিক মূল্যবোধ, ভাষা, ঐতিহ্য এবং সামাজিক সংগঠন সহ সাংস্কৃতিক পরিচয় ধরে রাখতে পারে;&lt;br /&gt;· বিশ্বব্যাপী প্রতিবছর ৯ই আগষ্টে আর্ন্তজাতিক আদিবাসী দিবস পালন করা;&lt;br /&gt;· পর্যাপ্ত স্টাফ ও রির্সোস সম্বলিত আদিবাসীদের উপর জাতিসংঘ ইউনিট স্থাপন করা এবং এ দশকের কার্যবলী সম্পাদনে সহযোগিতা&lt;br /&gt;প্রদানের জন্যে দক্ষতাসম্পন্ন আদিবাসী ব্যক্তিদের নিয়োগ করা।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;যদিও আমরা কোনো অংশীদারিত্ব নিয়ে কোনো প্রশ্ন তুলিনি, কিন্তু আমরা জানি অ্যাকশন মানে কি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;অ্যাকশন মানে উন্নয়ন।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;উন্নয়ন মানে আমাদের বসত-জুম সহ নিরন্তর উচ্ছেদ, জঙ্গল বিনাশ, বাঁধ দিয়ে গ্রাম-জংলা ডুবিয়ে দেয়া, পর্যটন আর গবেষণার নামে আমাদের জীবন আর প্রাণবৈচিত্র্যের চুরি বিক্রি আর দখল, তেল আর গ্যাস কোম্পানির হরহামেশা লুটপাট-দখল আর জখম, বনায়নের নামে জীবন ও প্রকৃতি লুট।&lt;br /&gt;আমরা তো এই দুনিয়ার কাছে কখনো কোনো অংশীদারিত্ব, কোনো অ্যাকশন দাবি করিনি । আমরা তো কোনো উন্নয়নের দাবি তুলিনি। জানি, তারবাদেও এই বাংলাদেশে সারা দুনিয়ার মতনই আমরা নিপীড়িত হবো, বিপন্ন হবে আমাদের মা, মানে আমাদের সকলের প্রাণবৈচিত্র্য। কিন্তু প্রশ্নসাপেক্ষ হলেও রাষ্ট্রীয়ভাবে এই রাষ্ট্রে কখনোই ৯ আগস্ট আদিবাসী দিবস পালিত হবে না। আমরা তো সেরকম দাবি তুলে রাষ্ট্রকে ঘাবড়েও দিতে চাই না। আমরা জানি আমরা কখনোই এই রাষ্ট্রে আমাদের আপন হিসাবে আমাদের কোনো হিসাবপত্তর, ইতিহাস জানতে পারবোনা কখনোই।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;বাংলাদেশে উপজাতীয় জনসংখ্যা ১২০৫৯৭৮ জন&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;(আদমশুমারি রিপোর্ট, ১৯৯১, বাংলাদেশ)&lt;br /&gt;......................................................................................................................&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;আমাদের মনোরঞ্জনের জন্য, আমাদের ঐতিহ্য, ইতিহাস, সংস্কৃতি যাতে হারিয়ে না যায় তার জন্য রাষ্ট্রের এতো দরদে আমাদের লজ্জায় মাথা নত হয়ে যায়। আমরা এমন কি মানুষ যে আমাদের জন্য এতোসব!&lt;br /&gt;রাঙামাত্ত্যা, হারাছুড়ি, রাজশাহী, বিরিশিরি উপজাতীয় সাংস্কৃতিক একাডেমী ইনস্ট্যুট গুলো দেখে আমরা লজ্জায় কোথায় যে লুকাই।&lt;br /&gt;ধরনীও আর আমাদের ডাকে মাটিতে চির ধরায় না।&lt;br /&gt;এইসব এতো আয়োজন, এতো অর্থ খরচ আমাদের জন্য করার এমন কি দরকার!&lt;br /&gt;এইসব কাজকারবার নিয়ে আমরা কোনো প্রশ্ন তুলি না, আমরা কখনোই বলিনি ওইসব দালানকোঠা আমাদের অপরিচিত; আমরা জানি টংগা, মোনঘর, বুরাং, নকমান্দি এসব ঘরদোর এই ভদ্দর সমাজে চলে না।&lt;br /&gt;আর ওইসব দালানকোঠার বই-পুস্তকে কি সব লিখা হয় আমরা জানার সাহসও করি না।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা তো এই রাষ্ট্রের কাছে কখনোই প্রশ্ন তুলিনি, কেন আমাদের উপজাতি বলা হয়?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা তো কখনোই প্রশ্ন তুলিনি কেন আমাদের মান্দি না বলে গারো, শো না বলে খিয়াং, লাইমি না বলে বম/বনযোগী, ম্রো না বলে মুরং, ম্রাইনমা না বলে মারমা, জৈন্তিয়া না বলে হিন্দু খাসিয়া, ত্রিপুরী না বলে টিপরা, লালং না বলে পাত্র বলা হয়?&lt;br /&gt;মানুষের এইসব পরিচয়ে কিইবা এমন যায় আসে। আমরা জানি আমাদের এই দুনিয়ার সব মানুষের রক্তই লাল।&lt;br /&gt;আমরা কখনোই চেঙ্গী, হর্ণফুলি, কংস, মাতামুহ্‌রী, সিমসাং নদী থেকে বুড়িগঙ্গা, ব্রহ্মপুত্র, মেঘনা, যমুনা, করতোয়া, চিত্রা, সুরমা, মনুকে আলাদা করে দেখিনি।&lt;br /&gt;পেগামারি, লোগাং, লংগদু, নানিয়ারচর গণহত্যায় আমাদের অস্তিত্ব যেমন ডুকরে ওঠে একইভাবেই আমরা ডুকরে ওঠি কালিগঞ্জে চিংড়ি ঘেরে, ঘুঘুদহ বিলে, নারায়ণগঞ্জে গার্মেন্টসে, রাষ্ট্রের নিরাপত্তা হেফাজতে যখন মানুষ খুন হয়।&lt;br /&gt;গজনীতে অবকাশ কেন্দ্রের নামে আমাদের কোচ, হাজং, মান্দি বসত উচ্ছেদ নয়, জঙ্গলের দিগ্গিলেগ্গ্যে ছড়াটির জন্য আমাদের মায়া হয়; আমাদের একই মায়া যখন হাকালুকি হাওড়ে বিষ দিয়ে পাখি মেরে ফেলা হয়, বাঁধ দিয়ে বিল ডাকাতিয়াকে যখন খুন করা হয়।&lt;br /&gt;জুমবসত থেকে আমাদের উচ্ছেদ হতে হবে বলে নয়, আমাদের মা আমাদের জঙ্গল আর মাধবকুন্ড-মুরইছড়াকে বনবিভাগ ইকোপার্কের নামে খাবলে খাবলে বদলে দিতে চাইছিল বলেই আমরা মাকে বাঁচাতে জঙ্গলকে বেড় দিয়েছিলাম। বনবিভাগ আমাদের দিকে বন্দুক তাক করে থাকে।&lt;br /&gt;বনবিভাগও নাকি জঙ্গল বাঁচাতে চায়!&lt;br /&gt;আমাদের সকল খাসিয়া জনপদ দখল আর উচ্ছেদ হয়ে গেলেও আমরা কিছু বলিনা। আমরা জানি আমরা রাশিমনি হাজং, আমরা বসন্ত বুনারজী, কম্পরাম সিং, বিহেন নকরেক, নিন্তনাথ হাদিমা, লেবিনা হাউই, স্মৃতি রিছিল, আলফ্রেড সরেন, কল্পনা চাকমা, সেন্টু নকরেক, গীতিদা রেমা, অধীর দফো, অবিনাশ মুড়া, লীলাবতী সিংহ, পীরেন স্নাল।&lt;br /&gt;আমরা জানি, আমরা যতদিন টিকে আছি আমাদেরকে নিরন্তর খুন, জখম আর উচ্ছেদ হতে হবে বারবার এই দুনিয়ার জুম-জমিন-ভূমি-জঙ্গল আর প্রাণবৈচিত্র্যের আপন অধিকারের লাগি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;..........................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;প্রজাতন্ত্রের রাষ্ট্রভাষা বাংলা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;(গণপ্রজাতন্ত্রী বাংলাদেশের সংবিধান, প্রথমভাগ, ৩নং অনুচ্ছেদ, ২০০০ সালের ৩১ ডিসেম্বর সংশোধিত)&lt;br /&gt;..........................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা কখনোই আ.চিক, চাঙমা, সাঁওতালী, ককবরক, খাসিয়া, লালং, কোচ, খাড়িয়া, বিষ্ণুপুরিয়া ঠার, হাজং, লাইমি ভাষার কথা বলি না।&lt;br /&gt;আমরা কি কখনো দাবি তুলেছি আমরা সবাই আমাদের আপন ভাষায় বাড়তে ও বাঁচতে চাই। কিংবা আমরা যদি বলি আমরা আমাদের মায়ের ভাষায় পড়তে চাই, এটা কি আমাদের রাষ্ট্রের পক্ষে কখনোই চালু রাখা সম্ভব ?&lt;br /&gt;আমরা এমন বেকায়দায় কাউকে ফেলতে চাই না কখনোই।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমাদের এমন কি ভাষা আর অক্ষর-হরফ আছে যে আমরা দুনিয়াকে উল্টেপাল্টে দেখতে পারি!!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা কখনোই দিগ্গিবান্দির প্রসঙ্গ তুলতে চাই না, রেরে, গেংখুলী, আজিয়া, শেরানজিং পালা, দূর্গাপালা, রাধামন ধনপুদি, রাসলীলানুসরন, ঝুমুর এইসব কি আর এমন আহামরি আয়োজন যে আমরা জাহির আর হাজির করবো।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;................................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;যে কোন বহুজাতিক কোম্পানি যে কোনো শস্য, ফসল, উদ্ভিদ, প্রাণীকে এবং মানুষের জ্ঞান ও অনুশীলন পেটেন্ট, দখল, চুরি করতে পারবে এবং একচেটিয়া ব্যবসা করতে পারবে&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;২৭.৩(খ) ধারা, বাণিজ্য সংক্রান্ত মেধাসত্ব চুক্তি(ট্রিপস)&lt;br /&gt;................................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমরা তো আর এতো খোঁজখবর রাখি না যে কে কার জ্ঞান, কে কার সম্পদ চুরি করল। আমরা তো কখনোই ভাবিনি জ্ঞানের কোনো একক মালিকানা হয়। আমরা তো জানি আমাদের আপন জ্ঞান আমাদের সমাজে আপন কায়দায় সামাজিক ভাবে গড়ে ওঠে। আমাদের সমাজে ওঝা, বৈদ্য, কবিরাজ, মেইবা, গুনীন, মেইপা, খোদনী, অচাই, অসাই, কামাল, সেমাকামাল, দেবর্ষি এরা এমন কিইবা চিকিৎসা জ্ঞান রাখেন আর গাছগাছরা চেনেন যে তাদের জ্ঞান চুরি করা ঠেকাতে আমরা হুলুস্থুল কান্ড ঘটাবো।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আর, মানুষ কেন মানুষের জ্ঞানই চুরি করবে ?&lt;br /&gt;মানুষ কেন মানুষের জ্ঞানই বিক্রি করবে আমরা বুঝি না।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আমাদের নারীরা যখন পিনন, খাদি, পাচাতি, ইনাফি, দকমান্দা, গান্দা, পাথিন বানাবার রঙ ও তুলা আর আশেপাশে খুঁজে পান না তখনও আমরা এই হাহাকার আর বিপন্নতা কাউকে বুঝতে দিই না।&lt;br /&gt;খবরক, গ্যাল্লং, দেমব্রা জাগেদং, মিমিদ্দিম, মিমামিশি, চাপলি মাই, বিনি সহ অগণিত জুম ধান ও শস্য ফসলের বৈচিত্র্য হারানোর জ্বালা আমরা ঢেকে রাখি নিরন্তর।&lt;br /&gt;জুম-জংগলে আমাদের আলু তোলা, জংলিশাক, অষুধের গাছ সংগ্রহ বা শিকার করার অধিকার হারানোর কথা আমরা এই দুনিয়ায় কাউকে বলিনি কখনো।&lt;br /&gt;................................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;রাষ্ট্র জনগণের সাংস্কৃতিক ঐতিহ্য ও উত্তরাধিকার রক্ষণের জন্য ব্যবস্থা গ্রহণ করিবেন এবং জাতীয় ভাষা, সাহিত্য ও শিল্পকলাসমূহের এমন পরিপোষণ ও উন্নয়নের ব্যবস্থা গ্রহণ করিবেন, যাহাতে সর্বস্তরের জনগণ জাতীয় সংস্কৃতির সমৃদ্ধিতে অবদান রাখিবার ও অংশগ্রহণ করিবার সুযোগ লাভ করিতে পারেন।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;(গণপ্রজাতন্ত্রী বাংলাদেশের সংবিধান, অনুচ্ছেদ ২৩, ২০০০সালের ৩১ ডিসেম্বর সংশোধিত)&lt;br /&gt;.................................................................................................................................&lt;br /&gt;আমরা কখনোই ভাবিনি হারমোনিয়াম, তবলা, গীটার আর কীবোর্ডের দুনিয়ায় গঙগেন্দা, দামা, খ্রাম, নাথুকও কোনো বাদ্যযন্ত্র।&lt;br /&gt;আমরা তো, কেন সবখানেতে নাপ্পি, ওয়াকখারি, লেবাহাক, দোচুয়ানি, চু, লাঙ্গি, বিখাশাম, সুঞ্জি, চিডৌ, মেওয়া পাওয়া যায়না এই নিয়ে কোনো প্রশ্ন তুলিনি কখনো।&lt;br /&gt;আমরা জানি তারবাদেও এই রাষ্ট্র, এই রাষ্ট্রের প্রধান জনগোষ্ঠী বাঙালীরা আমাদের জন্য কতই না চিন্তিত, কতই না উদগ্রীব।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ইকোপার্কের নামে এই রাষ্ট্র আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;বিদিশি আগ্রাসী গাছ দিয়ে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;চিড়িয়াখানা বানিয়ে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;বনায়নের নামে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;বাঁধ দিয়ে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;ক্যামেরা দিয়ে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;ব্যাটাগিরি দিয়ে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;যাদুঘর বানিয়ে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;উন্নয়নের নামে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;দলিল দস্তাবেজের মাতম তুলে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;আর এই রাষ্ট্র নিরন্তর তার পবিত্র সংবিধান দিয়ে আমাদের ধরে রাখতে চায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;হে মহান রাষ্ট্র, আমরা কখনোই রাষ্ট্রের সংবিধানের পবিত্রতা নিয়ে কোনো প্রশ্ন তুলিনি, তুলবোও না কোনোদিন। আমরা কেবল এই জানি যে, সকল প্রাণসত্তা আর মানুষের জন্য সমমর্যাদা ও সমঅধিকারের সংবিধানকেই পবিত্র বলে। ধরে রাখার অপর নাম যেখানে বন্দী করা বা নিপীড়ন নয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...............................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;বাংলাদেশের ভাষাঃ ‘বাংলা’ ভিন্ন অন্যান্য ভাষার কথা&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;জুয়েল বিন জহির&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ভাষা মানব সভ্যতার বিবর্তনের এক অতি গুরুত্বপূর্ণ নিয়ামক। মানুষের বাগযন্ত্র কর্তৃক উৎসারিত ধ্বণি অর্থময়তা লাভের মাধ্যমে সৃষ্টি করেছে ভাষার। ধ্বণির অর্থময়তা স্থান, কাল, জাতিভেদে বিভিন্ন হতে পারে। আর ধ্বণির এই বহুমাত্রিক অর্থময়তাই পৃথিবীর বিভিন্ন স্থানে বিভিন্ন জাতিগোষ্ঠীর ভেতরে সৃষ্টি করেছে বিভিন্ন ভাষার। ভাষাভিত্তিক ঐক্যকে কাজে লাগিয়েই নিজস্ব যুগবাহিত সামাজিক, সাংস্কৃতিক, রাজনৈতিক, লোকায়ত জ্ঞানের আদান-প্রদানের মাধ্যমে কোন জনগোষ্ঠি গড়ে তোলে নিজস্ব স্বাজাত্যবোধ, স্বাতন্ত্রতাবোধের। নিজ ভাষার মাধ্যমেই কোন জাতিসত্তার মধ্যকার সংস্কৃতিগত বিভিন্ন উপাদানগুলি তার আপন লয়ে প্রকাশিত, বিকশিত, ও সঞ্চালিত হয় যুগযুগান্ত ধরে নানান পরিবর্তন-পরিবর্ধন-পরিমার্জনের মধ্য দিয়ে। ছাপ্পান্ন হাজার বর্গমাইলের রাজনৈতিক সীমানার পৃথিবীর বৃহত্তম ব-দ্বীপ বাংলাদেশের রাষ্ট্রীয় ভাষা বাংলা। রক্তাক্ত সংগ্রামের পথ ধরে অর্জিত এই বাংলা ভাষার স্বীকৃতি আজ বিশ্বব্যাপী। বাঙালি জাতির গৌরবের একুশে ফেব্রুয়ারি আজ পৃথিবীব্যাপী আন্তর্জাতিক মাতৃভাষা দিবস হিসাবে মর্যাদা লাভ করেছে। বাংলাদেশের ১৪ কোটি মানুষের মধ্যে সংখ্যাগরিষ্ঠ অংশের মাতৃভাষা হল বাংলা; বাকি প্রায় ত্রিশ লক্ষ মানুষের মাতৃভাষায় রয়েছে ব্যাপক বৈচিত্র্যতা। এই ত্রিশ লক্ষ মানুষ প্রায় ৪৫টি পৃথক পৃথক জাতিসত্ত্বায় বিভক্ত। তাদের শারীরিক ও মানসিক গড়ন, সামাজিক, ও সাংস্কৃতিক স্বাতন্ত্রতা বৃহত্তর বাঙালি জাতির জীবন-সংস্কৃতি থেকে সহজেই আলাদা করা যায়। এই ৪৫টি জাতিসত্ত্বাই আবার নিজেদের মধ্যে ভাষা, সমাজ-সংস্কৃতিতে একে অন্যের থেকে পৃথক এবং স্বাতন্ত্রতার অধিকারী। এই জাতিসত্তা গুলির নিজ নিজ ভাষা রয়েছে, রয়েছে তাদের বর্ণাঢ্য লোক সাহিত্য, লোক সংস্কৃতি; যা বাংলাদেশের সংস্কৃতিকে করে তুলেছে অধিকতর সমৃদ্ধ ও বৈচিত্র্যময়। ভাষার সংখ্যাগত দিক বিবেচনায় ক্ষুদ্রায়তনের এই বাংলাদেশ নামক ব-দ্বীপটিকে ভাষার জীবন্ত জাদুঘর বলা যেতে পারে। বাংলাদেশে বসবাসরত বিভিন্ন জাতির ভাষা সমূহকে নিমো্নক্ত ভাবে শ্রেণীবদ্ধ করা যেতে পারে-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১. ভাষা পরিবার- অস্ট্রিক ভাষা সমূহ&lt;br /&gt;১.১. মোন-খমের শাখা- খাসিয়া&lt;br /&gt;১.২. মুন্ডারী শাখা- সাঁওতাল, মুন্ডা, সিং, বিন্‌ধ,হো ইত্যাদি।&lt;br /&gt;২. ভাষা পরিবার- টিবেটো-চীন&lt;br /&gt;২.১. বোডো শাখা- আচিক,ককবরক,হাজং,লালেং, পালিয়া ইত্যাদি।&lt;br /&gt;২.২. কুকি-চীন শাখা- মৈতৈ মণিপুরী, খুমি, লাইমি, কুকি, ম্রো, পাংখো, ইত্যাদি।&lt;br /&gt;২.৩. সাক্‌-লুই শাখা- চাক, থেক বা ঠেট বা থেক , লুসাই।&lt;br /&gt;২.৪. বার্মীজ শাখা- রাখাইন বা ম্রাইনমা&lt;br /&gt;৩. ভাষা পরিবার- দ্রাবিড় কুরুখ, পাহাড়িয়া, মাহালি ইত্যাদি।&lt;br /&gt;৪. ভাষা পরিবার -ইন্দো-এরিয়ান বাংলা, চাকমা, তন্‌চংগা, রাজবংশী, কোচ, মাহাতো, বসাক,বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী,&lt;br /&gt;বিহারী, ভূইমালি ইত্যাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;এবার বাংলাদেশে প্রচলিত বিভিন্ন ভাষা পরিবারের অন্তর্ভূক্ত কয়েকটি ভাষার সাধারণ পরিচয় তুলে ধরা যাক-&lt;br /&gt;১. ভাষা পরিবার- অস্ট্রিকঃ ভাষা তাত্ত্বিকদের দীর্ঘপরিশ্রম লব্ধ গবেষণায় যতদুর জানা গেছে বাংলার সর্বপ্রাচীন ভাষা ছিল অস্ট্রিক ভাষা পরিবারের ভাষা। ভারতবর্ষে প্রচলিত এই ভাষা পরিবারের অন্তর্ভূক্ত ভাষা সমূহ অস্ট্রো-এশিয়াটিক শাখা--র ভাষা বলে পরিচিত। বাংলাদেশে প্রচলিত অস্ট্রো-এশিয়াটিক ভাষা সমূহ আবার দুইটি শাখায় বিভক্ত-মোন-খমের ও মুন্ডারী ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.১ মোন-খমের শাখাঃ বর্তমানে পৃথিবীর প্রায় একশটিরও অধিক ভাষা মোন-খমের শাখা-র অন্তর্ভূক্ত। এই ভাষাগুলি পূর্ব ভারত থেকে ভিয়েতনাম এবং ইউনান (Yunnan) থেকে মালয়েশিয়া ও আন্দামান সাগরের নিকোবর দ্বীপপুঞ্জে ছড়িয়ে রয়েছে। বাংলাদেশে এই শাখার ভাষার মধ্যে রয়েছে খাসিয়া ভাষা।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.১.ক খাসিয়া ভাষাঃ বাংলাদেশের সিলেট অঞ্চলে বসবাসকারী মঙ্গোলয়েড খাসিয়া জাতির ভাষা বর্তমানে প্রায় ১২,২৮০ জন লোকের মুখে প্রচলিত। ভারতের মেঘালয় ও আসাম রাজ্য মিলিয়ে প্রায় দশ লক্ষ লোক খাসিয়া ভাষায় কথা বলে। খাসিয়া ভাষার সাথে বার্মার মোঁয়ে (Mon), পলং (Palng) ভাষার এবং উপমহাদেশের তালাং, খেড়, সুক, আনাম, খামেন, চোয়েম, ক্ষং, লেমেত, ওয়া প্রভৃতি জাতিসত্বা সমূহের ভাষার মিল দেখিয়েছেন বিভিন্ন ভাষাতাত্ত্বিকরা। খাসিয়া ভাষা মৌখিক ভাষা। এই ভাষার কোন নিজস্ব বর্ণমালা নেই। তবে খাসিয়াদের মধ্যে খ্রীষ্টীয় ধর্ম অনুপ্রবেশের পর এই ভাষার লিখিত রূপ দেওয়ার চেষ্টা করা হয়। ১৮১২ খ্রীষ্টাব্দে কৃষ্ণচন্দ্র পাল নামক একজন ধর্মযাজক সর্বপ্রথম বাংলা বর্ণমালায় ও খাসিয়া ভাষায় নিউ টেস্টামেন্ট বাইবেল অনুবাদ করেন। ১৮৩৮ সালের পরে ওয়েল্‌স মিশনারী দলের টমাস জোন্‌স রোমান হরফে খাসিয়া ভাষা লেখার প্রচলন করেন। টমাস জোন্‌স কে এ জন্য খাসিয়া বর্ণমালার জনক বলা হয়। তখন থেকে অদ্যাবধি খাসিয়া ভাষা রোমান হরফেই লেখা হয়। খাসিয়া ভাষার উপভাষা রয়েছে। এদের মধ্যে পাঁড়, লিংগাম, ওয়ার উল্লেখযোগ্য।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.২ মুন্ডারী শাখাঃ অধিকাংশ ভাষাতত্ত্ব্ববিদ মুন্ডারী শাখাকে অস্ট্রিক ভাষা গোষ্ঠীর মধ্যে বিবেচনা করলেও এর ভিন্ন মতও রয়েছে। Hevesy-i মতে এই Finno-Ugrian ভাষা গোষ্ঠীর কোন এক জাতি সুদূর অতীতে হয়ত ভারতবর্ষে চলে আসে এবং তাদের আনীত ভাষা পরবর্তীতে স্থানীয় অন্য কোন ভাষার প্রভাবে মুন্ডারী শাখার ভাষার সৃষ্টি করে। কিন্তু Finno-Ugrian ভাষা-ভাষীদের অতীতে ভারতবর্ষে আগমনের কোন হদিস এখনো পর্যন্ত পাওয়া যায়নি। তাই Hevesy-র মতামতকে নিশ্চিত বিবেচনায় না এনে আমাদের বাংলাদেশে প্রচলিত মুন্ডারী শাখার ভাষা সমূহের আলোচনা করা যাক-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.২.ক সাঁওতালী ভাষাঃ বাংলাদেশের উত্তরাঞ্চলের রাজশাহী, নওগাঁ, দিনাজপুর, বগুড়া, রংপুর, ঠাকুরগাঁ প্রভৃতি অঞ্চলে প্রায় দুই লক্ষের মত সাঁওতাল বসবাস করে। তবে ভারত ও বাংলাদেশ মিলিয়ে পৃথিবীতে প্রায় অর্ধকোটি লোক সাঁওতালী ভাষায় কথা বলে। ডঃ ক্ষুদিরাম বাংলা ভাষার শতকরা পঁয়তাল্লিশ এবং সংস্কৃত ভাষার শতকরা চল্লিশ ভাগ শব্দই সাঁওতালী ভাষাজাত বলে উল্লেখ করেছেন। হাজার হাজার বছর ধরে বংশপরম্পরায় মুখে মুখে প্রচলিত হয়ে আসা এই সাঁওতালী ভাষার কোন নিজস্ব বর্ণমালা নেই। তবে খ্রীষ্টান মিশনারীদের হাতে সর্বপ্রথম সাঁওতালী ভাষার লিখিত রূপ দেওয়া হয় রোমান হরফে। জানা যায়, ১৮৬৯ সালে ভারতের সাঁওতাল পরগনার লুথারিয়ান মিশনে স্থাপিত একটি ছাপাখানা থেকে সাঁওতাল ভাষার ব্যাকরণ ও অনেক বই প্রকাশিত হয়। পশ্চিমবঙ্গে রঘূনাথ মুর্মূ কর্তৃক ‘অলচিকি’ নামে সাঁওতালী বর্ণমালা তৈরী হয়েছিল এবং তার সরকারী স্বীকৃতিও মিলেছিল। তবে নানান কারনে তা টিকে থাকতে পারেনি। বাংলাদেশে জাতীয় আদিবাসী পরিষদের উদ্যোগে ১৯৯৯ সালের ২০শে মার্চ রাজশাহী জেলার দেওপাড়া ইউনিয়নের বর্ষাপাড়া গ্রামে সাঁওতালী ভাষা শিক্ষাদানের জন্য একটি প্রাথমিক বিদ্যালয় প্রতিষ্ঠা করা হয়। পরে সুন্দরপুর বিদ্যালয়, জয়কৃষ্ণপুর বিদ্যালয় এবং সোনাডাইং বিদ্যালয় নামে আরো তিনটি সাঁওতালী বিদ্যালয় প্রতিষ্ঠা করা হয়। বিদ্যালয় গুলোতে মূলতঃ বাংলা হরফেই সাঁওতালী ভাষা শিক্ষা দেওয়া হয়ে থাকে। কুরকু ও নাহিলি নামে সাঁওতালী ভাষার দুটি উপভাষা রয়েছে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.২.খ মুন্ডা ভাষাঃ বাংলাদেশের উত্তর ও দক্ষিণ পশ্চিমাঞ্চলে প্রায় ২১৩২ জন মুন্ডা বসবাস করে। মুন্ডাদের নিজস্ব ভাষা রয়েছে। প্রায় তিন-চার হাজার বছর আগে পিজিন ভাষা হিসেবে মুন্ডা ভাষার প্রচলন হয়েছিল। মুন্ডা ভাষার কোন নিজস্ব হরফ নেই। ওরাল লিটারেচারের মাধ্যমেই এই ভাষা প্রজন্ম থেকে প্রজন্মান্তরে টিকে আছে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.২.গ. বিন্‌ধ ভাষাঃ চাঁপাইনবাবগঞ্জ জেলার গোবরাতলা ইউনিয়নে বিন্‌ধ-দের বাস। অস্ট্রালয়েড এই বিন্‌ধ-রা মধ্য-পশ্চিম ভারতের বিন্ধ্য পার্বত্য অঞ্চলের একটি বিচ্ছিন্ন জনগোষ্ঠী। রিজলী ও ডাল্টন- এর মতে, বিন্‌ধ-রা ভারতের ছোট বিহার ও ছোটনাগপুর এলাকায় বসবাস করার সময় যে ভাষায় কথা বলত তা ছিল মুন্ডারী শাখার। তবে বর্তমানে বাংলাদেশে বসবাসরত বিন্‌ধ-রা বাংলা, হিন্দি, মিশ্রিত ভাষা ব্যবহার করে। তাদের নিজস্ব ভাষা বিলুপ্ত প্রায় বলা চলে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১.২.ঘ. সিং ভাষা ঃ সিরাজগঞ্জ, বগুড়া, ইশ্বরদী, রাজশাহী জেলার বিভিন্ন গ্রামে প্রায় ৪০০০ জনের অধিক সিং রয়েছে। সিং জাতি আবার তিনটি শাখায় বিভক্ত-রওতিয়া সিং, গন্‌জু সিং, ও ভূমিজ সিং। এই তিনটি শাখার লোকজনের মুখের ভাষায় পার্থক্য রয়েছে। গন্‌জু সিং-দের ভাষার সাথে সাদৃশ্য রয়েছে মাহাতোদের ভাষার সাথে। অন্যদিকে রওতিয়া সিং ও ভূমিজ সিং-দের ভাষায় কিছু পার্থক্য থাকলেও তা মোটামুটি একই ধরনের। সিং জাতি ভারতের রাঁচীতে থাকাকালীন যে সিং ভাষা ব্যবহার করত তা আর এখন অবিমিশ্র রূপে নেই ; বাংলা, হিন্দি, বিহারী ভাষার বিভিন্ন উপাদান ঢুকে এক মিশ্র ভাষার রূপ ধারন করেছে । সিং ভাষা-র কোন নিজস্ব বর্ণমালা নেই।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২. ভাষা পরিবার টিবেটো-চীনঃ ভাষাতাত্ত্বিকরা টিবেটো-চীন পরিবারের ভাষা সমূহের বিস্তৃতি মধ্য এশিয়া থেকে দক্ষিণে বার্মা এবং বালিষ্টান থেকে পিকিং পর্যন্ত পূর্ব গোলার্ধের এক বির্স্তীণ অঞ্চল পর্যন্ত বলে উল্লেখ করেছেন। এই টিবেটো-চীন ভাষা পরিবার দুটি ভাগে বিভক্ত- শ্যামীজ-চাইনীজ, এবং টিবেটো-বর্মণ। টিবেটো-বর্মণ আবার দুইটি ভাগে বিভক্ত- একটি টিবেটো-হিমালয়ান ও অপরটি আসাম-বার্মীজ। আসাম-বার্মীজ আবার কয়েকটি শাখায় বিভক্ত। যেমন- বোডো, নাগা, কুকী-চীন, কাচীন, বার্মীজ, সাক ইত্যাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.১ বোডো শাখাঃ আচিক, ককবরক, হাজং প্রভৃতি ভাষা সমূহ এই শাখার অর্ন্তভূক্ত।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.১.ক. আচিক ভাষাঃ বাংলাদেশের ময়মনসিংহ, মধুপুর, সিলেট অঞ্চলে প্রচুর পরিমানে মান্দি (গারো) -দের বসবাস। মাতৃতান্ত্রিক সমাজ ব্যবস্থার ধারক ও বাহক এই মান্দি জাতির স্বীকৃত ভাষার নাম ‌আচিক ভাষা’ মান্দিদের মোট ১৩টি গোত্রের মধ্যে বাংলাদেশে ৭টি গোত্রের অবস্থান রয়েছে। গোত্র ভেদে মান্দিদের আলাদা আলাদা উপভাষার অস্তিত্ব পাওয়া যায়। বর্তমানে আচিক ভাষার নিজস্ব কোন বর্ণমালা নেই। তবে অতীতে এদের বর্ণমালা ও পুস্তকাদি ছিল বলে এক লোককাহিনী প্রচলিত আছে। জন থুসিন রিছিল, ডানিয়েল আর রুরাম , মার্টিন রেমা, প্রদীপ সাংমা নামের চার গবেষক আলাদা আলাদা গবেষণার মাধ্যমে চার ধরনের বর্ণমালার উদ্ভাবন করেছেন। এগুলি নিয়ে এখনো পরীক্ষা-নিরীক্ষা চলছে। অদূর ভবিষ্যতে হয়ত মান্দিদের নিজস্ব সাহিত্য নিজস্ব বর্ণমালায় লিপিবদ্ধ সম্ভব হবে। তবে বর্তমানে রোমান এবং বাংলা হরফেই আচিক সাহিত্য লিপিবদ্ধ হচ্ছে। ভারতের মেঘালয় রাজ্যে বসবাসরত মান্দিরা আচিক ভাষাতেই পড়াশুনা ও সাহিত্য রচনা করে থাকে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.১.খ. ককবরক ভাষাঃ বাংলাদেশ ও ভারতের বিভিন্ন রাজ্যে বসবাসরত প্রায় ত্রিশলক্ষ ত্রিপুরা এই ককবরক ভাষা-য় কথা বলে। মধ্যযুগে ত্রিপুরা জনগোষ্ঠী শাসিত পূর্ববঙ্গের এক বিশাল এলাকায় ককবরক ভাষা (= মানুষের ভাষা) প্রচলিত ছিল। বাংলাদেশের পার্বত্য চট্রগ্রাম, চট্রগ্রাম, সিলেট ও কুমিল্লায় এই ককবরক ভাষাভাষীদের বসবাসরত দেখা যায়। মান্দিদের মতন গোত্র ভেদে এদেরও উপভাষা রয়েছে। ত্রিপুরা জাতি মোট ৩৬টি দফায় বা গোত্রে বিভক্ত। তবে বাংলাদেশে ১৬ টি গোত্রের ১৬টি উপভাষার সন্ধান পাওয়া যায়। অতীতে ককবরক ভাষার নিজস্ব হরফ ছিল বলে লোককাহিনী প্রচলিত রয়েছে। তবে বর্তমানে এর কোন অস্তিত্ব নেই। অনেক আগে থেকেই ভারতের ত্রিপুরা রাজ্যে ককবরক ভাষা বাংলা হরফেই লিখিত হয়ে আসছে। সেখানে ২০০০ সাল থেকে ককবরক ভাষায় মাধ্যমিক পরীক্ষা দেওয়ার ব্যবস্থা শুরু হলেও বাংলাদেশে এই ভাষার চর্চা প্রাতিষ্ঠানিক ভাবে শুরু হয়নি। তবে সামাজিক-ধর্মীয় উৎসব উপলক্ষে ককবরক ভাষার সাময়িকী সমূহ বাংলা হরফেই লেখা হয়। বর্তমানে কেউ কেউ রোমান হরফে ককবরক ভাষা চর্চার চেষ্টা করছেন। ককবরক ভাষার ব্যাকরণ অনেক পুরাতন। ধারনা করা হয় প্রায় একশ বছর পূর্বেই ককবরক ব্যাকরণ রচিত হয়েছিল।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.১.গ. হাজং ভাষাঃ বাংলাদেশে ময়মনসিংহের বিরিশিরি, শ্রীবর্দী, হালুয়াঘাট, নালিতাবাড়ী, সুসং দুর্গাপুর, কলমাকান্দা প্রভৃতি অঞ্চলে প্রায় ১২০০০ হাজং তাদের নিজস্ব হাজং ভাষায় কথা বলে। ডঃ গ্রিয়ারসন হাজং ভাষাকে টিবেটো-বর্মন ভাষা হিসেবে দেখালেও ঐতিহাসিক হ্যামিল্টন-এর মতে হাজং-দের ভাষা বাংলা। হাজং ভাষায় অহমীয় ও কাছারী ভাষারও যথেষ্ট মিশ্রন ঘটেছে। হাজংদের ভাষার কোন নিজস্ব লিপি নেই। তবে বর্তমানে বাংলা বর্ণমালার সাথে একধরনের সাংকেতিক চিহ্ন প্রয়োগের মাধ্যমে হাজং ভাষার লিখিত রূপ দেওয়ার ব্যাপারে পরীক্ষা-নিরীক্ষা চলছে বলে জানা যায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.১.ঘ . লালেংঃ বাংলাদেশের সিলেট সদর থানা ও গোয়ানঘাট থানাদ্বয়ের অন্তর্ভূক্ত ২২/২৩ গ্রামে প্রায় ৪০২ টি পরিবারের ২০৩৩ জন আদিবাসী পাত্র সমপ্রদায়ের বসবাস। পাত্র-রা নিজেদের ভাষার নাম লালেং বলে এবং নিজেদের লালং জাতি বলে পরিচয় দিয়ে থাকে।&lt;br /&gt;২.২. কুকি-চীন শাখাঃ&lt;br /&gt;এই শাখার ভাষা গুলোর মধ্যে বাংলাদেশে প্রচলিত আছে মৈতৈ মণিপুরী, লুসাই, লাইমি , খ্যাং, খুমি, কুকি, পাংখো ইত্যাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.২.ক. মৈতৈ বা মণিপুরী ভাষাঃ বাংলাদেশের সিলেট বিভাগের বিভিন্ন জেলায় মণিপুরী জাতির বসবাস। ভাষাগত দিক থেকে বৃহত্তর মণিপুরী জাতি দুই ভাগে বিভক্ত - মৈতৈ মণিপুরী ও বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী। মৈতৈ মণিপুরীদের ভাষা হল মৈতৈ ভাষা যা টিবেটো-চীন ভাষা পরিবারের কুকি-চীন শাখার অর্ন্তভূক্ত। আতোম্বাপু শর্মার মতে, মৈতৈ ভাষা প্রায় ৩৪০০ বছরের পুরনো একটি ভাষা। পূর্বে মণিপুরী ভাষার নিজস্ব হরফ ছিল। অধিকাংশের মতে মৈতৈ লিপি ব্রাহ্মী লিপি থেকে উদ্ভূত। ভারতের মণিপুর রাজ্যে এই লিপির প্রথম প্রচলন হয় মহারাজ পাংখংবা-র (৩৩-১৫৪ খ্রীঃ) আমলে। তখন মৈতৈ ভাষার বর্ণমালা ছিল মোট ১৮টি, পরবর্তীতে মহারাজ খাগেম্বা-র (১৫৯৬-১৬৫১ খ্রীঃ) শাসনামলে আরো ৯টি বর্ণযুক্ত হয়ে মোট বর্ণ সংখ্যা হয় ২৭টি। কিন্তু অষ্টম শতাব্দীর এক কপার প্লেটের উপর মৈতৈ বর্ণমালার প্রত্নতাত্ত্বিক নিদর্শন আবিষ্কার এটাই প্রমান করে যে মৈতৈ বর্ণমালার প্রচলন হয়েছিল মহারাজ পাংখংবা-র অনেক আগে থেকেই। মৈতৈ বর্ণমালার বয়স অনেক পুরোনো হলেও এই বর্ণমালায় রচিত কোন প্রাচীন পুস্তকের সন্ধান পাওয়া যায়নি। তবে ধারনা করা হয় যে দশম শতাব্দীতে সর্বপ্রথম মণিপুরী ভাষায় যে হাতে লেখা পুস্তক বের হয়েছিল তা ছিল বাংলা হরফের। মৈতৈ ভাষায় এবং বাংলা হরফে লিখিত দুটি প্রাচীনতম পুস্তক হল পুইরেইতন খুন্‌থক (poireiton khunthok) এবং নুমিত কাপ্পা (Numit kappa) অষ্টাদশ শতাব্দীতে রাজা গরীবে নেওয়াজ এর সময়ে বৈষ্ণব ধর্ম রাষ্টীয় স্বীকৃতির পর থেকে মৈতৈ মণিপুরী ভাষা বাংলা লিপিতেই নিয়মিত ভাবে লিখিত হয়ে আসছে। বর্তমানে হারিয়ে যাওয়া লিপি পুনরুদ্ধার ও তা নিয়ে সাহিত্য-সাময়িকী রচনার চেষ্টা করা হচ্ছে। মণিপুরী লিপির একটা বিশেষ বৈশিষ্ট্য হল যে, এগুলি মানুষের একেকটি অঙ্গপ্রত্যঙ্গের নামানুযায়ী নামাঙ্কিত। যেমনঃ বাংলাক এর মণিপুরী প্রতিবর্ণ কোক, যার অর্থ মাথা ইত্যাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.২.খ. খুমি ভাষাঃ প্রায় দেড় হাজারেরও অধিক খুমি বান্দরবান জেলায় এবং থান্‌চি উপজেলায় বসবাস করে থাকে। খুমি-দের নিজস্ব ভাষা রয়েছে। হাতে গোনা কয়েকজন বাদে খুমিদের প্রায় সবাই তাদের নিজস্ব ভাষা ব্যতীত অন্য ভাষায় কথা বলতে পারেন না।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.৩ সাক-লুই শাখাঃ&lt;br /&gt;২.৩.ক. চাক (Chak)t মঙ্গোলয়েড চাক-রা নিজেদেরকে পরিচয় দেয় আসাক্‌ (Asak) বলে। বর্মীরা চাকমা ও চাক উভয় জনগোষ্টীকেই সাক্‌ (Sak) বা থেক্‌ (Thak) বলে থাকে। তবে পার্বত্য চট্রগ্রামের দক্ষিণে বাইশারি, নাক্ষ্যংছড়ি, আলিখ্যং, কামিছড়া, কোয়াংঝিরি, ক্রোক্ষ্যং প্রভৃতি জায়গাতে প্রায় আড়াই হাজার চাক বাস করে যাদের ভাষা চাকমা ভাষার থেকে আলাদা। চাকমা ভাষা ইন্দো-আর্য ভাষা পরিবারের হলেও চাকদের ভাষা তিব্বতী-চীন পরিবারের। চাক বা আসাক্‌ (Asak) ভাষার সাথে উত্তর বার্মার কাডু (Kadu), গানান (Ganan) জনগোষ্ঠীর ভাষার মিল পাওয়া যায়। চাক ভাষার কোন বর্ণমালা নেই। তবে চাকদের লোক সংস্কৃতি বিভিন্ন লোকগাথাঁ, ধাঁধাঁ, লোকগীতি ইত্যাদি বেশ স্বয়ংসম্পূর্ন।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.৩.খ. ঠার বা থেক বা ঠেট ভাষাঃ বর্তমানে বাংলাদেশে ঠার বা থেক বা ঠেট ভাষা-ভাষীর সংখ্যা প্রায় ৪০০০০। ১৬৩৮ খ্রীষ্টাব্দে শরনার্থী আরাকানরাজ বল&amp;shy;ালরাজার সাথে মনতং (Mon-Tong) জাতির যে ক্ষুদ্র অংশ বাংলাদেশে প্রবেশ করে তাদের আনীত ভাষার নাম ঠার বা ঠেট বা থেক ভাষা। লোকচিকিৎসা (ethno-medical) পেশার সাথে সম্পৃক্ততার দরুন কালক্রমে এরা বাংলাদেশের প্রত্যন্ত অঞ্চল এমনকি ভারতের পশ্চিমবঙ্গ ও আসামে ছড়িয়ে পড়ে এবং বাইদ্যা বা বেদে নামে পরিচিতি লাভ করে। এই মনতং বা বেদেরা নিজ জাতির লোকদের মধ্যে ঠার ভাষা ব্যবহার করলেও অন্যান্য ক্ষেত্রে এরা বাংলা ভাষাতেই কথা বলে। ঠার ভাষা-র নিজস্ব কোন বর্ণমালা না থাকলেও এদের লোকসাহিত্য বেশ সমৃদ্ধ। ঠার বা থেক বা ঠেট ভাষা -র বার্মা, চীন, লাওসে প্রচলিত কাডু ভাষার সাথে অত্যন্ত ঘনিষ্ঠতা রয়েছে। উত্তর বার্মায় থেক, সাক, আসাক ইত্যাদি সবগুলোকেই কাডু ভাষার অন্তর্গত বলে ধরা হয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;২.৪.বার্মীজ শাখা :&lt;br /&gt;২.৪.ক . রাখাইন ভাষা : কক্সবাজার, বরগুনা, পটুয়াখালী, চট্রগ্রাম ও পার্বত্য চট্রগ্রামে প্রায় দেড়লক্ষেরও অধিক লোক রাখাইন ভাষায় কথা বলে। রাখাইন ভাষা অত্যন্ত প্রাচীন ও সমৃদ্ধ একটি ভাষা। জানা যায় খ্রীষ্ট পূর্ব ৩৩২৫ সাল হতে রাখাইন রাজা মারায়ু কর্তৃক রাখাইন প্রে বা রাখাইন রাজ্যে প্রতিষ্ঠার পর থেকে সুদীর্ঘ কাল পর্যন্ত রাখাইন ভাষা ছিল ঐ রাজ্যের একমাত্র জাতীয় ভাষা। রাখাইনদের নিজস্ব বর্ণমালা রয়েছে। রাখাইন বর্ণমালায় স্বরবর্ণ বা ছারা হল ১২টি এবং ব্যাঞ্জনবর্ণ বা ব্যেঃ মোট ৩৩টি। রাখাইন ভাষা শিক্ষার ক্ষেত্রে প্রথমে স্বরবর্ণ© এবং পরে ব্যাঞ্জন বর্ণ শেখানো হয়। নিকট অতীত কালেও ক্যং-এ রাখাইন ভাষা শেখানোর প্রথা প্রচলিত থাকলেও বর্তমানে তা কেবল পারিবারিক পর্যায়েই সীমাবদ্ধ। তারপরও বর্তমানে রাখাইনদের শতকরা প্রায় ৭০ জনেরও বেশী লোক নিজ ভাষায় লিখতে ও পড়তে সক্ষম।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৩. ভাষা পরিবার-দ্রাবিড়ঃ দ্রাবিড় শব্দটি প্রসারিত অর্থে দক্ষিণ ও পশ্চিম ভারতের এক বিশাল ভাষা পরিবার। আযর্-দের আগমনের বহু পূর্বেই এই দ্রাবিড় ভাষা সমূহ সমগ্র ভারতবর্ষে প্রচলিত ছিল। বাংলাদেশে দ্রাবিড় ভাষা পরিবারের ভাষা সমূহের মধ্যে কুড়ুখ বা ওঁরাও, পাহাড়িয়া, মাহালি প্রভৃতি ভাষা প্রচলিত।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৩.ক. ওঁরাও বা কুড়ুখ ভাষাঃ লালমণিরহাট, নীলফামারী, কুড়িগ্রাম ও পাবনা ব্যতীত উত্তরবঙ্গের প্রায় সবকটি জেলাতেই ওঁরাও বা কুড়ুখ ভাষা-ভাষীদের বসবাস লক্ষ্য করা যায়। বাংলাদেশ এদের মোট সংখ্যা প্রায় ৬৫০০০ জন। কুড়ুখ ভাষাটি আদি ও অবিমিশ্র এবং এটি দিনাজপুর ও নওগাঁ জেলায় বসবাসরত ওরাঁওরা ব্যবহার করলেও সিরাজগঞ্জ, রাজশাহী, বগুড়া, জয়পুরহাট, গাইবান্ধা ও রংপুর অঞ্চলের ওঁরাওরা মূলত কুড়ুখ্‌, উড়িয়া, উর্দ্দূ, হিন্দী, ফার্সী ও বাংলা মিশ্রিত ভাষা ব্যবহার করে । কুড়ুখ ভাষা মূলত কথ্য ভাষা। এই ভাষার নিজস্ব কোন বর্ণমালা তৈরি হয়নি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৩.খ. পাহাড়িয়া ভাষাঃ বাংলাদেশের উত্তর-পশ্চিমাঞ্চলের রাজশাহী, দিনাজপুরে প্রায় ৭৩৬১ জন পাহাড়িয়া জাতির লোক বাস করে। পাহাড়িয়া জাতির দুটি শাখা রয়েছে। এদের একটি শাওরিয়া পাহাড়িয়া বা মালের এবং অন্যটি মাল পাহাড়িয়া বা মালো। বাংলাদেশে মাল পাহাড়িয়া-দের সংখ্যা কম। সুনীতি কুমার চট্রোপাধ্যায়, অতীন্দ্র মজুমদার সহ অনেকেই মালপাহাড়িয়া-দের ভাষাকে মাল্‌তো বলে উল্লেখ করেছেন। তবে ডঃ শিবানী রায়ের মতে এদের ভাষার নাম বাড়লা, যা আসলে মিশ্র ভাষা এবং দীর্ঘদিন বাঙালিদের পাশাপাশি বসবাসের ফলে তা হয়েছে। আবার সুবোধ ঘোষ মাল পাহাড়িয়া-দের ভাষাকে বাংলা ভাষার অপভ্রংশ হিসেবে দেখিয়েছেন। শাওরিয়া পাহাড়িয়া-দের ভাষাকে কেউ কেউ পল্লী ভাষা হিসেবে দেখিয়েছেন যা কিনা শাদ্‌রি-র খুব কাছাকাছি। যা হোক শাওরিয়া ও মাল পাহাড়িয়া-দের ভাষার কোন নিজস্ব বর্ণমালা নেই। মূলত ওরাল লিটারেচারের মাধ্যমেই এই ভাষা তার অতীত ঐতিহ্যগাঁথা ধরে রাখতে পেরেছে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৩.গ. মাহালি ভাষাঃ বাংলাদেশের উত্তরবঙ্গের মাহালি নামের জাতিগোষ্ঠির ভাষার নাম মাহালি ভাষা, যা দ্রাবিড় ভাষা পরিবার ভুক্ত। বর্তমানে এরা মূলতঃ বাংলা ভাষাতেই কথা বললেও এদের কথ্য ভাষায় আজও মূল মাহালি ভাষার কিছু কিছু শব্দাবলীর প্রচলন রয়ে গেছে। যেমন- দাস্‌ (পানি), দাকা (ভাত), গুড়া (ঘর), দানড়ী (গরু) ইত্যাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৪. ভাষা পরিবার-ইন্দো-এরিয়ান : নর্ডিক (Nordic) এবং আলপীয় (Alpine) নামের দুই ভিন্ন নরগোষ্ঠী ভারতবর্ষে আর্য ভাষার প্রবর্তন করেছিল। নর্ডিক-দের রচিত ঋগ্বেদের ভাষাই আর্য ভাষার প্রাচীন নিদর্শন। ঋগ্বেদের ভাষা তথা বৈদিক ভাষা পরবর্তিতে ব্যাকরণবিদদের হাত ধরে সংস্কৃত ভাষায় রূপান্তরিত হয়। কালক্রমে এই সংস্কৃত ভাষা লোক মুখে বিকৃত হতে হতে প্রাকৃত ভাষার রূপ নেয়। এই প্রাকৃত ভাষা থেকেই ইন্দো-আর্য ভাষা পরিবারের ভাষা সমূহের উৎপত্তি। বাংলাদেশে ইন্দো-আর্য ভাষা পরিবারভুক্ত কয়েকটি ভাষার পরিচয় নিম্নে দেওয়া হল-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৪.ক. চাকমা ভাষাঃ বাংলাদেশে ক্ষুদ্র জাতিসত্ত্বাগুলির মধ্যে চাকমা-রা সংখ্যায় সর্বাধিক (প্রায় তিন লক্ষ)। পার্বত্য চট্রগ্রামে বসবাসরত এই চাকমা জাতির নিজস্ব ভাষা ও সাহিত্য রয়েছে, রয়েছে তাদের নিজস্ব বর্ণমালা। এ বর্ণমালার সাথে সাদৃশ্য রয়েছে বর্মী ও অসমীয় বর্ণমালা। অতীতে চাকমা লিপিতেই চাকমা সাহিত্য রচিত হত। খ্রীষ্টান মিশনারিরাই সর্বপ্রথম ১৮৮৬ সালে ভারতের এলাহাবাদের এক ছাপাখানা হতে চাকমা লিপিতে ও চাকমা ভাষায় অনূদিত বাইবেল প্রকাশ করে। ত্রিশ বা চল্লিশের দশকে হরকিশোর চাকমা কর্তৃক চাকমা লেখা নামক বই চাকমা লিপিতে প্রকাশিত হয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৪.খ. রাজবংশী ভাষাঃ প্রায় সাড়ে সাত হাজারেরও অধিক রাজবংশী রংপুর, দিনাজপুর, রাজশাহী, বগুড়া, ময়মনসিংহ ও যশোরে বাস করে। ধারনা করা হয় রাজবংশী ভাষা একসময় বৃহত্তর বোডো (Bodo) ভাষা গোষ্ঠীর অন্তর্ভুক্ত ছিল। যদিও রাজবংশীরা বোডো ভাষা হারিয়ে বর্তমানে বাংলা ভাষাতেই কথা বলে; তবু এখনো রাজবংশী ভাষার ক্রিয়াপদ ও বিশেষ্য পদের শেষে ও মাঝে ঙ, ং এর উচ্চারণ, বোডো ভাষার উৎসজাত শব্দাবলী এবং বোডো ভাষার অপভ্রংশ লক্ষ্য করা যায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৪.গ. মাহাতো ভাষাঃ মাহাতো জাতির নিজস্ব মাহাতো ভাষা বাংলাদেশে প্রায় পাঁচ হাজারেরও অধিক লোক ব্যবহার করে। এদের বসবাস সিরাজগঞ্জ জেলার তাড়াশ ও রায়গঞ্জ এবং বগুড়া জেলার শেরপুর থানার অর্ন্তগত গ্রাম গুলোতে। মাহাতোরা নিজেদের ভাষাকে নাগ্‌রী ভাষা বলে উল্লেখ করে। মাহাতোদের ভাষাকে কেউ কেউ শাদ্‌রি ভাষাও বলে থাকেন। মাহাতো ভাষায় হিন্দী, উর্দ্দূ, বাংলা, অহমীয়া ভাষার মিশ্রণ ঘটেছে। মাহাতো ভাষার নিজস্ব কোন হরফ নেই।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;৪.ঘ. বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী ভাষাঃ বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী-দের বসবাস সিলেট বিভাগে। আগেই বলা হয়েছে জাতিগত ভাবে এক হলেও মণিপুরী জাতি ভাষাগত ভাবে দুই ভাগে বিভক্ত। বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী ভাষার দুটি উপভাষা রয়েছে- এদের একটি রাজার গাঙ (= রাজার গ্রাম) এবং অপরটি মাদাই গাঙ (= রানীর গ্রাম)। ডঃ কে পি সিন্‌হা-র মতে নব ইন্দো-আর্য ভাষার উৎপত্তি কালে বা সামান্য পরে অর্থাৎ ত্রয়োদশ থেকে পঞ্চদশ শতকে ইন্দো-আর্য ভাষার থেকে পৃথক বৈশিষ্ট্য নিয়ে স্বতন্ত্র‌ ভাষা হিসেবে বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী ভাষা সর্বপ্রথম ভারতের মণিপুর রাজ্যে প্রচলিত হয়ে থাকে। এই নব্যপ্রচলিত বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী ভাষাটি পূর্ণাঙ্গ রূপ পায় ষোড়শ শতাব্দীতে। ত্রয়োদশ থেকে ষোড়শ শতাব্দী পর্যন্ত বিষ্ণুপ্রিয়া ও মৈতৈ জনগোষ্ঠীর ঘনিষ্ট সংস্পর্শের কারনে এসময় বিষ্ণুপ্রিয়া ভাষার ব্যাপক মৈতৈ শব্দের অনুপ্রবেশ ঘটে। উনবিংশ শতাব্দীর শুরুতে বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী-রা মণিপুর ছেড়ে ত্রিপুরা, আসাম ও বাংলাদেশের সিলেটে আশ্রয় গ্রহন করে। এসময় কালেই মূলতঃ বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী ভাষায় ব্যাপক ভাবে ইন্দো-আর্য ভাষা পরিবারের শব্দাবলী প্রবেশ করে। অহমিয় ও বাংলা ভাষার সাথে কিছু গুরুত্বপূর্ণ বৈশিষ্ট্যাবলীর মিল থাকার কারনে অনেকেই এই ভাষাকে অহমিয় ও বাংলা-র একটি উপভাষা হিসাবে দেখানোর চেষ্টা করেন। ডঃ কে. পি. সিন্‌হার মতে এই বৈশিষ্ট্যগত মিল সম্ভব হয়েছে বাংলা, অহমিয় ও বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী ভাষার উৎপত্তি একই উৎস থেকে (মাগ্‌দী প্রাকৃত) বলে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;বহুজাতিক ও বহুভাষিক রাষ্ট্রে সংখ্যালঘু জাতিসত্ত্বার ভাষা সমূহ সবসময় বৃহত্তর জাতির ভাষার চাপে কোনঠাসা হয়ে পড়ে। সেখানে বৃহত্তর জাতির ভাষা বা তাদের সুবিধা মতন অন্য কোন ভাষা প্রধান হয়ে উঠবার এবং জোড়পূর্বক একভাষিকতা চাপানোর একটা অসৎ প্রবনতা পরিলক্ষিত হয়। বুর্জোয়া রাষ্ট্রীয় ব্যবস্থায় এই প্রবনতার মাত্রা অত্যন্ত প্রকট ও খোলামেলা রূপেই দেখা যায়। যদিও সাবেক সোভিয়েত ইউনিয়নেও রুশ ভাষার জৌলুস এবং আধিপত্যের কাছে লেট্‌, এস্তোনিয়া সহ অন্যান্য ভাষা গুলোর অবস্থা ছিলো অত্যন্ত ম্রিয়মান। আমাদের বাংলাদেশের রাষ্ট্রীয় কাঠামোতেও বাঙালি ভিন্ন অন্যান্য জাতিসত্ত্বার ভাষা সমূহের অবস্থা অত্যন্ত কোনঠাসা। বাংলাদেশে বসবাসরত ক্ষুদ্র জাতিসত্ত্বা সমূহের সবগুলোই মূলতঃ দ্বি-ভাষী (Bilingual) নিজ পরিবার বা নিজ জাতিসত্ত্বার ভিতরে এরা নিজ মাতৃভাষায় কথা বললেও বাইরের কারো সাথে এরা বাংলাতেই কথা বলে। অনেক গুলি জাতিসত্ত্বা নানাবিধ কারনে আজ তাদের নিজ মাতৃভাষা হারিয়ে বাংলা ভাষাতেই কথা বলে। এদের মধ্যে বিন্‌ধ, কোচ, রাজবংশী, পাহাড়িয়া, হো, বর্মন, ইত্যাদি উল্লে&amp;shy;খযোগ্য। সত্তরের দশকে চাকমা ও মারমা-রা ক্যং-এ তাদের নিজস্ব লিপিতে নিজ নিজ ভাষার চর্চা করত। বিভিন্ন কারনে আজ সেই ব্যবস্থাও বন্ধ। নতুন প্রজন্মের চাকমা-রা আজ আর তাদের নিজ বর্ণমালার সাথে পরিচিত নয়। মাহালি, বুনো, বাগদী জাতিসত্ত্বার লোকজন তাদের মাতৃভাষায় কথা বলতে অক্ষম। মনতং বা বেদে-দের ঠেট বা ঠার ভাষা তার নিজস্ব উপাদান হারাতে হারাতে রিক্ত হতে চলেছে। প্রাতিষ্ঠানিক চর্চার অভাবে মণিপুরী, ককবরক, খাসিয়া, সাঁওতাল, ওঁরাও ভাষা গুলো ধীরে ধীরে বিলুপ্তির দিকে পা বাড়াচ্ছে। এই হচ্ছে আজ বাংলাদেশের ভাষা সমূহের সামগ্রিক চিত্র। এই যে ভাষা গুলির হারিয়ে যাওয়া বা ধ্বংসের প্রান্তিক সীমায় অগ্রসর হওয়া তা শুধু মাত্র একেকটি ভাষার হারিয়ে যাওয়া বা ধ্বংস হয়ে যাওয়ার পূর্ব চিহ্নমাত্র নয়; এই হারিয়ে যাওয়া হল একেকটি জাতিসত্তার নিজস্ব আবেগ, অনুভূতি, স্বপ্ন, লোকায়ত জ্ঞান, সংস্কৃতির হারিয়ে যাওয়া। আর কোন জাতির এগুলি হারানোর অর্থ হল পৃথিবীর বুক থেকে সেই জাতির অস্তিত্ব চিরতরে মুছে যাওয়া। ইউনেস্কো কর্তৃক একুশে ফেব্রুয়ারীকে আন্তর্জাতিক মাতৃভাষা দিবস ঘোষণার মূল লক্ষ্য হল পৃথিবীতে ভাষার বহুত্ব, সাংস্কৃতিক বৈচিত্র্য ও ভিন্নতাকে সংরক্ষণ ও উন্নয়ন। যে বাঙালি জাতিকে ১৯৫২ সালে চরম আত্মত্যাগ করতে হয়েছিল নিজ মায়ের ভাষা রক্ষার জন্য, সেই জাতির রাষ্ট্রভূমিতে বসবাসরত অন্যান্য জাতিসত্ত্বা সমূহের ভাষা গুলোর যে করুন অবস্থা তা সত্যিই লজ্জাজনক, দুঃখজনক। স্বাধীনতার ৩৩ বছর পরেও এই বাংলাদেশ রাষ্ট্র বাঙালি ভিন্ন অপরাপর জাতিসত্ত্বার ভাষা সমূহের সংরক্ষণ, উন্নয়নের ব্যাপারে কোন কার্যকর পদক্ষেপ তো নেয়েইনি বরং এই সমস্ত ভাষা সমূহের অধিকারী বিভিন্ন জাতিসত্ত্বার অস্তিত্বও স্বীকার করেনি। বাংলাদেশের প্রচলিত শিক্ষা ব্যবস্থায় এখানকার ক্ষুদ্র জাতিসত্ত্বা সমূহের নিজ মাতৃভাষাতে লেখাপড়া করার কোন সুযোগ রাখা হয়নি। অথচ পার্শ্ববর্তী দেশ ভারতেই মণিপুরী, খাসিয়া, মান্দি, সাঁওতাল সহ বিভিন্ন জাতিসত্ত্বা স্কুল, কলেজ এমনকি বিশ্ববিদ্যালয় পর্যায়েও নিজ নিজ মাতৃভাষায় পড়াশোনা করছে। এখনএকুশে-র অহংঙ্কার ধারনকারী এই বাংলাদেশ রাষ্ট্র কি পারবে ধ্বংসের দ্বার প্রান্তে উপস্থিত এই সমস্ত ভাষা গুলি রক্ষার কোন কার্যকর পদক্ষেপ নিতে ? তার বিশাল ভাষা জাদুঘরকে জীবন্ত রাখতে ? নাকি আগামী ৩০ থেকে ৫০ বছরের মধ্যেই প্রাকৃতিক বৈচিত্র্যের অধিকারী এই বাংলাদেশ হারাবে তার ভাষার বৈচিত্র্যতাকে, সাংস্কৃতিক বৈচিত্র্যতাকে ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;উল্লেখ্যপঞ্জি ঃ&lt;br /&gt;গ্রন্থ সমূহঃ&lt;br /&gt;১. Chittagonj Hill Tracts- R. H. Sneyd Hutchinson Vivek Publishing company, DelhiFirst Published 1901, Reprint 1978 .&lt;br /&gt;২. The peoples of India- Anderson, J.DBimla pub. ।। First Published 1913.&lt;br /&gt;৩. An Etymological Dictionary of Bishnupriya Manipuri- Dr. K. P. Sinha Puthi, Calcutta 1986.&lt;br /&gt;৪. ভাষাতত্ত্ব - অতীন্দ্র মজুমদার।। নয়াপ্রকাশ, কলিকাতা।। ১৯৯৭।&lt;br /&gt;৫. ভারতের ভাষা ও ভাষা সমস্যা- সুনীতকুমার চট্রোপাধ্যায়।। রূপা অ্যান্ড কোম্পানী, কলিকাতা, জানুয়ারী ১৯৯২।&lt;br /&gt;৬. ভারত সংস্কৃতি- সুনীতকুমার চট্রোপাধ্যায়।। মিত্র ও ঘোষ পাবলিশার্স প্রাঃলিঃ কলকাতা।। আষাঢ় ১৪০৪।&lt;br /&gt;৭. ভারতের আদিবাসী- সুবোধ ঘোষ।। ন্যাশনাল বুক এজেন্সী প্রাঃ লিঃ, কলকাতা।। b‡f¤^i ২০০০।&lt;br /&gt;৮. ভারতের নৃতাত্ত্বিক পরিচয়- ডঃ অতুল সুর।। সাহিত্যলোক, কলকাতা।। জুলাই ১৯৮৮।&lt;br /&gt;৯. ভাষা, দেশ, কাল- পবিত্র সরকার।। জি.এ.ই. পাবলিশার্স।। বৈশাখ ১৩৯২।&lt;br /&gt;১০. উপভাষা চর্চার ভূমিকা- মনিরুজ্জামান।। বাংলা একাডেমী, ঢাকা।। মে, ১৯৯৪।&lt;br /&gt;১১. ককবরক ভাষা ও সাহিত্য- কুমুদ কুন্ডু চৌধুরী।। অক্ষর পাবলিকেশান্‌স, আগরতলা।।&lt;br /&gt;১২. পার্বত্য চট্রগ্রামের উপজাতীয় ভাষা- সুগত চাকমা।। উপজাতীয় সাংস্কৃতিক ইনষ্টিটিউট।। রাঙ্গমাটি।। মার্চ ১৯৮৮।&lt;br /&gt;১৩. বাংলাদেশের গারো সমপ্রদায়- সুভাষ জেংচাম।। বাংলা একাডেমী. ঢাকা।। ১৯৯৪।&lt;br /&gt;১৪. চাকমা পরিচিতি- সুগত চাকমা।। বরগাঙ পাবলিকেশন্স, রাঙ্গামাটি।। অক্টোবর ১৯৮৩।&lt;br /&gt;১৫. বাংলাদেশের সাঁওতালঃ জীবন ও সংস্কৃতি- আখতার উদ্দিন মানিক।। উত্তরা প্রকাশনা ,মোহাম্মদপুর,ঢাকা।। wW‡m¤^i ১৯৯৮&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৬. উত্তরবঙ্গের আদিবাসীঃ লোকজীবন ও লোকসাহিত্যঃ ওঁরাও- ডঃ মুহাম্মদ আব্দুল জলিল।। বিশ্ব সাহিত্য ভবন, ঢাকা।। মে ২০০১।&lt;br /&gt;১৭. আদিবাসী ভাষা ও সংস্কৃতিঃ প্রসঙ্গ নদীয়া জেলা- ডঃ শিবানী রায় (মওল)।। পুস্তক বিপনি, বেনিয়াটোলা লেন, কলিকাতা।। অক্টোবর ২০০২।&lt;br /&gt;১৮. সিলেটের নিঃস্ব আদিবাসী পাত্র- ডঃ রতন লাল চক্রবর্তী।। মওলা ব্রাদার্স, ঢাকা।। মে ২০০০।&lt;br /&gt;১৯. বাংলাদেশের মণিপুরীঃ ত্রয়ী সংস্কৃতির ত্রিবেনী সঙ্গমে- এ কে শেরাম।। আগামী প্রকাশনী; ঢাকা।। ১৯৯৬।&lt;br /&gt;২০. বাংলাদেশে রাখাইন সমপ্রদায়ঃ ইতিহাস, ঐতিহ্য ও জীবনধারা-মং বা অং (মং বা)।।প্রকাশক-লেখক।।এপ্রিল ২০০৩ খ্রী.।&lt;br /&gt;প্রবন্ধ/পত্রিকাঃ&lt;br /&gt;১. হাজং জীবনের ইতিবৃত্ত- মুজিব মেহেদী।। বাংলাদেশের উপজাতি ও আদিবাসীঃ অংশীদারিত্বের নতুন দিগন্ত- সম্পাদনাঃ হাফিজ রশীদ খান।। পাঠক সমাবেশ, ঢাকা।। ১৯৯৩।&lt;br /&gt;২. বরেন্দ্র অঞ্চলের বিন্‌ধ জাতিগোষ্ঠীঃ সামাজিক-রাজনৈতিক পরিচয় উদ্‌ঘাটন- ডঃ মোঃ আব্দুর রশীদ সিদ্দিকী।। আইবিএস জার্নাল।। ইনস্টিটিউট অব বাংলাদেশ স্টাডিজ, রাজশাহী বিশ্ববিদ্যালয়।। ১০ম সংখ্যা ১৪০৯&lt;br /&gt;৩. মানুষ- সম্পাদনাঃ মোহাম্মদ মহসীন।। এফআইভিডিবি, খাদিমনগর, সিলেট।। †m‡Þ¤^iÑ অক্টোবর ১৯৯৭।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.......................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;পীরেন স্নাল ও ইতিহাসের বিদ্রোহী আত্মারা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;দুপুর মিত্র&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;পীরেন স্নাল যখন শহীদ হলেন তখন থেকেই আমার ভিতরে জেগে উঠেছিল বিদ্রোহীরা। ইতিহাসের পাতা থেকে করুন অথচ ক্রোধান্বিত কিছু মুখ কি যেন বলতে চেয়ে প্রায়ই হারিয়ে যেত। আজো তাঁদের খুঁজে বেড়াই। সেই মুখ কি যেন বলতে চেয়েছিল-।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;যে পীরেনকে মারা হলো, যে পীরেনকে শহীদ হতে হলো ইকোপার্ক বিরোধী আন্দোলনে, রাষ্ট্রীয় শোষণ-নিপীড়ন ও সাম্রাজ্যবাদ বিরোধী আন্দোলনে, সেই পীরেনের মত অতীতে না জানি কত মান্দি, হাজংকে প্রাণ দিতে হয়েছে এইসব নানান জুলুম-নির্যাতনের বিরুদ্ধে লড়তে গিয়ে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;হিন্দু জমিদারগন মান্দিরাজ্য দখল করার পরপরই জুলুম-নির্যাতন শুরু করে। তখন মান্দিদের জীবিকার একমাত্র উপায় ছিলো কৃষিকাজ। জুম পদ্ধতিতে এরা কৃষিকাজের মাধ্যমে প্রধানতঃ উৎপাদন করত ধান ও তুলা। সমতল ভূমির বাজারে এসেই এরা জমিদার ও ব্যবসায়ীদের শোষণের শিকার হয়। সামান্য লবনের বিনিময়ে মান্দিদের কাছ থেকে কেড়ে নিত বিপুল পরিমান তুলা। এছাড়া অন্যান্য দ্রব্যাদি যা সমতল ভূমির বাজারে নিয়ে আসা হত বিক্রির জন্য, তার উপর রাখা হত অতি উচ্চ হারের কর। মান্দিরা এইসব উৎপীড়নের বিরোধীতা করলেই জমিদাররা আরো অত্যাচার চালাত। এবং এই কারনেই শোষিত-নির্যাতিত এইসব মান্দি কৃষক বিদ্রোহীরা মাঝে মধ্যেই সংঘবদ্ধ হয়ে সমতলভূমিতে এসে জিনিসপত্র লুন্ঠন করে নিয়ে যেত।&lt;br /&gt;এমনকি জমিদারদের অত্যাচারে অতিষ্ঠ মান্দি ও হাজং জাতির লোকেরা করম শাহ নামক এক ব্যক্তির সাম্য ও ভ্রাতৃত্বের শ্লোগানে সংঘবদ্ধ হয় নানা জুলুম-নির্যাতনের বিরুদ্ধে দাঁড়ানোর জন্যই।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ছপাতি নকমা মান্দি রাজ্য প্রতিষ্ঠার পরিকল্পনা নিয়েছিলেন জমিদারদের হাত থেকে মান্দি, হাজং, কোচ, মেচ, হাড়ি, ডালু প্রভৃতি জাতিসত্ত্বার লোকদের রক্ষা করার জন্য। তাঁর প্রচেষ্টা ব্যর্থ হলেও তাঁর কারনেই ১৮০২ খৃষ্টাব্দের পর থেকে মান্দি সমাজে নানা পরিবর্তন ঘটেছিলো। অন্যদিকে করম শাহর মৃত্যুর পর থেকে টিপু গারো পাগলপন্থী মত প্রচার করেন। টিপুর নেতৃত্বে এখানে ১৮২৫-১৮২৭ খৃষ্টাব্দ পর্যন্ত পাগলপন্থী বিদ্রোহ ঘটে। পাগলপন্থী বিদ্রোহ সংগঠিত হওয়ার কারন ছিল বেশ স্পষ্ট। ১৮২০ সনে সেরপুরের জমিদারি বাটোয়ারা হইয়া গেলে, জমিদারগন প্রজা হইতে বাটোয়ারার খরচ আদায় মানসে বর্ধিত হারে খাজনা ধার্য করেন। জমিদার প্রজাসাধারণের নিকট আবোয়ার,খরচা,মাথট প্রভৃতি বহুবিধ ট্যাক্‌স ধার্য করিয়া প্রজার উপর উৎপীড়ন আরম্ভ করেন। এই উৎপীড়ন সহ্য করতে না পারিয়া বহু প্রজা জমিদারের বিরুদ্ধে দন্ডায়মান হয়। তাহারা কুড় ( সেরপুর পরগনার ১ কুড় = ৩ বিঘা ১০ কাঠা) প্রতি চারি আনার অধিক খাজনা দিতে পারিবে না বলিয়া ঘোষণা করে। ধর্ম প্রচারক টিপু সময় বুঝিয়া বিদ্রোহীদের নেতৃত্ব গ্রহণ করে এবং স্বীয় অভিনব সাম্যমতের প্রচারের দ্বারা সেরপুরে ভীষণ বিপ্লব জাগাইয়া তোলে । কিন্তু এই সশস্ত্র বিদ্রোহের মাধ্যমে শেরপুর শহরকে কেন্দ্র করে নতুন রাজ্য স্থাপন করলেও তাঁরা ২ বছরের অধিক সময় থাকতে পারেননি ইংরেজ সৈন্যদের হাতে পরাজিত হয়ে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;১৮৩২-৩৩ খৃষ্টাব্দে অবশ্য দ্বিতীয় পাগলপন্থী বিদ্রোহ সংগঠিত হয়। টিপুর সহযোদ্ধা গুমানু সরকার ১৮৩২ সালে মান্দিদের দলপতি রূপে সংগ্রামে অংশ নেন। উজির সরকার নামে আরো একজন মান্দি গুমানু সরকারের সাথে কাজ করেন। ১৮৩৩ সালে জানকু পাথাং ও দুবরাজ পাথাং বিদ্রোহীদের নেতৃত্ব গ্রহণ করেন। তাঁরা শেরপুর আক্রমণ করে জমিদারদের গৃহ ও কাছারী বাড়ি লুন্ঠন করেন। এভাবে তাঁরা অনেকবার আক্রমণ করেন। এমনকি ইংরেজদের সাথে যুদ্ধ করে বহু শত্রু সৈন্য ধ্বংস করেন। এদিকে মান্দিদের বিদ্রোহ দমন করার জন্য ইংরেজরা উঠে পড়ে লাগে। না পেরে জানকু পাথাং ও দুবরাজ পাথাং কে ধরে দেওয়ার জন্য পুরস্কারও ঘোষণা করে। নানান ভাবে ইংরেজ কর্তৃক নিপীড়নের ফলে মনোবল ভেঙ্গে যায় অনেক বিদ্রোহীর। এর কারনে দ্বিতীয় পাগলপন্থী বিদ্রোহও ব্যর্থ হয়। নিখোঁজ হয় জানকু পাথাং ও দুবরাজ পাথাং।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;এরকম আরো বেশ কয়েকটি বিদ্রোহ সংগঠিত হয়েছিল। তন্মধ্যে উল্লেখ্যযোগ্য ১৮৩৭, ১৮৪৮, ১৮৬১, ১৮৬৬, ১৮৭১, ১৮৮২ খৃষ্টাব্দের বিদ্রোহ। ইতিহাসের এইসব বিদ্রোহের বিদ্রোহী আত্মারা কিছুই কি বলেনা ? কিছূই কি বলে না আক্রমণ-বিদ্রোহ-জেগে উঠার কথা ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;জমিদারদের জুলুম-নির্যাতনের কবলে পড়ে ক্ষিপ্ত মান্দি জাতিসত্ত্বার মানুষেরা জমিদারদের বিভিন্ন ঘাঁটি ও কর্মচারীদের উপর আক্রমণ আরম্ভ করে ১৮৩৭ খৃষ্টাব্দের দিকে। এসময় ইংরেজ সৈন্যদের সাথে বেশ কয়েকবার সংঘর্ষ হয়। ১৮৪৮ খৃষ্টাব্দে এই সংগ্রাম শক্তিশালী হয়ে উঠলে মান্দিরা কর দেওয়া বন্ধ করে দেয়। সরকারী সৈন্যবাহিনীর ভয়ে মান্দিরা পলায়ন করলেও জমিদারদের উপর আক্রমণ তারা অব্যাহত রেখেছিল। আক্রমণের ফলস্বরূপ মান্দিদের ন্যায্য অধিকার প্রদানের পরিবর্তে সরকারের পরামর্শে মান্দি অঞ্চলের বাজার বন্ধ করে দেয়। কিন্তু হিতে বিপরীত ঘটে। আক্রমণ আরো বৃদ্ধি পায়। এতে করে কিছুদিন জুলুম-নির্যাতন বন্ধ থাকলেও ১৮৬১ খৃষ্টাব্দে ইংরেজ সৈন্যরা গ্রামে গ্রামে ঢুকে লুন্ঠন ও অগ্নিসংযোগ চালায়। ১৮৬৬ খৃষ্টাব্দে সুসঙ্গের জমিদার আবারও খাজনা আদায়ের চেষ্টা করে। বিক্ষুদ্ধ মান্দিরা দলবদ্ধ হয়ে সমতলে এসে জমিদার ঘাঁটি গুলোর উপর আক্রমণ চালিয়ে যায়। এই আক্রমণে অনেক পাইক-বরকন্দাজ ও কর্মচারি নিহত হয়। এই অবস্থায় সৈন্যরা স্থায়ীভাবে মান্দি এলাকায় বসবাস শুরু করলে বিদ্রোহ কিছুটা থেমে থাকে। এ থেমে থাকার মানে এই নয় যে এরা ইংরেজ ও জমিদারদের জুলুম মেনে নিয়েছিল। ভিতরে ভিতরে আক্রমনের সুযোগ খুঁজছিল মান্দিরা। ১৮৭১ খ্রিস্টাব্দে জরিপ কাজের জন্য ইংরেজরা মান্দি এলাকায় প্রবেশ করলে অতর্কিত হামলা চালিয়ে তাদের হত্যা করা হয়। এতে ইংরেজরা প্রতিশোধ নেবার জন্য অনেক মান্দি ঘর-বাড়ি পুড়িয়ে ফেলে। বিপুল সংখক ইংরেজ সৈন্যদের কাছে শেষ পর্যন্ত আত্নসমর্পন করতে বাধ্য হয়। ১৮৭১ খিস্টাব্দের বিদ্রোহে মান্দিদের পরাজিত করানোর পর ১৮৮২ খিস্টাব্দে আঠারখানি গ্রামের মানুষদের পথঘাট নির্মাণের কাজে নিযুক্ত করে ইংরেজরা। কিন্তু এই সময়ে দুর্ব্যবহারের কারণে কাজ করা বন্ধ করে দেয় মান্দিরা। তখন বিদ্রোহ দেখা দেয়। মান্দিরা তীর-ধনুক দিয়ে সশস্ত্র ইংরেজ সৈন্যের সাথে যুদ্ধ করে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মান্দি, হাজং, ডালু, বানাই প্রভৃতি জাতিসত্ত্বার মানুষেরা টঙ্ক আন্দোলনেও যুদ্ধ করেছিল। টঙ্ক প্রথা হলো ফসলে খাজনা দেয়ার ব্যবস্থা। জমিতে ধান হোক বা না হোক খাজনা দিতেই হবে। এই টঙ্ক প্রথার বিরুদ্ধে নানান ক্ষুদ্র জাতিসত্ত্বার মানুষেরা গড়ে তোলে সশস্ত্র আন্দোলন। এই আন্দোলনে নারীদের ভূমিকাই ছিল বেশি। রাশিমণি হাজং টঙ্ক আন্দোলনে সম্পৃক্ত করেন অনেক হাজং নারীদের। জমিদার গোষ্ঠী ও বেস্টিন বাহিনীর সশস্ত্র দল ফসলের সাথে মেয়েদরও লুট করে। কুমুদিনী হাজং নামে এক কিশোরী বধূকে টেনে-হিঁচরে তুলে নেয়ার খবর ছড়িয়ে পড়লে রাশিমণি হাজং এর নেতৃত্বে মেয়েরা দা, বটি, বল্লম, কোঁচ প্রভৃতি অস্ত্র হাতে কুমুদিনী হাজংকে উদ্ধার করতে যান। এই সময়েই সিমসাং নদীর তীরে বেস্টিন বাহিনীকে আক্রমন করেন হাজংরা। রাশিমণি হাজং দা দিয়ে কুপিয়ে হত্যা করেন বৃটিশ পুলিশ। সে সময় পুলিশের গুলিতে শহীদ হন রাশিমণি হাজং। রাশিমণি হাজং ছাড়াও আন্দোলনে ছিলেন অশ্বমণি হাজং, যাদুমণি হাজং সহ অনেক অবিসংবাদী নেত্রী।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;এই সব ইতিহাসের আত্নারা আজও কিছু বলতে চায়। আমরা কি শুনতে পাই ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;সুসঙ্গ জমিদার বংশের রাজা কিশোরের আমলে ১৭৭০ খৃষ্টাব্দে হাতি ধরার কাজের জন্য অনেক হাজং পরিবারকে পাহাড়ের পাদদেশে নিয়ে আসে। তখন থেকেই হাজংগণ নিজেদের চাষবাস বন্ধ করে নিজেদের জীবন বিপন্ন করে হাতির খেদা পেতে হাতি ধরত। এই হাতি বিক্রি করে প্রচুর অর্থ লাভ করত জমিদারেরা। হাজং চাষীরা গহীন অরণ্যের মধ্যে গজারি গাছের খুঁটি দিয়ে একটি বড় স্থান বেষ্টনী করে মধ্যে হাতির প্রিয় খাবার কলাগাছ ও ধানের চাষ করে রাখত। খাবারের লোভে বন্যহাতিরা খেদার মধ্যে আসলে প্রবেশ পথ বন্ধ করে দেয়া হতো। এভাবে হাতি ধরতে গিয়ে অনেক হাজংকেই প্রাণ দিতে হয়েছিল। হাজংরা ইচ্ছে করলেই এই কাজে না করতে পারত না। একসময় হাজংরা এই বাধ্যতামূলক বেগার প্রথার বিরুদ্ধে কথা বলতে শুরু করল। মনা সরদারের নেতৃত্বে গড়ে উঠল আন্দোলন। বুনো হাতির পদতলে পিষে মনা সরদারকে হত্যা করলে আরো বেশী ক্ষেপে যায় হাজংরা। এই আন্দোলনে মান্দিরাও যোগ দিয়েছিল। বিদ্রোহের মুখে পড়ে জমিদার পরিবার পালিয়ে যায়। সে সময় বাধ্যতামূলক হাতি খেদার কাজ বন্ধ করতে গিয়ে প্রাণ দিতে হয়েছিল রাতিয়া হাজং, মংলা হাজং, বেহারী হাজং, বাঘা হাজং, জগ হাজং ও সোয়া হাজংদের।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;একসময় সুসং, মদনপুর, জংগলবাড়ি, শেরপুর প্রভৃতি এলাকা শতাব্দীর পর শতাব্দী বংশানুক্রমে রাজত্ব করত মান্দি সর্দারেরা। বাইস্যা মান্দা নামের একজন সর্দারের রাজত্ব ১২৮০ সালে সোমেশ্বর পাঠক (সিং) দখল করে নেয়। এই সময়েই বেশ কিছু হিন্দু জমিদারের উদ্ভব ঘটে। হিন্দু জমিদাররা নানা ভাবে মান্দিদের-হাজংদের-কোচদের-ডালুদের-মেচদের-বানাইদের-হদিদের-হাড়িদের-বংশীদের উপর অত্যাচার চালাত। কখনো লবনের সরবরাহ বন্ধ করে দিত, আবার কখনো সমতলের বাজারে কোনও পণ্যদ্রব্যাদি নিয়ে আসলে অধিক হারে মাশুল আদায় করত। কিন্তু হিন্দু জমিদারেরা তেমন কিছু না পারলেও ইংরেজরা আসার পর নানান জুলুম-নির্যাতনের মাধ্যমে বিভিন্ন আন্দোলন দমিয়ে রাখা হত।&lt;br /&gt;আজো এই দমিয়ে রাখার প্রবণতা রয়ে গেছে। এখন আরো জটিলভাবে-অনেক বেশি শোষণের মাধ্যমে। এর জলজ্যন্ত প্রমান পীরেন স্নালের খুন হওয়ার ঘটনা। মান্দিরা কি এমন ক্ষতি করেছিলো বনবিভাগের-রাষ্টের। ওদের মত করে বাঁচতে চেয়েছিল; এইতো। এতদিন যাবৎ সবকিছু বিসর্জন দিয়ে কেবলমাত্র বেঁচে থাকার জন্য বাঁচতে চেয়েছিল ওরা ওদের মত করে-তাও কি দেয়া হবেনা ? ও, এখন কেবল বাকি রয়ে গেছে ওদেরকে চিড়িয়াখানায় ভরা ? কিন্তু না; এইসব জুলুম আর নির্যাতনের মাঝে যে সব হাজারো বিদ্রোহী জেগে উঠেছিল অধিকার আদায়ের লক্ষ্যে, সেইসব বিদ্রোহীদের আত্মা ডেকে তুলবেন পীরেন স্নাল। আমি সেই আত্মাদের কথা শুনছি।&lt;br /&gt;উল্লেখঃ&lt;br /&gt;১.বাংলাদেশের গারো সমপ্রদায়, সুভাষ জেংচাম, ১ম প্রকাশ জুন ১৯৯৪, বাংলা একাডেমী।&lt;br /&gt;২.ভারতের কৃষক বিদ্রোহ ও গনতান্ত্রিক সংগ্রাম, সুপ্রকাশ রায়, ১ম প্রকাশ জুলাই ১৯৬৬, ডিএনবি ব্রাদার্স।&lt;br /&gt;৩.বাংলাদেশের কৃষক বিদ্রোহ, অজয় রায়, প্রকাশকাল ১৯৮৫, বাংলা একাডেমী ।&lt;br /&gt;৪.বিপন্ন্‌ ভূমিজ অস্তিত্বেও সংকটে আদিবাসী সমাজ বাংলাদেশ ও পূর্বভারতের প্রতিচিত্র, সম্পাদনা-মেসবাহ কামাল ও আরিফাতুল কিবরিয়া, প্রকাশকাল-২০০৩, গবেষণা ও উন্নয়ন কালেকটিভ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;............................................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;নারী মুক্তিঃ প্রেক্ষিত জুম্ম নারী সমাজ&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;ভেঘাত্যা চাকমা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;নারী মুক্তি শব্দটি বহুল আলোচিত, সমালোচিত, সুপরিচিত। সময়ের দাবিতে বিশ্বব্যাপী এর সংজ্ঞা-স্বরূপ বদলে যাচ্ছে প্রতিনিয়ত। সন্দেহ নেই সামগ্রিক প্রেক্ষিতে নারী মুক্তি যে অর্থ বহন করে তার যর্থাথতা বিচারে স্বতন্ত্র‌ এবং গূঢ় তাত্ত্বিক আলোচনা-গবেষণা প্রয়োজন। এটা অনস্বীকার্য© যে, নারী মুক্তির অর্থ সমাজের সামগ্রিক মুক্তি। তাই নারী পুরুষের সম উন্নয়ন কোন অনুগ্রহের বিষয় নয় বরং যে কোন সমাজের অগ্রগতির জন্য এটি অপরিহার্য। বাস্তবতার নিরিখে বলা যায়, দেশে বিরাজমান বর্তমান রাজনৈতিক ও অর্থনৈতিক পরিস্থিতিতে বৃহত্তর পার্বত্য চট্রগ্রামে নারী বিশেষত জুম্ম নারীদের অবস্থান আদৌ সন্তোষজনক নয়। কারন জুম্ম নারী সমাজও নারী-পুরুষ বৈষম্যের প্রভাবমুক্ত নয়। নারীর উপর বৈষম্য-নিপীড়ন-নির্যাতন ধর্ম-বর্ণ-শ্রেণী নির্বিশেষে ঘটলেও আমাদের দেশে সমতল অঞ্চল থেকে পার্বত্যাঞ্চলে নারী নির্যাতন-নিপীড়ন-বৈষম্যের চিত্র-প্রেক্ষাপট সংগত কারনেই একটু ভিন্ন। আর পার্বত্যাঞ্চলে জুম্ম নারী মুক্তি আন্দোলনের লক্ষ্য কী ব্যক্তি বিশেষ, নাকি ধর্ম-বর্ণ-সমপ্রদায়-জাতিগত পরাধীনতা থেকে মুক্তি তা স্পষ্ট নয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;একজন নারী কন্যা, বোন, স্ত্রী, মাতা রূপে পরিপূর্ণ মানুষ। কিন্তু অপরাপর সমাজের ন্যায় আমাদের জুম্ম সমাজেও নারীদের অবদানকে নিরপেক্ষ দৃষ্টিতে মূল্যায়ন করা হয়না। শহরাঞ্চল থেকে তুলনামূলকভাবে গ্রামাঞ্চলে জুম্ম নারীরা পায়না তাদের প্রাপ্য সম্মান, সুযোগ, শান্তি ও স্বস্তি । এজন্য পিতৃতান্ত্রিক বা পুরুষ শাসিত সমাজব্যবস্থা, পারিবারিক-সামাজিক-সাংস্কৃতিক অবস্থানে নারী-পুরুষের অসামঞ্জস্যতা, রক্ষণশীলতা, তথাকথিত মূল্যবোধ, নারীর মানবিক অধিকারের গুরুত্বহীনতা, শিক্ষার অনগ্রসরতা দায়ী। পাশাপাশি রাজনৈতিক, প্রশাসনিক চাপ অনেকক্ষেত্রে জুম্ম নারীদের উৎকর্ষ সাধনের সুযোগ না দিয়ে দূর্বল করে রাখার ইন্ধন যোগায়। বৃহত্তর রাজনীতির কৌশলগত কারনে তাদের নিজস্ব স্বকীয়তা দিয়ে বিকশিত হওয়ার ক্ষেত্র সীমাবদ্ধ। নারীদের মধ্যে মুক্ত চিন্তার উদয় হলেও পারিবারিক, সামাজিক, রাজনৈতিক চাপের কারনে তার অপমৃত্যু ঘটে। যার কারনে শিক্ষা-দীক্ষা, জ্ঞান-গরিমায়, অভিজ্ঞতায়, মননের উৎকর্ষতায় জুম্ম নারীরা অনেক পিছিয়ে। অর্থনৈতিক, রাজনৈতিক অঙ্গনে জুম্ম নারীদের স্বত:স্ফূর্ত© অংশগ্রহন আশাব্যঞ্জক নয়। শিল্প, সাহিত্য, গবেষণা ক্ষেত্রে জুম্ম নারীদের অংশগ্রহনও খুবই নগণ্য। প্রথম জীবনে কেউ কেউ এসবে অংশগ্রহণ করলেও অধিকাংশেরই নিজ নিজ সংসার জীবনে এসে এসব কর্মের ধারবাহিকতা বজায় থাকেনা, রক্ষিত হয়না নিজস্ব সৃজনশীলতা-সৃষ্টিশীলতা। তাই জুম্ম নারী সমাজে নারী মুক্তি আন্দোলন-উন্নয়নের খুব একটা ব্যতিক্রম বা অগ্রগতি হয়নি। বাস্তবিক জুম্ম নারীদেরই এই বিষয়ে অজ্ঞতা, উদাসীনতা বা অসচেতনার কারনে এ ব্যাপারে সাফল্য আসছে না। অথচ নারী মুক্তি আন্দোলনে নারীদেরই সাগ্রহে এগিয়ে আসতে হবে, পুরুষের পাশাপাশি নারীকে সমানাধিকারের ভিত্তিতে নয় মানবাধিকারের ভিত্তিতে মানুষ হয়ে কাজ করতে হবে। প্রচলিত উত্তরাধিকার আইনের যুগোপযোগী সংস্কারের পক্ষে জনমত সৃষ্টির মাধ্যমে নারীর অধিকার ও অর্থনৈতিক উন্নয়ন ত্বরান্বিত করতে হবে। নিজের তাগিদে আপন চেতনায় নিজেদেরই মানবিক মর্যাদায় অভিষিক্ত করতে হবে, এই দায়ভার নিজেদেরই বহন করতে হবে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;পার্বত্যাঞ্চলে জুম্ম নারী নির্যাতন হিসাবে যৌতুকের জন্য নির্যাাতন বা এসিড নিক্ষেপের ঘটনা নেই বললেই চলে। অথচ নির্মম সত্য যে পার্বত্য চট্রগ্রামে শান্তি-শৃঙ্খলা বজায় রাখার নামে যে লক্ষাধিক সেনাবাহিনী মোতায়েন রাখা ,কখনও কখনও এই সেনা সদস্য বা সেনাবাহিনীর সহায়তায় সেটেলার বাঙালি কর্তৃক জুম্ম নারীদের লাঞ্চনা, সম্ভ্রমহানি, হত্যা, অপহরনের মত ঘৃণ্য ঘটনা ঘটে , যার দৃষ্টান্ত খুঁজলেই পাওয়া যায়। রাজনৈতিক অস্থিরতার কারনে আমাদের জুম্ম সমাজে এত সঙ্কট, এত টানাপোড়েন, আর সব কিছুতে এত নেতিবাচক চিন্তা-দ্বিধাদ্বন্দ্ব যে এধরনের ঘটনা অনেক ক্ষেত্রে খুব একটা গ্রাহ্যই করা হয়না। ক্ষেত্র বিশেষে যে কোন ঘটনায় নারীকেই দায়ী করা হয়। এ ধরনের ঘটনার প্রতিবাদ করতে গেলে প্রকৃত ঘটনার প্রেক্ষাপট যাচাই না করেই পাহাড়ী-বাঙালী সামপ্রদায়িক দাঙ্গা-সহিংসতা হিসেবে চালিয়ে দেয়া হয়। কিন্তু মানবিক দৃষ্টিকোন থেকে একজন নারীর কাছে তা অত্যন্ত অবমাননাকর। স্বজাতির লোকদের দ্বারা জুম্ম নারী নির্যাতন খুব একটা না ঘটলেও পরিকল্পিতভাবে বিজাতীয় লোকদের দ্বারা নারী নির্যাতন ঘটলে সঙ্গত কারনে প্রশ্ন জাগে এসব কি পার্বত্য চট্রগ্রামের পাহাড়ী জুম্মদের অস্তিত্ব রক্ষার সংগ্রাম সহ জুম্ম নারী আন্দোলনকে পদদলিত করার বহিঃপ্রকাশ মাত্র! তাই, জুম্ম নারী-পুরুষের একে অপরের সহযোগিতা ব্যতীত জুম্ম নারী মুক্তি আন্দোলন বা অন্য যে কোন আন্দোলন সম্ভব নয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;..............................................................................................................................................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;মণিপুরী শিল্প-আঙ্গিক&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;শুভাশিস সিনহা&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;বাংলাদেশে অনেক জাতিদের ভেতর পাঙন, মৈতৈ মণিপুরী ও বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরীরাও রাষ্ট্রের নানান নিপীড়নের শিকার। বাঙালি বাদে অপরাপর জাতি কারোরই নেই এই রাষ্ট্রে নিজস্ব ভাষা ও সংস্কৃতির আপন অধিকার। বাঙলা ভাষার জন্য যখন একুশে ফেব্রুয়ারি আন্তর্জাতিক মাতৃভাষা দিবস পালন করা হয় তখন আমরা ভুলেই যাই বিষ্ণুপ্রিয়া ভাষার জন্য সুদেষ্ণা সিংহ শহীদ হয়েছিলেন। মণিপুরীদের ব্রিটিশ বিরোধী আন্দোলন, নুপীলান ও ভানুবিল আন্দোলনের কথা আমাদের ইতিহাসে আসে না। বাঙালি বাদে অপরাপর জাতিসত্ত্বাসমূহের প্রতি রাষ্ট্রের নানান বৈষম্য ও আচরন জাতিসত্তার ইতিহাস ও জীবন সংস্কৃতি যেভাবে আড়াল করে রাখে সেইসব বিষয়ে প্রশ্ন তোলা জরুরী। জরুরী সকল জাতিসত্ত্বাসমূহের নিজস্ব সংস্কৃতির বহুপাক্ষিক মূল্যায়ন। হয়তোবা অনেক প্রশ্ন থেকে গেলেও সেই জায়গা থেকেই মনিপুরী শিল্প আঙ্গিকের এই লেখাটি উপস্থাপন করা হল।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;রাসলীলা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;রাধা-কৃষ্ণের প্রেমলীলার এক নৃত্যগীতাভিনয় অনুষ্ঠান হচ্ছে রাসলীলা। রাস শব্দটি রস শব্দের বিবর্তিত রূপ বলে অনুমান করা হয়। মণিপুরীদের প্রথম রাসলীলা বা রাসলীলানুসরণ অনুষ্ঠান হয় মণিপুরে ১৭৬৯ খৃস্টাব্দে রাজা ভাগ্যচন্দ্র সিংহের আয়োজনে। গৌড়ীয় বৈষ্ণব ধর্মমতে মোহবিষ্ট রাজা স্বপ্নাদিষ্ট হয়ে কন্যা লাইরোবিকে রাধার ভূমিকায় অবতীর্ণ করে রাস অনুষ্ঠানটির আয়োজন করেছিলেন। মৈথিলী ও ব্রজবুলি ভাষার বিভিন্ন পদের মণিপুরী সঙ্গীতের নিজস্ব গায়কী ও মুদ্রা-পদবিক্ষেপে জটিল এই গীতিনৃত্যধারা মণিপুরীদের সর্বপ্রধান আঙ্গিক। ৪ প্রকারের রাসলীলা হয়ে থাকে। (১) নিত্যরাস, যা সারা বছর ধরে বিভিন্ন সময়ে মন্ডপে মন্ডপে হয়। (২) কুঞ্জরাস (৩) বসন্তরাস ও (৪) মহারাস, যা কার্তিক পূর্ণিমা তিথিতে অনুষ্ঠিত হয়। রাসের সাধারণ ক্রম হচ্ছে-&lt;br /&gt;১.সূত্রধারী কর্তৃক রাগালাপ&lt;br /&gt;২. বৃন্দাবন বর্ণন&lt;br /&gt;৩. বৈষ্ণব বন্দনা&lt;br /&gt;৪. বৃন্দার কৃষ্ণ আবাহন&lt;br /&gt;৫. কৃষ্ণ অভিসার&lt;br /&gt;৬.রাধা ও সখীদের অভিসার&lt;br /&gt;৭.রাধা ও কৃষ্ণের সাক্ষাৎ ও মান-অভিমান&lt;br /&gt;৮.ভঙ্গীপারেং&lt;br /&gt;৯. রাধার কৃষ্ণ-সমর্পন&lt;br /&gt;১০. যুগলরূপ প্রার্থনা&lt;br /&gt;১১. আরতি ইত্যাদি।&lt;br /&gt;রাসের মন্ডলী বাঁশ ও কাগজ কেটে বিশেষ কারুকাজে তৈরী করা হয়। মন্ডলীর দক্ষিণ-পশ্চিম কোণে বসে ওঝা বা রাসের গুরু, সূত্রধারীগণ এবং বাদকগণ। মৃদঙ্গ ও মন্দিরা বাদ্য হিসেবে গোপিনীদের পোষাক ও অলংকারের কতিপয় নাম-(১) মেইখুম্বি (মাথা ঢাকার ওড়না) (২) লৈত্রেং (কোমরে ব্যবহার্য) (৩) খাওল (কোমর থেকে নীচে নামানো হয়) (৪)তানখা (৫) খুদোপ ইত্যাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;গোপরাস বা রাখালরাস বা রাখুয়াল&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;এই রাস পুরুষদের। শ্রীকৃষ্ণ, সখা বলরাম ও অন্যান্য গোপবালকদের গোষ্ঠে গরু চরাতে গিয়ে সম্মুখীন নানা ঘটনার চিত্র এই রাসে রূপায়িত হয়। কৃষ্ণের নানা অলৌকিক ক্ষমতা ও শক্তিমত্তার স্বরূপ ফুটে উঠে এর কাহিনীতে। এই রাসকে মুখ্যত ২ ভাগে ভাগ করা যায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;প্রথমে নন্দগৃহে মা যশোদা ও রোহিনীর কাছ থেকে যথাক্রমে কৃষ্ণ ও বলরামের গোষ্ঠে যাওয়ার আদেশ চেয়ে গান এবং দুঃখভারাক্রান্ত মায়েদের বিদায়গীতি পর্ব। পরবর্তীতে গোচারণে নানা উপাখ্যান ও শেষে গোধূলীলগ্নে গৃহে গমন।&lt;br /&gt;মণিপুরী শাস্ত্রীয় নৃত্যের বৈষ্ণব ভক্তি ভাবাপন্ন নরম কোমল ভাবের বিপরীতে এখানে তান্ডব ধারার নৃত্যই প্রধান। ওঝা বা গুরু বসে মৃদঙ্গ নিয়ে। আর মানকসাপি বা যশোদা ও রোহিনী-রূপী নারীদ্বয় মন্ডলীর এককোনে বসে গান ও অভিনয় কর্ম সম্পন্ন করে। মঞ্চ ১২ টি কলাগাছ দিয়ে বেষ্টিত থাকে।&lt;br /&gt;পোষাক ও অলংকারের নাম : (১) চূড়া ( মাথায় ব্যবহারের) (২) নূপুর (৩) খৌয়ল (৪) লেইত্রেং (৫) টেরে খোংজি ইত্যাদি।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;বেণীরাস&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;বেণীরাস দিনের বেলা অনুষ্ঠিত মেয়েদের ক্বচিৎ অনুষ্ঠিত একধরনের রাস। সাদামাটা পোষাকে এই রাস অনুষ্ঠিত হয়। দুপুর থেকে সন্ধ্যা পর্যন্ত এই রাস হয়ে থাকে। এতে রাধিকা ও সখীদের বিভিন্ন আনন্দদায়ক ঘটনা ও কৃষ্ণের রাধিকা সখ্যতার নানা দুষ্টপ্রদ কাহিনী রূপায়িত হয়। অনেকাংশেই কৃষ্ণ থাকে অনুপস্থিত। বর্তমানে এই রাস হয়না বললেই চলে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;লাইহারাওবা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;লাই শব্দের অর্থ দেবতা, হারাওবা অর্থ আনন্দদান, এ পূজার উদ্দেশ্য দেবতাকে তুষ্ট করা। মণিপুরীদের সর্বপ্রাচীন এই নৃত্য (উৎসবও) এখনও কদাচিৎ মণিপুরীদের মধ্যে দেখা যায়।&lt;br /&gt;নারী ও পুরুষ সারিতে ভাগ হয়ে শোভাযাত্রার মধ্যদিয়ে নৃত্যের শুরু করে। হস্তমুদ্রা, বাঁশের দন্ডদিয়ে বিশেষ যাদু, বলখেলা ইত্যাদি ক্রীড়ানুষ্ঠানের মধ্য দিয়ে এই নৃত্যধারা সম্পন্ন হয়। এতে শাস্ত্রীয় নৃত্যের কোনো চিহ্ন নেই, আদিম উল্লাস ও হর্ষ-অঙ্গভঙ্গি এই নৃত্যের বৈশিষ্ঠ্য।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;উলুখরাস বা উদুখলরাস&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;শ্রীমদভাগবতের ১০ম স্কন্ধে বর্ণিত শ্রীকৃষ্ণের বাল্যলীলার কাহিনীকে কেন্দ্র করে এই রাস চয়ন করা হয়েছে। বালক কৃষ্ণের পুতনাবদ, কুবের পুত্রদ্বয়ের যমলার্জুন বৃক্ষরূপ থেকে মুক্তি, শ্রীকৃষ্ণের ননীচুরি, উদুখলবন্ধন ইত্যাদি কাহিনী এই রাসে রূপায়িত হয় আকর্ষণীয় ভাবে। মূলতঃ কার্তিক মাসে, তবে অন্য মাস গুলোতেও হয়ে থাকে।&lt;br /&gt;উদুলখলরামে নৃত্য ও গানের সাথে অভিনয়ের আধিক্যই বেশী দেখা যায়। প্রয়োজনে থিয়েট্রিক্যাল সেট ব্যবহারের লোকজ ধারাও এতে বর্তমান। বর্তমানে এ রাসের অনুষ্ঠান খুব কম।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;খুবাক ঈশৈ বা খুবাকুশি&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;খুবাক অর্থ করতালি আর ঈশৈ মানে নৃত্য। করতালি সহকারে নৃত্যগীতের আসরকে খুবাক ঈশৈ বলে। রথযাত্রার দিন থেকে হরিশয়ন তিথি পর্যন্ত এই আসর হয়। গীতগোবিন্দ থেকে গান গাওয়া হয় এই গীতিনৃত্যে। বৃত্তকারে মেয়েরা বিশেষ পদবিক্ষেপের সাথে খুবাকুশি পরিবেশন করে। এর মাধ্যমে পাপ খন্ডন হয় বলে বিশ্বাস।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;নুপীপালা&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;মহিলাদের এক ধরনের নটপালা-কে নুপীপালা বলা হয়। নুপী শব্দের অর্থ মহিলা। এতে রাধা-কৃষ্ণের নানা প্রণয়লীলা ও নৌকা বিলাস লীলাগীত হয়। মৃদঙ্গ ও মন্দিরা বাদ্য হিসেবে বাজানো হয়। এতে একজন ইশালপি বা গায়িকা নেয় রাধা চরিত্র, আরেকজন কৃষ্ণ। তারা মুক্ত বর্ণনাতেও অংশ নেয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;থাংতা&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;থাং অর্থ তরবারি, তা অর্থ বল্লম। তরবারি ও বল্লম দিয়ে শারীরিক কৃৎকৌশলের বিশেষ নৃত্যকলাকে থাংতা বলা হয়। মণিপুরে অত্যন্ত জনপ্রিয় হলেও বাংলাদেশে এর প্রচলন খুবই কম।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;ধ্রুমেল&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;নটপালার অন্তর্ভূক্ত। তবে আলাদাভাবেও হয়। মৃদঙ্গ বাদনের প্রতিযোগীতার অনুষ্ঠান। সঙ্গে মন্দিরা ও করতালও বাজানো হয়। জোড় সংখ্যক বাদক হতে হয়। মহাধ্রুমেল, গৌরধ্রুমেল ইত্যাদি নানা প্রকারের ধ্রুমেল রয়েছে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;হোলি&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;হোলি উৎসব কিংবা দোলপূর্ণিমার উৎসব ফাগুয়াতে মণিপুরীদের যে পরিবেশনা বাদ্য, গীত ও নৃত্য সহযোগে হয়ে থাকে , তারই নাম হোলি। রাধা-কৃষ্ণের ফাগু বা আবীর খেলার বিভিন্ন রসঘন বর্ণনা, বসন্তের প্রকৃতিবর্ণন ও কৃষ্ণ-গৌরাঙ্গ তত্ত্বের নানা ব্যাখ্যা নিয়ে আকর্ষণীয় এ পরিবেশনার জন্য বিভিন্ন ভ্রাম্যমান দল গঠন করা হয়। দলে নারী-পুরুষ উভয় শিল্পীই থাকে। গভীর রাত পর্যন্ত গ্রামে গ্রামে ঘুরে হোলির দল গান পরিবেশন করে থাকে। তাদের মধ্যে গানের ফাঁকে ফাঁকে ফাগু খেলাও চলে। কজন মূল গায়ক হোলিগানের নেতৃত্ব দেয়, একেকটি পদ পরবর্তীতে সকলে ধুয়া তুলে বা পুনরাবৃত্তি করে। গানের শেষে বাদ্যের তান্ডব খোলা শুরু হয় নির্দিষ্টতালে।&lt;br /&gt;বাদ্য হিসেবে মন্দিরা, করতাল, মৃদঙ্গ ও ঢোল ব্যবহার করা হয়। গায়কেরা ইনাফি বা ওড়না দিয়ে নানা চরিত্রের উপস্থাপনে প্রতীকী আবহ তৈরী করে। হোলির একটি জনপ্রিয় গানের কয় লাইন-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;খেলব খেলব শ্যাম তোমার সনে&lt;br /&gt;একেলা পাইয়াছিরে শ্যাম&lt;br /&gt;এ নিঠুর বনে।&lt;br /&gt;রাইর হাতে পিচকারী&lt;br /&gt;আতর গোলাপ ভরি&lt;br /&gt;ছাড়িয়া না দিব ত্বরা&lt;br /&gt;মারব পিচকারী---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;লেরিক দেনা বা পুঁথিপাঠ&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;লেরিক দেনা মণিপুরী সংস্কৃতির এক অবিচ্ছেদ্য শিল্প-আঙ্গিক, যা একই সঙ্গে কৃত্য ও শিল্প। রামায়ণ, মহাভারত, চৈতন্য চরিতামৃত, গীতা ইত্যাদি ধর্মীয় পুস্তকাদি থেকে একজন সুরেলা আবৃত্তি করে নির্বাচিত অংশ, আরেকজন তার সরল গদ্যানুবাদ ও ব্যাখ্যা প্রদান করে। পাঠ বা আবৃত্তির বিশেষ এক ঢঙ আছে, যা পুঁথিপাঠ-এর মত নয়, একেবারেই নিজস্ব। যিনি ব্যাখ্যাকারী, তাকে অভিজ্ঞ ও প্রজ্ঞাশীল হতে হয়। আসর বুঝে সরল উদাহরণ সহকারে সে বক্তব্যকে সবার কাছে বোধগম্য করে। শ্রোতা-দর্শকের সাথে সার্বক্ষণিক সমঝোতা ও বোঝাপরার মধ্য দিয়ে লেরিক দেনা এগিয়ে যায়। বিভিন্ন ধর্মীয় কৃত্যে-পার্বণে এটি একটি আবশ্যিক পরিবেশনা।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;পদাবলী কীর্তণ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;বিভিন্ন বৈষ্ণব পালাকারের পদ বা কাহিনী নিয়ে পদাবলী কীর্তণ হয়। পদাবলী কীর্তণে একক ও বিচ্ছিন্ন পদের সমাহার নিয়েও গান হয়ে থাকে, আবার পূর্ণাঙ্গ লীলা ভিত্তিক গানও হয়ে থাকে। নৌকা বিলাস নিমাই সন্ন্যাসপালা গোষ্ঠলীলা ইত্যাদি পালার পরিবেশনা দেখা যায় মণিপুরীদের মধ্যে। মৈথিলী ও ব্রজবুলি পদ থেকে মণিপুরী ভাষায় অনুবাদ করে ও সুরের স্বকীয় মিশ্রণে পদাবলী কীর্তণও মণিপুরীদের মধ্যে এক নিজস্বতা লাভ করেছে। বিভিন্ন হাবভাব ও অঙ্গভঙ্গি সহকারে লীলা পরিবেশন করে গানের ফাঁকে প্রলম্বিত সুরেলা বর্ণনা থাকে, আর তার চতর্ুদিকে দোহার ও বাদক দল বসে লীলা পরিবেশনার অলংকার তৈরি করে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;…………………………………………………….……&lt;br /&gt;…………………………………………………….……&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;সম্পাদকীয়&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;জাতিসংঘ ঘোষিত আদিবাসী দশক শেষে দশকের দিকে ফিরে তাকানো ও অতীত এবং সমসাময়িক মূল্যায়নের পাশাপাশি আজ সামগ্রিক মূল্যায়নের সময়ও উপস্থিত হয়েছে নিশ্চয়ই। Indigenous people : partnership in action কে সামনে রেখে, প্রতিবছর আন্তর্জাতিক আদিবাসী দিবস-এ আদিবাসী ইস্যু সম্পর্কিত বিভিন্ন মূলসুর নিয়ে কাজ চলছিল।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;একদিকে যখন জাতিসংঘ কর্তৃক আদিবাসীদের বর্ণাঢ্য সংস্কৃতি-জীবনাচার-প্রথাগত ভূমি অধিকার নিশ্চতকরনের ডাক দেয়া হয় তখন জাতিসংঘেরই আশীর্বাদপুষ্ট অন্যান্য আন্তর্জাতিক বিভিন্ন সংস্থার অর্থায়নে আদিবাসীদের প্রথাগত ভূমি অধিকার হরনের নানা আয়োজনে সহযোগিতা করার বিষয়গুলো সত্যিই ভাবনায় ফেলে দেয়। যখন দেখি আন্তর্জাতিক সংস্থাসমূহের বুদ্ধি-পরামর্শ ও অর্থায়নে হাজার হাজার চাকমা, ম্রাইনমা, ত্রিপুরীদের বসতভিটা তলিয়ে দেয়া হয় বাঁধ নির্মাণ করে; রাবার বাগান, উডলট, ন্যাশনাল পার্ক, ইকোপার্কের নামে মান্দি,কোচ, বর্মনদের উচ্ছেদ করা হয় মধুপুরের শালবনকে দখল করার জন্য তখন জাতিসংঘ ঘোষিত বিভিন্ন আদিবাসী দরদি শ্লোগানগুলো হাস্যকরই ঠেকে। কল্পনা চাকমা অপহরন; আলফ্রেড সরেন-গীতিদা রেমা-পীরেন স্নালের রক্তের দাগতো লেগে রয়েছে আদিবাসী দশকেই! এ সময়েই মৌলভীবাজার সিলেটের পুঞ্জিগুলোতে মান্দি-খাসিয়াদের নিরাপত্তাহীনতার অভাবে জীবন নিয়ে পালিয়ে বেড়াতে হয়, ফরেষ্ট গার্ডের গুলিতে নিহত হতে হয় অবিনাশ মুড়া কে।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ভূমির অধিকার চিরন্তন অধিকার। কোন মানুষ যদি ভূমিই হারিয়ে ফেলে তবে তাঁর সাহিত্য-সংস্কৃতি-মূল্যবোধ সম্পর্কিত জ্ঞানও হারিয়ে যাওয়া অমূলক নয়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;মৃত্তিকা প্রকাশ হলো এমন একটি সময়ে যখন আদিবাসী দশক শেষ বলে ঘোষিত হবে। তাই এই মুহর্ুতে দশক ভাবনাকে পূনঃমূল্যায়নের সুযোগ এসেছে। আমরা সাধ্যমত জাতিসত্ত্বার উন্নয়ন সম্পর্কিত প্রশ্নগুলো সামনে আনার চেষ্টা করেছি। মৃত্তিকা পৃথিবীর সকল জাতির লোকায়ত জ্ঞান এবং সংস্কৃতি সম্পর্কে শ্রদ্ধাশীল; জাতিতাত্ত্বিক লোকায়ত জ্ঞান এবং সংস্কৃতির বিভিন্ন দিক গভীর ভাবে জানতে, বুঝতে ভীষণ আগ্রহী।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;পৃথিবীর সকল জাতিসত্ত্বা সমূহের আপন অধিকার ,আপন মহিমা ও গৌরবে অগ্রসর হওয়ার পক্ষ নিয়েই মৃত্তিকা আপনাদের পাশে দাঁড়াতে চায়।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2837909860989867301-167738607747963678?l=mrhittika.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mrhittika.blogspot.com/feeds/167738607747963678/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2837909860989867301&amp;postID=167738607747963678' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2837909860989867301/posts/default/167738607747963678'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2837909860989867301/posts/default/167738607747963678'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mrhittika.blogspot.com/2007/08/blog-post_123.html' title='মৃত্তিকা : বর্ষ ক্রম: ০১;সংখ্যা ক্রম: 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